गर्मी का मौसम शुरू होते ही घरों की छतों पर रखी पानी की टंकियां तेज धूप और हीटवेव से गर्म होने लगती हैं।खासतौर पर प्लास्टिक की टंकियां घंटों तक गर्म तापमान में रहती हैं, जिससे अब माइक्रोप्लास्टिक्स को लेकर चिंता बढ़ रही है। माइक्रोप्लास्टिक्स प्लास्टिक के बेहद छोटे कण होते हैं, जो प्लास्टिक के टूटने या खराब होने पर पानी और खाने तक पहुंच सकते हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने भी माइक्रोप्लास्टिक्स पर रिसर्च और निगरानी बढ़ाने की जरूरत बताई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि खराब क्वालिटी या पुरानी प्लास्टिक टंकियां तेज गर्मी में जल्दी डिग्रेड हो सकती हैं, जिससे छोटे प्लास्टिक कण पानी में मिलने लगते हैं।यही वजह है कि अब लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या रोज इस्तेमाल होने वाला पानी भी धीरे-धीरे सेहत के लिए जोखिम बन सकता है।
माइक्रोप्लास्टिक्स प्लास्टिक के बहुत छोटे कण होते हैं, जिनका आकार 5 मिलीमीटर से भी कम होता है। कई बार ये इतने छोटे होते हैं कि आंखों से दिखाई भी नहीं देते।प्लास्टिक के टूटने, घिसने, धूप और गर्मी के कारण कमजोर होने पर ये कण अलग होकर पानी और भोजन में मिल सकते हैं।
हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक्स पीने के पानी में भी पाए जा सकते हैं और इस पर लगातार रिसर्च की जा रही है।
गर्मियों में छत पर रखी प्लास्टिक टंकियां लगातार तेज धूप और हाई टेंपरेचर के संपर्क में रहती हैं।कई शहरों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, जिससे टंकी की बाहरी सतह बहुत ज्यादा गर्म हो जाती है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक लंबे समय तक UV किरणों और गर्मी के संपर्क में रहने पर प्लास्टिक धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। अगर टंकी की क्वालिटी अच्छी नहीं हो या वह काफी पुरानी हो चुकी हो, तो उस के छोटे-छोटे कण पानी में घुल सकते हैं।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक लंबे समय तक UV किरणों और गर्मी के संपर्क में रहने पर प्लास्टिक धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।अगर टंकी की क्वालिटी अच्छी नहीं हो या वह काफी पुरानी हो चुकी हो, तो उस के छोटे-छोटे कण पानी में घुल सकते हैं।
अगर टंकी का रंग फीका पड़ने लगे, सतह खुरदरी महसूस हो, दरारें दिखने लगें या प्लास्टिक कमजोर लगे, तो यह संकेत हो सकता है कि प्लास्टिक डिग्रेड हो रहा है।
जब माइक्रोप्लास्टिक्स पानी में मिल जाते हैं, तो वे पीने, खाना बनाने या अन्य घरेलू उपयोग के जरिए शरीर में पहुंच सकते हैं। कई रिसर्च में यह पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक्स ह्यूमन ब्लड तक पहुंच सकते हैं।
नीदरलैंड्स में हुई एक स्टडी में वैज्ञानिकों ने पहली बार मानव खून में प्लास्टिक कण पाए थे।वहीं 2024 और 2025 की कुछ रिसर्च में माइक्रोप्लास्टिक्स और ब्लड क्लॉटिंग के बीच संभावित संबंधों पर भी चिंता जताई गई है।
हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक्स शरीर में सूजन, हार्मोनल बदलाव, पाचन संबंधी समस्याएं और इम्युनिटी पर असर डाल सकते हैं। कुछ रिसर्च में इनके हार्ट और ब्लड सर्कुलेशन पर प्रभाव को लेकर भी अध्ययन जारी है। हालांकि वैज्ञानिक अभी भी इनके लंबे समय के प्रभावों को लेकर और रिसर्च कर रहे हैं।
हमेशा अच्छी क्वालिटी और फूड-ग्रेड प्लास्टिक टंकी का इस्तेमाल करें।
बहुत पुरानी या खराब हो चुकी टंकी को तुरंत बदल दें।
टंकी को सीधे धूप से बचाने के लिए शेड या कवर लगाएं।
टंकी के लिए बाजार में मिलने वाले थर्मल इंसुलेशन कवर का उपयोग करें।
टंकी के ऊपर ग्रीन नेट, टिन शेड या फाइबर की शीट लगा दें ताकि सीधी धूप न पड़े।
टंकी को जूट के कपड़े या टाट की बोरी से ढक दें और उसे समय-समय पर गीला करते रहें।
टंकी के चारों तरफ थर्माकोल की शीट लगाकर उसे टेप से अच्छे से बांध दें।
समय-समय पर टंकी की सफाई और जांच करवाते रहें।
तेज गर्मी और हीटवेव के दौर में प्लास्टिक टंकियों की सुरक्षा को नजरअंदाज करना सही नहीं होगा।माइक्रोप्लास्टिक्स को लेकर वैज्ञानिक रिसर्च अभी जारी है, लेकिन एक्सपर्ट्स सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। सही क्वालिटी की टंकी, रेगुलर चेकअप और धूप से सुरक्षा जैसे छोटे कदम आपके परिवार को संभावित जोखिमों से बचाने में मदद कर सकते हैं।

