किंग कोरोना को ध्यान में रखते हुए महामारी की प्रगति से मिला सबक’

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विकास कुमार
एक सदी पहले स्पैनिश फ्लू से 17 से 50 मिलियन लोगों के मारे जाने का अनुमान है। एक अनुमान है कि 2020 के बाद से कोविड ने 5.5 मिलियन लोगों की जान ली है, लेकिन क्या सरकारों ने इस पर अनावश्यक प्रतिक्रिया दी है?

वैज्ञानिकों को हाल ही में शेक्सपियर के रोमियो एंड जूलियट के क्लासिक उद्धरण की याद दिलाई गई। ‘नाम में क्या रखा है? गुलाब को हम किसी भी नाम से पुकारें लेकिन वह उतना ही खुशबूदार रहेगा’, लेकिन एक जर्मन डॉक्टर और राजनीतिज्ञ वोल्फगैंग वोडर्ग ने दावा किया कि इसका नया नाम सार्स कोव-2 था। इस कथन ने महामारी की दहशत को जन्म दे दिया। दूसरी तरह से उन्होंने तर्क दिया कि ये कुछ ऐसा ही है कि जाड़े में अन्य मौजूदा विषाणुओं के संक्रमण में आई वृद्धि के कारण का पता नहीं चल पाना। उन्होंने महामारी को ‘भूल की त्रासदी’ कहा है।

यह हमारे समय की कहानी है जिसमें वायरस के नए नाम ने उसे एक ‘शाही दर्जा’ दे दिया और उसे बिना नाम वाले सामान्य वायरस पर सर्वोच्चता की स्थिति प्रदान कर दी।

‘किंग कोराना’ को राज्याभिषेक हुआ और इसने बहुत कम समय में क्रूर बादशाह का दर्जा हासिल कर लिया। जहां भी कोरोना वायरस गया वहां लोग सड़कों से भाग गए, स्कूल और बाजारों से लोग भागकर अपने घरों में छिप गए।लोग खुद तो बाहर नहीं ही निकले साथ ही बच्चों को भी खुले में या पार्क में खेलने नहीं दिया। इस वायरस का कोई प्रतिरोध नहीं हुआ और ‘किंग कोरोना’ एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप में जीत हासिल करता चला गया।

अधिकतर देशों के शासकों ने आदेश दिया कि उनकी प्रजा जब भी घर से बाहर निकले तो चेहरा ढंक ले ताकि किंग कोरोना से कोई आकस्मिक मुठभेड़ ना हो जाए, लेकिन मजे की बात ये है कि शासकों और उनके दरबारियों को किंग कोरोना का कोई खौफ नहीं था। ऐसा लगता था कि राजा ने किंग कोरोना के साथ कोई गुप्त समझौता कायम कर लिया हो।

किंग कोरोना और दुनिया की सरकारों ने ‘भय को कुंजी’ के तौर पर इस्तेमाल किया। सरकारों ने अपनी रियाया को बताया था कि अगर किंग कोरोना को भूख लगेगी तो वह युवा और बूढ़े दोनों का शिकार कर लेगा।

राजा तो पूरी तरह से नंगा हो चुका था लेकिन किसी मासूम बच्चे तक ने इस ओर इशारा नहीं किया, इसलिए एक कायर योद्धा की तरह किंग कोरोना ने बूढ़े,बीमार,कमजोर,आलसी और मोटे लोगों को मार डाला। किंग कोरोना का युवाओं और स्वस्थ लोगों से कोई मुकाबला नहीं था। इसने युवाओं की खुशामद की और केवल बूढ़ों को काटा, लेकिन डर और दहशत से लोगों को पंगु बना दिया। कष्ट देने वाले विषयों से निपटने में उसने शासकों की भी खूब मदद की है।

शासकों (WHO और सरकारों) ने किंग कोरोना के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया। एक युद्धकोष बनाया गया और इसमें बड़े पैमाने पर धन जुटाया गया। कई देशभक्त कारोबारी इस जंग में मदद के लिए आगे आए और उन्होंने हथियार और गोला बारूद (वैक्सीन और वेंटिलेटर) से मदद की।सप्लायर्स ने आपातकालीन खरीद से पैसे बनाए और सरकारों ने कमीशन इकट्ठा किया।

गुजरते वक्त के साथ जब लोगों में घबराहट कम हुई तो दरबारियों और सलाहकारों ने चिंता के अन्य वैरिएंट्स की चर्चा छेड़ कर डर को कायम रखा, क्य़ोंकि बिना डरे तो पैसा नहीं बनाया जा सकता था। विस्मय में दरबारी फुसफुसाते थे कि वैरिएंट भले ही कमजोर हो लेकिन वे अभी भी किंग कोरोना के ही सहयोगी हैं।

जिन वैज्ञानिकों ने ये कहा कि 69 साल के लोग तक कोविड से संक्रमित होने के बावजूद 99 फीसदी तक जीवित बच गए उन्हें वाट्सएप ग्रुप में शांत करा दिया गया। आखिर वे वैज्ञानिक ऐसा क्या नहीं जानते थे जो कि ये शासक जानते थे? जब वैज्ञानिकों ने ये सुझाव दिया कि किंग कोरोना के प्रति लोगों के निरंतर जुनून से उनके सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है तो उनकी हंसी तक उड़ाई गई।

भगवद् गीता में कुछ शिक्षाएं दी गई है। भगवद् गीता के अध्याय 14,श्लोक 10 में बताया गया है कि- हम ‘तमस’, ‘रजस’ और सत्व के तीन गुणों के कारण वर्तमान में इस स्थिति में आए हैं। तमस अंधकार,विनाश और अराजकता का प्रतीक है जो महामारी के शुरुआती दिनों में हावी था। चूंकि किंग कोरोना के बारे में कुछ पता नहीं था इसलिए इससे लड़ने के लिए बनाए खराब योजनाओं की वजह से जनहानि हुई।

इस चरण के बाद रजस की स्थिति आई। रजस का प्रतीक जुनून(गलत दिशा),कार्रवाई(अक्सर गलत) और भ्रम था। ये स्थिति WHO की वजह से आई। अब तीसरे चरण ‘सत्व’ की ओर बढ़ने का समय है। सत्व अच्छाई,रचनात्मक कार्रवाई और सद्भाव का प्रतीक माना जाता है- यानी किंग कोरोना के नवीनतम वंशज ओमिक्रॉन के साथ सहजीवी संबंध बनाने का वक्त आ गया है। जीओ और जीने दो।

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