विपक्षी एकता की जड़ में मट्ठा डालने के लिए अध्यादेश तो सिर्फ एक बहाना ,असल में केजरीवाल का है और कहीं निशाना

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बीरेंद्र कुमार झा

23 जून को बिहार की राजधानी पटना में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ 15 राजनीतिक दलों के नेताओं का महाजुटान हुआ और 2024 की लड़ाई में एकजुट होने पर सहमति को लेकर ऐलान किया गया।हालांकि साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले ही 15 में से एक दल ‘ आम आदमी पार्टी ‘ के नेता वहां से निकल लिए। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस महाजुतान में शर्त रखी थी कि सभी दल दिल्ली में ट्रांसफर पोस्टिंग पर लाए गए अध्यादेश के खिलाफ राज्यसभा में बिल का विरोध करें।केजरीवाल चाहते थे की कांग्रेस इस पर अपनी सहमति दे।लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो वे अपने दल बल के साथ वहां से निकल लिए।

कांग्रेस के सिर फोड़ा तोहमत का घड़ा

दिल्ली पहुंचकर अरविंद केजरीवाल ने बयान जारी करते हुए साफ कर दिया कि केंद्र सरकार के अध्यादेश पर कांग्रेस का रुख स्पष्ट हुए बिना विपक्षी एकता की बात बेमानी है और कांग्रेस का यही रुख रहा तो ऐसे किसी भी प्रयास में आगे आम आदमी पार्टी का शामिल होना मुश्किल होगा। बयान जारी कर आम आदमी पार्टी ने विपक्षी एकता की पहली बैठक में ही उसकी आशंकित विफलता और तोहमत का घड़ा कांग्रेस के बच्चे फोड़ दिया है।

दरअसल आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के राजनीतिक हितों का टकराव दिल्ली और पंजाब में सबसे ज्यादा है ,जहां आम आदमी पार्टी सत्ता में है। कांग्रेस कोई हटाकर ही आम आदमी पार्टी वहां सत्ता पर काबिज हुई है। इतना ही नहीं आम आदमी पार्टी ने गुजरात में भी कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंचाया है और कांग्रेस की कीमत पर ही वहां आम आदमी पार्टी की साख बढ़ी है।

आम आदमी पार्टी कांग्रेस के लिए बड़ा खतरा

आम आदमी पार्टी कांग्रेस के लिए बड़ा खतरा साबित हुई है। 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव कांग्रेस की हार से आम आदमी पार्टी के विजय यात्रा की शुरुआत हुई थी जो अब तक दिल्ली और पंजाब में पूर्ण बहुमत वाली सरकार के रूप में स्थापित हो चुकी है। इसके अलावा गोवा और गुजरात में भी आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

आम आदमी पार्टी को दिल्ली, गोवा,पंजाब और गुजरात इन चार राज्यों में उसके चुनावी प्रदर्शन के आधार पर एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में दर्जा दिया गया है। यानि इस मामले में वह कांग्रेस पार्टी के बराबर आ चुकी है।

आगामी चुनाव में आम आदमी पार्टी की रणनीति से कांग्रेस परेशान

आम आदमी पार्टी ने ऐलान किया है कि वह मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इस साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनाव में भी अपने उम्मीदवार उतारेगी।गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के नगरीय निकाय चुनाव में आम आदमी पार्टी को अच्छी सफलता मिली थी।इससे पार्टी उत्साहित है और मध्यप्रदेश में उसके कार्यकर्ता पहले ही से एक्टिव हैं। आमआदमी पार्टी ने मध्य प्रदेश को चार जोन में बांटकर चुनावी तैयारी भी शुरू कर दी है।

कांग्रेस पार्टी को आम आदमी की यह बात भी नहीं पच रही है, क्योंकि यहां भी वह कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी कर ही कोई मुकाम बना सकेगी जबकि कांग्रेस यहां कमलनाथ की अगुवाई में फिर से राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही है। आम आदमी पार्टी ने सभी 230 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की योजना बनाई है और उसके लिए संपर्क अभियान तेज कर दिया है।

छत्तीसगढ़ राजस्थान में भी कांग्रेस को ही चुनौती

छत्तीसगढ़ और राजस्थान जहां कांग्रेस की सरकार है वहां भी आम आदमी पार्टी ने चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। आम आदमी पार्टी ने न केवल वहां नई प्रदेश कार्यकारिणी का गठन किया है, बल्कि चुनाव जीतने के लिए एक बड़ा दांव भी खेला है। आम आदमी पार्टी ने घोषणा की है कि अगर राज्य में उनकी सरकार बनी व किसानों से ₹2500 प्रति क्विंटल से ज्यादा की कीमत पर धान की खरीद करेगी।अगले हफ्ते अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री का कार्यक्रम भी है।

इसी तरह अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस शासित राजस्थान में भी सभी 200 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है और उसकी तैयारियां तेज कर दी हैं। आम आदमी पार्टी सभी 200 एसेंबली इलाकों में पार्टी संगठन का विस्तार कर रही है।राजस्थान को भी चार जोन में बांटकर आम आदमी पार्टी रणनीति बना रही है। इसके साथ ही आम आदमी पार्टी कांग्रेस की गहलोत सरकार पर लगातार हमला बोल रही है और गांव-गांव गोलबंदी की मुहिम चला रही है।

 

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