BJP के लिए फ्री हिट? वंदे मातरम विवाद में सोनिया गांधी से हुई बड़ी चूक!

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मयंक जैन

क्रिकेट में एक ढीली गेंद मैच का रुख बदल सकती है। बल्लेबाज अवसर पैदा नहीं करता, बल्कि अवसर इसलिए आता है क्योंकि गेंदबाज उस पल को गलत समझ लेता है। राजनीति में भी ऐसे क्षण आते हैं। कोई इशारा, कोई दृश्य या कैमरे में कैद कुछ सेकंड कभी-कभी हजारों भाषणों से अधिक प्रभावशाली संदेश दे सकते हैं। कांग्रेस के एक कार्यक्रम में वंदे मातरम के गायन को लेकर हालिया विवाद ने ऐसा ही एक क्षण पैदा किया है। समर्थकों और आलोचकों ने इस घटना को अलग-अलग नजरिए से देखा है, लेकिन तत्काल राजनीतिक बहस से परे एक कहीं अधिक गहरा सवाल मौजूद है। आखिर एक सदी से भी अधिक पुराना गीत आज भी इतना जुनून, श्रद्धा और बहस क्यों पैदा करता है? इसका उत्तर बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय में मिलता है।

सोनिया गांधी के आलोचकों द्वारा दिया जाने वाला तर्क यह है कि यह घटना हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग के बीच वंदे मातरम की भावनात्मक गहराई को समझने में व्यापक विफलता को दर्शाती है। उनका कहना है कि हिंदू समाज आज दशकों तक औपनिवेशिक शासन और स्वतंत्रता के बाद की वैचारिक बहसों से बने नजरियों के जरिए अपनी परंपराओं को देखने के बाद अपनी सभ्यतागत विरासत को फिर से खोज रहा है। इसका चुनावी असर होगा या नहीं, यह मतदाताओं को तय करना है। लेकिन इस क्षण का राजनीतिक महत्व एक निर्विवाद तथ्य में निहित है। वंदे मातरम भारत की राष्ट्रीय कल्पना में सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक बना हुआ है।

बंकिम चंद्र और देशभक्ति की पवित्र भाषा

भारत के राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होने से पहले उसे खुद को एक राष्ट्र के रूप में कल्पना करना पड़ा था। बंकिम चंद्र इसे समझते थे। 1882 में प्रकाशित ‘आनंदमठ’ में उन्होंने केवल एक उपन्यास नहीं लिखा, बल्कि राष्ट्रीय जागरण की एक दृष्टि प्रस्तुत की। मातृभूमि को केवल भौगोलिक क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। वह भक्ति, त्याग और सेवा के योग्य एक जीवंत सभ्यतागत उपस्थिति बन गई।

“वंदे मातरम”, जिसका अर्थ है “हे माता, मैं तुम्हें नमन करता हूं”, इन शब्दों ने भूगोल को भावना में बदल दिया। भूमि केवल मिट्टी नहीं रही, वह मां बन गई। यही कारण है कि यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन की महान प्रेरणाओं में से एक बना। बंकिम ने भारतीयों को ऐसी भाषा दी, जिसके माध्यम से वे राष्ट्र के प्रति प्रेम को केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी व्यक्त कर सकते थे।

आनंदमठ का ब्रह्म-तेज और क्षात्र-तेज

‘आनंदमठ’ का सबसे गहरा संदेश संन्यासी के चरित्र में दिखाई देता है। बंकिम का संन्यासी जीवन से भागने वाला व्यक्ति नहीं है। वह पहले स्वयं पर विजय प्राप्त करता है और फिर कर्म की दुनिया में प्रवेश करता है। पहला युद्ध भीतर होता है। भय पर विजय पानी होती है। इच्छाओं को नियंत्रित करना होता है। मन को अनुशासित करना होता है। तभी व्यक्ति त्याग करने में सक्षम बनता है।

यही ब्रह्म-तेज, यानी ज्ञान, आध्यात्मिक अनुशासन, विवेक और आत्मसंयम, तथा क्षात्र-तेज, यानी साहस, कर्तव्य और अन्याय का विरोध करने की क्षमता का मेल है। बंकिम की प्रतिभा इन दोनों शक्तियों को एक साथ लाने में थी। साहस के बिना आध्यात्मिकता असहाय बन जाती है और विवेक के बिना साहस विनाशकारी हो सकता है। एक सभ्यता को दोनों की आवश्यकता होती है।

