Tarapith mandir- मां तारा का है अलौकिक स्थान, तांत्रिक वामाखेपा को मां तारा ने दिया था साक्षात दर्शन

0
1320

विकास कुमार
पश्चिम बंगाल का बीरभूम जिला शक्ति पीठ के तौर पर प्रसिद्ध है। कोलकाता से दो सौ 22 किलोमीटर की दूरी पर तारापीठ मंदिर स्थित है। तारापीठ बंगाल का एक प्रसिद्ध सिद्धपीठ हैं तारापीठ मंदिर में तांत्रिक विधि से पूजा की जाती है। इस महातीर्थ में माता सती के आंख की पुतली का तारा गिरा था। इसलिए इसे तारापीठ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि तारापीठ राजा दशरथ के कुलपुरोहित वशिष्ठ मुनि से भी जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि प्राचीन काल में महर्षि वशिष्ठ यहां मां तारा की आराधना करते थे। वशिष्ठ ने ही उस समय यहां मंदिर का निर्माण करवाया था। लेकिन वशिष्ठ का बनाया तारा मंदिर जमीन के नीचे धंस गया। बाद में ‘जयव्रत’ नाम के एक व्यापारी ने तारापीठ के मंदिर को फिर से बनवाया।

मां तारादेवी के मंदिर का छत खास बंगाली शैली में बनाया गया है। इसकी छत ढलान वाली है जिसे ढोचाला कहा जाता है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर जो नक्काशी की गई है वो बेहद आकर्षक है। मंदिर में स्थापित देवी की मूर्ति में तीन आंखों को दिखाया गया है। गर्भगृह में मां तारा का निवास है जहां एक तीन फीट की धातु निर्मित मूर्ति है। मां तारा की मौलिक मूर्ति देवी के रौद्र और क्रोधित रूप को दिखाता हैं यहां प्रसाद के तौर पर तांत्रिक शराब भी चढ़ाते हैं। तंत्र शक्ति को मानने वालों के लिए कामाख्या की तरह ही तारापीठ का महत्व है। यहां पास में स्थित शमशान में जलने वाले शव का धुआं तारापीठ मंदिर के गर्भगृह तक पहुंच जाता है। तांत्रिक सिद्धि हासिल करने के लिए साधु तारापीठ आते हैं। मंदिर के निकट स्थित प्रेत-शिला में लोग पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान करते हैं।

तारापीठ से प्रसिद्ध संत और तांत्रिक वामाखेपा का नाम भी जुड़ा है। जिस तरह से रामकृष्ण परमहंस को मां काली ने दर्शन दिया था। ठीक उसी प्रकार तारापीठ के संत वामाखेपा को देवी ने दिव्यज्ञान दिया थां ऐसी मान्यता है कि मां महाकाली ने वामाखेपा को श्मशान में दर्शन दिया था। वामाखेपा ने महज 18 साल की आयु में सिद्धि हासिल की थी। काली पूजा की रात में वामाखेपा को साधना के दौरान मां तारा ने दर्शन दिए थे। 72 साल की आयु में तारापीठ के महाशमशान में वामाखेपा ने अपने प्राण त्याग दिए थे।

अघोरियों के लिए ये स्थान बेहद पवित्र माना जाता है। तारापीठ मुख्य मंदिर के सामने ही महाशमशान है। हैरानी की बात ये है कि तारापीठ मंदिर के पास से ही द्वारिका नदी बहती है। ये नदी दक्षिण से उत्तर की दिशा में बहती है। जबकि भारत की अन्य नदियाँ उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं।

तारापीठ मंदिर में एक अद्भूत शक्ति का एहसास होता है। लेकिन इस अनुभव को हासिल करने के लिए आपको तारापीठ मंदिर की यात्रा करनी होगी। एक बार जरुर तारापीठ मंदिर का दर्शन करें। आपके मन को शांति और सुख का अहसास होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here