अविश्वास प्रस्ताव के बाद पारित विधेयक संवैधानिक रूप से संदिग्ध, बिल को लेकर संसद में विवाद

0
88

बीरेंद्र कुमार झा

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने दावा किया कि लोकसभा द्वारा अविश्वास प्रस्ताव को मंजूर किए जाने के बाद इसके पारित हुए बिना पारित अन्य सभी विधेयक संवैधानिक रूप से संदिग्ध है।मनीष तिवारी ने जोर देकर कहा कि कोई भी विधाई कामकाज अविश्वास प्रस्ताव के परिणाम सामने आने के बाद ही होना चाहिए ना कि इससे पहले। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बाद 10 दिन की अवधि का इस्तेमाल विधेयकों को पारित कराने के लिए नहीं किया जा सकता है ।लोकसभा सदस्य ने यह बात तब कही जब सरकार की तरफ से दिल्ली सेवा विधेयक संसद में पेश किया जाना है।

संसदीय परंपराओं का पूरी तरह से उल्लंघन

मनीष तिवारी ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि एक बार अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में पेश कर दिया जाए तो उसके बाद कोई विधेयक अथवा संसद के समक्ष लाया गया कोई भी कामकाज नैतिकता औचित्य और संसदीय परंपराओं का पूरी तरह से उल्लंघन है। मनीष तिवारी ने दावा किया कि लोकसभा द्वारा अविश्वास प्रस्ताव को मंजूर किए जाने के बाद राज्यसभा और लोकसभा से पारित सभी विधेयकों की वैधता की पड़ताल कानून द्वारा की जानी चाहिए और यह पता लगाया जाना चाहिए कि यह कानूनी तरीके से पारित किए गए हैं अथवा नहीं।

विधायी कामकाज संवैधानिक रूप से संदिग्ध

मनीष तिवारी ने दावा किया कि अविश्वास प्रस्ताव को मंजूर किए जाने के बाद सभी विधायी कामकाज संवैधानिक रूप से संदिग्ध है। मणिपुर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी से संसद के भीतर जवाब मांग रहे विपक्षी गठबंधन इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (INDIA) की ओर से कांग्रेस ने इस रणनीति के साथ यह कदम उठाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सदन में बोलने के लिए बाध्य किया जा सके।मनीष तिवारी ने कहा कि मणिपुर में जो हुआ और जो वहां लगातार हो रहा है वह निंदनीय है ।राज्य में बीजेपी की सरकार है,केंद्र में बीजेपी की सरकार है इसलिए किसी सरकार को तो जिम्मेदारी लेनी ही होगी।

अविश्वास प्रस्ताव लाने के सिवाय नहीं बचा था कोई विकल्प

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा की विपक्ष यह उम्मीद कर रहा था कि प्रधानमंत्री मनीपुर के बेहद खतरनाक हालात पर संसद के दोनों सदनों में स्वत संज्ञान लेते हुए बयान देंगे और उस पर चर्चा होगी।लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रधानमंत्री ने मानसून सत्र के शुरू होने से पहले बेहद सतही बयान दिया।कांग्रेस नेता ने कहा कि इसके बाद पीठासीन अधिकारी ने लगातार पेश किए गए स्थगन प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इसलिए संयुक्त विपक्ष के पास अविश्वास प्रस्ताव लाने के सिवाय और कोई विकल्प ही नहीं बचा था।

प्रधानमंत्री मोदी की जवाब लेकर उम्मीद

इस अविश्वास प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जवाब को लेकर क्या उम्मीदें हैं? यह पूछे जाने पर सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि अविश्वाश प्रस्ताव में कहा गया है कि यह सदन मंत्रिपरिषद के प्रति विश्वास के अभाव को व्यक्त करता है और उस विश्वास की मांग का कारण पिछले 1 सप्ताह से सार्वजनिक तौर पर बताया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों में अगर प्रधानमंत्री मणिपुर पर प्रतिक्रिया नहीं देने का चुनाव करते हैं तो यह उपहास का विषय होगा।वहीं बीजेपी का तर्क है कि पूर्वोत्तर में अतीत में हुई हिंसा की घटनाओं पर मंत्रियों ने जवाब दिया है,प्रधानमंत्री ने नहीं। इस पर मनीष तिवारी ने कहा कि मोदी सरकार को भी विपक्षियों के स्थगन प्रस्ताव मंजूर करने चाहिए थे।

दिल्ली सेवा विधेयक

मनीष तिवारी ने कहा कि हम हर दिन हर स्थगन प्रस्ताव पेश कर रहे थे ।सरकार को इसे स्वीकार कर लेना चाहिए था जिन पर मंत्री जवाब दे सकते थे। सरकार ने उन्हें स्वीकार नहीं करने का चयन किया। यह पूछे जाने पर कि क्या दिल्ली सेवा विधेयक को सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान के बाद लाया जाना चाहिए? इस पर मनीष तिवारी ने कहा की कॉल और सकधर द्वारा लिखी गई पुस्तक जिसका मैंने जिक्र किया है उसमें यह स्पष्ट किया गया है कि एक बार अध्यक्ष अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है तो किसी अन्य विधायी कार्य को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए।

जुलाई 1966 का क्या जिक्र

मनीष तिवारी ने जिक्र किया कि जुलाई 1966 में जब सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था,तब तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने इस तथ्य को स्वीकार किया था कि एक बार ऐसा प्रस्ताव सदन के सामने आने के बाद कोई अन्य महत्वपूर्ण कार्य नहीं किया जाना चाहिए। इस बारे में पूछे जाने पर कि अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के 10 दिन के भीतर चर्चा कराने के नियम के बावजूद विपक्ष इस पर तत्काल चर्चा की मांग कर रहा है, तो उन्होंने कहा कि इसके पीछे का कारण यह है कि जब मंत्रिपरिषद के प्रति विश्वास ही नहीं किया जा रहा है तो इसका क्या औचित्य है कि सरकार विधेयक पेश कर उन्हें सदन से पारित करवाए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here