अखिलेश अखिल
पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में एक नयी कहानी सामने आती दिख रही है। करीब 25 तक कांग्रेस और वाम दल के दूसरे के विरोधी रहे। एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे और करीब ढाई दशक तक सत्ता पर सी.पी.एम.काबिज रही। बंगाल से सी.पी.एम. की राजनीति जब जमींदोज हुई तो उसका आखिरी गढ़ त्रिपुरा ही बचा था। कहने को तो केरल में भी वाम दल की सरकार है लेकिन वह आती जाती रहती है। लेकिन त्रिपुरा का आखिरी किला भी वाम दल के हाथ से बीजेपी ने छीन लिया था। यह कोई मामूल घटना नहीं थी। वैसे भी पहले पूर्वोत्तर में बीजेपी का नामोनिशान नहीं था लेकिन बीजेपी की मौजूदा राजनीति ने न सिर्फ पूर्वोत्तर में सरकारें बनाई बल्कि त्रिपुरा से वाम दल को खदेड़कर अपने को स्थापित भी किया।
आज त्रिपुरा दोराहे पर खड़ा है। कहने को बीजेपी की पांच साल की सरकार पूरी हो गई है लेकिन विकास की जिस धारा की बात बीजेपी ने चुनाव पूर्व किया था ,वह संभव नहीं हो सका। अब फिर सामने चुनाव है। बीजेपी को सरकार में लौटने की चुनौती है तो वाम दल और कांग्रेस को अपनी पुरानी स्थिति में लौटने की बेताबी। पहले वाम दल सत्ता में रहती थी और कांग्रेस विपक्ष की राजनीति निभाती थी।
त्रिपुरा में 2018 में बीजेपी की सरकार तो बन गई थी लेकिन साल के भीतर ही पार्टी के भीतर घमासान शुरू हुआ और पार्टी के पांच विधायक निकल गए। दो विधायक कांग्रेस के साथ चले गए और बाकी के तीन विधायक अलग -अलग दलों में चले गए। अब जब सामने चुनाव है तो बड़ी घटनाएं घटती दिख रही है। एक तो बीजेपी के भीतर एकता की कमी रह गई है और जानकारी के मुताबिक़ कोई दर्जन भर विधायक पार्टी छोड़ने की तैयारी में है। ऐसा हुआ तो बीजेपी को बड़ा झटका लग सकता है। यही वजह है कि बीजेपी के आला अधिकारी और नेता बार -बार त्रिपुरा जा रहे हैं। अमित शाह खुद त्रिपुरा की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। वहां हिंदुत्व का डंका बजा रहे हैं।
दूसरी सबसे बड़ी घटना कांग्रेस और सीपीएम के गठजोड़ का है। दोनों दल जहां पहले सत्ता पक्ष और विपक्ष की भूमिका में थे अब साथ आ गए हैं। मकसद एक ही है कि किसी भी तरह से बीजेपी को हराया जाए। लेकिन क्या यह इतना संभव अब रह गया है। जानकार मानते हैं कि बीजेपी जहां पहुँच जाती है ,जल्दी हटती नहीं। और अगर वह चुनाव हार जाती है फिर भी सरकार बनाने में सफल हो जाती है। पूर्वोत्तर में पार्टी में टूट और एक साथ विधायकों का दूसरी पार्टी में चले जाने का इतिहास रहा है। सीटों के हिसाब से उत्तर पूर्व का राज्य त्रिपुरा कोई बड़ा राज्य नहीं है .त्रिपुरा में विधान सभा की 60 सीटें है। पिछले चुनाव में बीजेपी को करीब 43 फीसदी वोट मिले थे और 35 सीटों पर उसे जीत हाशिल हुई थी। सीपीएम को भी लगभग 43 फीसदी वोट ही मिले थे लेकिन उनकी सीटें मात्र 16 तक सिमट गई थी। कांग्रेस तो विल्कुल साफ़ हो गई थी और आईपीएफटी जैसी पार्टी को सात फीसदी वोट के साथ ही 8 सीटें भी हाथ लगी थी।
अब कांग्रेस और वाम दल साथ गए हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए दोनों पार्टियों ने गठबंधन कर लिया है। खबर के मुताबिक कांग्रेस महासचिव अजय कुमार और सीपीआई (एम) राज्य सचिव जितेंद्र चौधरी की शुक्रवार शाम बैठक हुई थी। इस बैठक के बाद दोनों पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के फ़ैसले की घोषणा की गई। कांग्रेस नेता अजय कुमार ने कहा, ”प्रदेश कांग्रेस की टीम ने रणनीति बनाने और सीट शेयरिंग को लेकर सीपीआई(एम) राज्य सचिव के साथ बैठक की. हम विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ेंगे। ”
उधर ,बीजेपी ने इस गठबंधन को लेकर कह रही है कि इससे पार्टी को और भी ज्यादा फायदा होगा। लेकिन बीजेपी के लिए त्रिपुरा की सता में बने रहना एक बड़ी चुनौती है। बीजेपी पहले ही यहां मुख्यमंत्री बदल चुकी है और उसका असर चुनाव पर पडने की सम्भावना है।
त्रिपुरा में फरवरी में चुनाव होने हैं। एक तरफ बीजेपी की कोशिश फिर से सत्ता में लौटने की है जबकि दूसरी तरफ वाम दल बीजेपी को हारने में जुटी है। वाम दल आज भी त्रिपुरा में काफी मजबूत है और माणिक सरकार की अपनी राजनीति त्रिपुरा के लोगों पर आज भी कायम है। उधर कांग्रेस का साथ मिलने के बाद गठबंधन की राजनीति ऊपर से देखने तो तो मजबूत लगती है लेकिन बीजेपी के वेब का सामना गठबंधन कितना कर सकेगा यही बड़ा सवाल है।