संन्यासी: जहां प्रार्थना कर्म में बदल जाती है

‘आनंदमठ’ के संन्यासी एक अनोखे विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे कार्य करने से पहले पूजा करते हैं। संघर्ष करने से पहले स्वयं को अनुशासित करते हैं। उनकी शक्ति घृणा से नहीं आती। वह किसी उच्च उद्देश्य के प्रति समर्पण से उत्पन्न होती है।

मंदिर और युद्धभूमि एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रार्थना कर्म को अर्थ देती है। अनुशासन साहस को शुद्धता देता है। यही कारण है कि बंकिम के अनेक प्रशंसक ‘आनंदमठ’ को ब्रह्म-तेज के क्षात्र-तेज में बदलने की अंतिम अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं।

अततायी: दुश्मन समुदाय नहीं, आचरण है

इस दृष्टि को समझने के लिए अततायी की शास्त्रीय अवधारणा को समझना आवश्यक है। अततायी की पहचान जन्म से नहीं होती। धर्म से नहीं होती। समुदाय से नहीं होती। अततायी की पहचान उसके कर्म से होती है।

शास्त्रीय भारतीय विचार में अततायी उस व्यक्ति को कहा गया है जो गंभीर आक्रामकता करता है—हथियारों से हमला करना, घरों में आग लगाना, दूसरों को विष देना, संपत्ति चुराना, जबरन जमीन पर कब्जा करना या दूसरों की सुरक्षा और गरिमा का उल्लंघन करना।

सिद्धांत सरल है। समाज को उन लोगों से निर्दोष लोगों की रक्षा करनी चाहिए जो जानबूझकर शांति को नष्ट करते हैं। इसलिए इस व्याख्या के अनुसार वंदे मातरम किसी भी धर्म के सामान्य नागरिकों के खिलाफ आह्वान नहीं है। यह आक्रामकता के खिलाफ आह्वान है। दुश्मन कोई पहचान नहीं है। दुश्मन विनाशकारी आचरण है। दुश्मन अततायी है।

वंदे मातरम विवादों में क्यों रहा?

वंदे मातरम को लेकर बहस आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद जितनी ही पुरानी है। इसकी पहली दो कड़ियां मातृभूमि की सुंदरता और समृद्धि का वर्णन करती हैं और उन्हें व्यापक रूप से स्वीकार किया गया।

बाद की पंक्तियों में दुर्गा से जुड़े चित्रण सहित हिंदू धार्मिक प्रतीकों से संबंधित भाव मौजूद हैं। ये पंक्तियां कुछ राजनीतिक और धार्मिक समूहों के बीच मतभेद का विषय बनीं। 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि आधिकारिक सार्वजनिक अवसरों पर केवल पहली दो कड़ियों का इस्तेमाल किया जाएगा।

इस निर्णय के समर्थकों ने इसे एक विविधतापूर्ण समाज के लिए स्वीकार्य प्रतीक बनाने के प्रयास के रूप में देखा। आलोचकों का तर्क था कि इससे बंकिम की रचना के मूल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थ को कमजोर किया गया। यह मतभेद कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।

धर्मनिरपेक्षता की दो दृष्टियां

इस बहस के केंद्र में दो अलग-अलग विचार हैं। एक दृष्टिकोण कहता है कि एक विविधतापूर्ण देश को अपने सार्वजनिक प्रतीकों में बदलाव करना चाहिए, ताकि प्रत्येक नागरिक खुद को उसमें शामिल महसूस करे।

दूसरा दृष्टिकोण कहता है कि किसी सभ्यता को अपने ऐतिहासिक प्रतीकों को केवल इसलिए कमजोर नहीं करना चाहिए क्योंकि वे बहुसंख्यक समुदाय की परंपराओं से उत्पन्न हुए हैं।

यही वंदे मातरम के पीछे का गहरा सवाल है। भारत सभ्यतागत निरंतरता और संवैधानिक समानता के बीच संतुलन कैसे बनाए?

