आरक्षण की दोधारी तलवार पर BJP, सवर्णों को संदेश देने की कोशिश

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आरक्षण का मुद्दा राजनीति और खासकर चुनावी राजनीति पर असर डालता रहा है, पिछले लोकसभा चुनाव से लेकर राज्यों के चुनाव तक। इसलिए कोई भी पार्टी इस मसले पर कोई कदम उठाने से पहले कई बार सोचती है। इसी मुद्दे पर BJP अभी दोधारी तलवार पर चलती दिख रही है। जिस तरह जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ आंदोलन करने वालों से केंद्रीय मंत्री मुलाकात कर रहे है, उसका दोतरफा असर हो सकता है।

नड्डा की आरक्षण खत्म करने की मांग करने वाले ग्रुप से मुलाकात का सबसे सीधा राजनीतिक अर्थ यही निकाला जा रहा है कि BJP सवर्ण समाज की नाराजगी को नजरअंदाज नहीं करना चाहती। यूपी में सवर्ण मतदाता करीब 20 पर्सेट है। BJP का आकलन है कि सवर्णों का बड़ा हिस्सा अब भी उसके साथ है।

BJP उनकी नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती, क्योंकि समाजवादी पार्टी भी अब पीडीए में पी को पंडित बताने लगी है। BJP नहीं चाहती कि आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उसके पारंपरिक समर्थकों के बीच असंतोष राजनीतिक दूरी में बदल जाए। पिछले कुछ महीनों में यूजीसी के नियमों को लेकर सवर्ण संगठनों और छात्रों के विरोध ने इस असंतोष को सार्वजनिक मंच दिया है।

BJP के सामने एक दुविधा यह भी है कि आरक्षण विरोधी खेमे में भी पूरी संतुष्टि नहीं दिखती। वहां सवाल उठ रहा है कि अगर BJP आरक्षण खत्म करने के पक्ष में नहीं है तो फिर इस तरह की बातचीत का राजनीतिक अर्थ क्या है? साथ ही यह कदम ओबीसी, एससी और एसटी समुदायों में भी राजनीतिक प्रतिक्रिया पैदा कर रहा है। पार्टी को सवर्णों की नाराजगी भी दूर करनी है और ओबीसी-दलित सामाजिक समीकरण को भी मजबूत बनाए रखना है।

सोशल मीडिया में भी यह ‘जंग’ दिखाई दे रही है। NDA के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग सुर सुनाई दे रहे है। क्या ये विचारों में मतभेद है या फिर बैलेंसिंग एक्ट ? जीतन राम मांझी और उनके बेटे संतोष सुमन का तर्क है कि आरक्षण का लाभ सबसे वंचित तबकों तक पहुंचाने के लिए मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा और SC/ST के भीतर सब-कैटेगरी की जरूरत है।

दूसरी तरफ चिराग पासवान का कहना है कि आरक्षण सामाजिक भेदभाव और छुआछूत से पैदा हुई असमानता को दूर करने का संवैधानिक अधिकार है, इसे इस तरह बांटना हितकर नहीं, सामाजिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। यूपी में अगले साल विधानसभा चुनाव होने है। 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण का नैरेटिव BJP के खिलाफ प्रभावी राजनीतिक मुद्दा बना था। पार्टी इस अनुभव को नजरअंदाज नहीं कर सकती।

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