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केरल के लोकसभा चुनाव में बीजेपी अबतक 0,लेकिन 2024 चुनाव में दहाई अंकों का दावा,

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केरल में अब तक हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने किसी भी चुनाव में एक भी सीट जीतने में सफलता प्राप्त नहीं की है लेकिन प्रधानमंत्री के नेतृत्व में 2024 ई के लोकसभा चुनाव को लेकर बीजेपी जीत का आंकड़ा दहाई अंक मैं पहुंचने की बात कर रही है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तय किया गया चुनावी जीत का लक्ष्य बीजेपी 370 और एनडीए 405 के लक्ष्य को केरल जैसे दक्षिण भारत के भरोसे जीतने की बात बीजेपी के लिए एक हकीकत भी हो सकती है और वहम भी होसकता है ।इस हकीकत या वहम का खुलासा तो 4 जून को होने वाली मतगणना के परिणाम ही बताएंगे, लेकिन फिलहाल केरल में बन और बिगड़ रही स्थितियां और परिस्थितियां इसके हकीकत होने या वहम होने की तरफ कुछ इशारा तो कर ही दे रही है।

केरल में कांग्रेस और वाम दल का रहा है प्रभुत्व

दक्षिण भारतीय राज्य केरल जहां की सभी 20 लोकसभा सीटों पर चुनाव के दूसरे चरण में 26 अप्रैल को मतदान होना है,वहां आम तौर पर लोकसभा और विधानसभा दोनों ही चुनावों में कांग्रेस और लेफ्ट का दबदबा रहा है।अबतक अब तक यहां सिर्फ कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ और वाम दल के नेतृत्व वाली एलडीएफ ही प्रमुख गठबंधन रहे हैं और चुनावी हार – जीत भी इन्हीं दोनों गठबंधनों के बीच होता आ रहा है ।लेकिन अब वहां के चुनाव में एक नए दावेदार के रूप में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए ने भी अपना पैर पसारना शुरू कर दिया है।

पीएम मोदी का लोकसभा चुनाव को लेकर केरल में बड़ा दावा

भले ही लोकसभा चुनावों में केरल में बीजेपी का अभी तक खाता भी नहीं खुल पाया है,लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी तिरुवनंतपुरम में बड़ा दावा किया था कि लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी राज्य में दोहरे अंक में सीटें जीतेगी।इसका मतलब यह है कि केरल में बीजेपी को कम से कम 10 सीटें जीतने की उम्मीद है।ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को एलडीएफ और यूडीएफ के बीच बीजेपी के लिए भी जगह निकालना होगा।इसके लिए उन्हें वहां एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ेगा।हालांकि लोकसभा चुनाव में बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी ने दक्षिण भारत के राज्यों पर विशेष रूप से फोकस किया है।बीते दो महीनों में पीएम मोदी ने तमिलनाडु और केरल के धुआंधार दौरे किए हैं। पीएम मोदी के अलावा अमित शाह, जेपी नड्डा और राजनाथ सिंह जैसे बीजेपी के अन्य कद्दावर नेता भी केरल की दौड़ लगा रहे है।माना जा रहा है कि बीते कुछ सालों में बीजेपी ने केरल में लेफ्ट के हिंदू वोटों में सेंध लगाया है. जबकि अल्पसंख्यक मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस की तरफ है।

केरल में पिछले 3 लोकसभा चुनावों के नतीजे

2009, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों को देखें, तो केरल में कांग्रेस का दबदबा रहा है। 2009 में हुए चुनावों में लेफ्ट प्लस को 4, 2014 में 8 और 2019 में 1 सीट मिली थी वहीं कांग्रेस प्लस ने 2009 में 20 में से 16 सीटें जीती थी।2014 में इसने 12 सीटों पर विजय हासिल की और 2019 के चुनावों में इसके खाते में 20 में से 19 सीटें आईं।बात अगर बीजेपी प्लस की करें, तो 2009, 2014 और 2019 में केरल में पार्टी के हाथ एक भी सीट नहीं आई।

केरल का सियासी समीकरण

केरल में चुनावी हार – जीत जा फ़ैसला मुख्यत: वहां की 4 प्रमुख जातियां और समुदाय करती है।केरल की इन जातियों और समुदायों पर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और लेफ्ट के नेतृत्व वाले एलडीएफ का अपना-अपना मजबूत वोट बैंक है।45 फीसदी अल्पसंख्यक वोट बैंक कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ का माना जाता है। ईसाई और मुस्लिम ज्यादातर इसी फ्रंट को चुनते हैं।वहीं केरल की पिछड़ी जातियों में लेफ्ट का काफी ज्यादा प्रभाव माना जाता है। केरल में हिंदू वोट करीब 55 फीसदी है। ये वोट एलडीएफ और यूडीएफ के बीच बंटा हुआ है।

