भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा मुलाकात कर ज्ञापन सौंपने के अनुरोध को ठुकरा चुके है। कांग्रेस नेतृत्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, चुनावी गड़बड़ियों (‘वोट चोरी’) और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) जैसे मुद्दों पर सीजेआई को ज्ञापन सौंपना चाहता था।
सीजेआई सूर्यकांत के द्वारा राहुल गांधी से मिलने से इनकार करने के बावजूद अभी भी एसआईआर का यह मुद्दा देश भर में गर्माया हुआ है।सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों इसे अपने-अपने तरीके से भुनाने में लगे हुए हैं और इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है।ऐसे में आई जानते हैं कि सीजेआई न्यायमूर्ति सूर्यकांत के द्वारा राहुल गांधी से मिलने से इनकार के पीछे क्या है कानूनी और नैतिक पक्ष।सीजेआई न्यायमूर्ति सूर्यकांत का यह कदम न्यायपालिका को गौरवान्वित करने वाला है या फिर न्यायपालिका इस मामले में अपनी भूमिका सही ढंग से न निभाकर अपनी भूमिका निभाने में आनाकानी कर रहा है।आईए जानते हैं न्यायमूर्ति सूर्यकांत द्वारा लीडर ऑफ ऑपोजिशन और कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिलने से इनकार करने के पीछे के प्रमुख कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के बारे में।
1. सब-जुडिस (Sub-Judice) का सिद्धांत:मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि जिन मुद्दों पर विपक्षी नेता चर्चा करना चाहते हैं और ज्ञापन सौंपना चाहते थे, वे मामले पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन (लंबित) हैं। कानूनी मर्यादा के तहत, अदालत के बाहर किसी भी विचाराधीन मामले पर न्यायाधीश और किसी राजनीतिक दल के बीच व्यक्तिगत चर्चा स्थापित नैतिक मानदंडों और न्यायिक शुचिता के खिलाफ होती है।
2. शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत (Separation of Powers):संवैधानिक योजना के तहत, न्यायपालिका और कार्यपालिका (Executive) के काम बंटे हुए हैं। सीजेआई ने पत्र में स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट प्रशासनिक स्तर पर सरकार या चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं के कामकाज में इस तरह सीधे दखल नहीं दे सकता। प्रशासनिक स्तर पर ऐसी मुलाकातें इस संवैधानिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं।
3. हितों का टकराव (Conflict of Interest) से बचाव:जिस मुख्य मामले (विशेष रूप से चुनाव आयोग और एसआईआर प्रक्रिया) को लेकर विपक्ष शिकायत करना चाहता था, उसकी सुनवाई खुद सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही है। ऐसी स्थिति में, मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश का किसी एक पक्ष से प्रशासनिक तौर पर मिलना ‘हितों के टकराव’ की संभावना पैदा करता है, जिससे बचने के लिए यह अनुरोध खारिज किया गया।
4. प्रशासनिक बनाम न्यायिक प्रक्रिया (Administrative vs Judicial Side):मुख्य न्यायाधीश ने विपक्षी नेताओं को सलाह दी कि वे प्रशासनिक स्तर पर ज्ञापन सौंपने के बजाय उचित कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया का पालन करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन या चुनावी प्रक्रिया को लेकर कोई शिकायत है, तो संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में औपचारिक याचिका (Petition) दाखिल की जानी चाहिए, जिस पर अदालत न्यायिक तरीके से ही सुनवाई करेगी।