अपने आत्मविश्वास को फिर से खोजता हिंदू समाज

हिंदू सभ्यतागत विचार से जुड़े कई चिंतकों का तर्क रहा है कि हिंदू समाज ने दशकों तक अपनी ही परंपराओं को रक्षात्मक नजरिए से देखा। सावरकर और सीताराम गोयल जैसे चिंतकों का कहना था कि किसी सभ्यता को अपने बौद्धिक संसाधनों के जरिए खुद को समझना चाहिए।

‘बौद्धिक क्षत्रिय’ का विचार इसी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसा विद्वान जो ज्ञान के जरिए विचारों की रक्षा करता है। ऐसा चिंतक जो शोध के माध्यम से स्मृति की रक्षा करता है। ऐसा व्यक्ति जो हथियारों से नहीं, बल्कि तर्कों के क्षेत्र में संघर्ष करता है।

इस व्याख्या में यह जागरण केवल राजनीतिक नहीं है। यह बौद्धिक और आध्यात्मिक भी है।

मोदी के सामने अवसर

हर राजनीतिक आंदोलन में ऐसे क्षण आते हैं, जब इतिहास एक अवसर पैदा करता हुआ दिखाई देता है। सवाल यह है कि नेतृत्व उस अवसर को पहचानता और उसे दिशा देता है या नहीं।

बीजेपी के समर्थकों का तर्क है कि वंदे मातरम को लेकर हालिया विवाद ने नरेंद्र मोदी के सामने ऐसा ही एक अवसर पैदा किया है। वे इसे बीजेपी के लिए बंकिम चंद्र की दृष्टि के राजनीतिक वाहक के रूप में खुद को प्रस्तुत करने का मौका मानते हैं—ऐसा भारत जो सांस्कृतिक आत्मविश्वास को आध्यात्मिक गहराई और राष्ट्रीय उद्देश्य के साथ जोड़ता है।

लेकिन बंकिम की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए केवल किसी प्रतीक का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं है। बंकिम केवल मुखरता की बात नहीं करते थे। वे परिवर्तन की बात करते थे। ‘आनंदमठ’ का संन्यासी इसलिए शक्तिशाली था क्योंकि वह अनुशासित था। वह इसलिए साहसी था क्योंकि उसकी जड़ें धर्म में थीं।

इसलिए बंकिम की विरासत का दावा करने वाले किसी भी नेता के सामने चुनौती यह है कि वह वंदे मातरम को केवल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि कर्तव्य, चरित्र और जिम्मेदारी के दर्शन के रूप में प्रस्तुत करे। महान राजनीतिक नेता केवल प्रतीकों को विरासत में नहीं लेते। वे उन प्रतीकों को अर्थ देते हैं।

राजनीतिक तस्वीरों की ताकत

आधुनिक राजनीति प्रतीकों से प्रभावित होती है। एक अकेला दृश्य कभी-कभी लंबी व्याख्या से कहीं अधिक प्रभावी संदेश दे सकता है।

बीजेपी के समर्थक यह तर्क दे सकते हैं कि वंदे मातरम को लेकर विवाद उन्हें राजनीतिक लाभ देता है, क्योंकि यह गीत लाखों लोगों के लिए गहरी भावनात्मक महत्ता रखता है। आलोचक उसी घटना को अलग तरीके से देख सकते हैं।

लेकिन राजनीति का एक सबक सार्वभौमिक है। प्रतीक मायने रखते हैं। वे स्मृति को आकार देते हैं। वे पहचान को आकार देते हैं। वे राजनीतिक कल्पना को आकार देते हैं।

बंकिम का अधूरा सवाल

बंकिम द्वारा ‘आनंदमठ’ लिखे जाने के एक सदी से अधिक समय बाद भी भारत उनके संदेश पर बहस कर रहा है। शायद यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

उन्होंने ऐसा गीत नहीं लिखा जो केवल उनके अपने समय का हिस्सा बनकर रह जाए। उन्होंने ऐसा गीत लिखा जो हर पीढ़ी को चुनौती देता रहता है।

सवाल केवल यह नहीं है कि भारत वंदे मातरम गाता है या नहीं। इससे भी गहरा सवाल यह है कि क्या कोई सभ्यता अपनी विरासत में फिर से आत्मविश्वास हासिल करते हुए शक्ति और विवेक को एक साथ जोड़ सकती है।

यही बंकिम की दृष्टि थी।

ज्ञान का जागरण।
साहस का जागरण।
चरित्र का जागरण।

ब्रह्म-तेज। क्षात्र-तेज।

बंकिम चंद्र की अधूरी क्रांति जारी है।

(नोट: मयंक जैन जाने माने लेखक और फिल्म निर्देशक हैं।)

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