लेफ्ट के हिंदू वोट में BJP की सेंध

बीजेपी ने बीते कुछ सालों में लेफ्ट के हिंदू वोट बैंक में जबरदस्त सेंधमारी की है।पिछले चुनावों में बीजेपी का केरल के नायर समुदाय में वोट बैंक बढ़ा है।सबरीमाला के मुद्दे के बाद से ही ये समुदाय बीजेपी की तरफ झुकता नजर आया।केरल की कुल आबादी में नायर समुदाय करीब 15 फीसदी हिस्सेदारी रखता है।इसमें केरल के अपर कास्ट हिंदू आते हैं।इसके अलावा पिछड़ा वर्ग के तहत आने वाले एझवा समुदाय जो केरल के चुनाव में काफी अहम भूमिका निभाता है,इसके बीच भी बीजेपी ने सेंधमारी की है।इसकी केरल में कुल आबादी करीब 28 फीसदी है ।हालांकि केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन खुद इस समुदाय से आते हैं और एझवा समुदाय को अबतक विजयन का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता रहा है।एझवा समुदाय पर सीपीएम का एकाधिकार माना जाता है।हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बार – बार केरल दौरे से एझवा समुदाय का झुकाव बीजेपी की तरफ भी होने लगा है।

केरल के अल्पसंख्यकों की राजनीतिक चाल

केरल के मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यक मतदाताओं में कांग्रेस की पकड़ मज़बूत दिखती है। 2006 के विधानसभा चुनाव में लेफ्ट को 39 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे,जबकि कांग्रेस को 57 फीसदी वोट मिले थे। वहीं, 2019 के लोकसभा चुनावों में लेफ्ट को 25 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे , यानि लेफ्ट को 14 फीसदी मुस्लिम वोट का नुकसान हुआ।वहीं इस चुनाव में कांग्रेस को 70 फीसदी वोट मिले, यानी कांग्रेस के 13 फीसदी मुस्लिम वोट बढ़े हैं।इसी तरह अगर बात ईसाई समुदाय के वोट की करें, तो 2006 के असेंबली इलेक्शन में लेफ्ट को इसका 27 फीसदी वोट मिला था और कांग्रेस को इसका 67 फीसदी वोट मिला था। वहीं 2019 के लोकसभा चुनावों में लेफ्ट को 30 फीसदी ईसाई वोट मिले,जबकिकांग्रेस को 65 फीसदी ईसाई वोट मिले। यानि कांग्रेस पार्टी के 2 फीसदी ईसाई वोट घट गए

यूडीएफ और एलडीएफ के बीच बीजेपी द्वारा सीटे जीतने का विकल्प

केरल में भले ही मतदाताओं का शिफ्टिंग इधर से उधर होता है,लेकिन फिर भी यह यूडीएफ और एलडीएफ के बीच ही बंट कर रह जाता है।लेकिन अब बीजेपी इस शिफ्टिंग को कुछ हद तक अपने पक्ष में भी कर सकती है,और इसी आधार पर शायद वह दहाई अंक में अपनी जीत का दावा कर रही है।यूडीएफ और एलडीएफ के बीच बंटे मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए बीजेपी के सामने दो प्रमुख विकल्प हैं।पहला विकल्प तो यह है कि बीजेपी 55% हिंदू वोटर का ध्रुवीकरण पूरी तरह से अपने पक्ष में कर ले।वहीं बीजेपी के लिए दूसरा विकल्प यह है कि यहअल्पसंख्यकों के 45% वोट बैंक में सेंधमारी कर अपने लिए जमीन बनाने का काम करे। बीजेपी को मुस्लिम वोटों से ज्यादा उम्मीद नहीं है, लेकिन फिर भी पसमांदा मुसलमान की बात कह कर यह मुसलमान के एक वर्ग को भी अपने पक्ष में करने का प्रयास कर रही है, दूसरी तरफ ईसाई वोटर्स को अपने पाले में खींचने की पूरी कोशिश उसके द्वारा हो रही है। ईसाई वोटों को कांग्रेस वाले यूडीएफ से खींच कर बीजेपी के पाले में लाने की दिशा में बीजेपी के खुद के प्रयास के साथ आरएसएस भी प्रमुख भूमिका निभा रहा है।

 

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