अखिलेश अखिल
किसी की मौत पर राजनीति कैसे की जाती है, राहुल गाँधी से जुड़े हालिया मानहानि खेल को इसी सन्दर्भ में देखा जा सकता है। राहुल गाँधी की राजनीतिक हत्या करने की कोशिश चल रही है लेकिन बीजेपी इसमें भी अपनी राजनीति सेंक रही है। एक आदमी का राजनीतिक भविष्य एक अर्थहीन बयान की वजह से दाव पर लग गया इसकी चिंता बीजेपी को नहीं है। बीजेपी की चिंता इस बात की है कैसे इस अवसर का लाभ उठाया जाए। समुद्र की लहरों को गिनकर कैसे व्यापार को अंजाम दिया जा सकता है ,बीजेपी इसमें माहिर है। मौजूदा राजनीति को इसी सन्दर्भ में देखने की जरूरत है। साफ़ है कि बीजेपी को आगामी चुनाव में पराजय का भय है और उस भय की वजह से ही वह अब ओबीसी के अपमान का मुद्दा उठा रही है। ओबीसी वोट बीजेपी के लिए जरुरी है। अब तक ओबीसी के आसरे ही बीजेपी मैदान को फतह करती रही है।
अब मुद्दे की बात। राहुल गांधी ने अगड़ी जाति के दो भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर पिछले चुनाव के दौरान कर्नाटक के कोलार में हमला करते हुए साल किया था कि इन चोरों के नाम मोदी से ही क्यों शुरू होते हैं ? अपने बयान में राहुल ने ललित मोदी ,नीरव मोदी के साथ ही पीएम मोदी का भी नाम लिया था। बड़े साजिस के तहत राहुल को सजा भी दी गई। लेकिन बीजेपी को इस पर भी संतोष नहीं। उसने अब ओबीसी समाज के अपमान का मसला अब उठा दिया है। लेकिन सवाल यह है कि ललित मोदी और नीरव मोदी क्या ओबीसी समाज से आते हैं ? कोई जैन समाज से आता ही तो कोई मारवाड़ी समज से आता है। ये दोनों समाज के लोग सवर्ण हैं। हाँ प्रधनमंत्री मोदी जरूर पिछड़े समाज से आते हैं।
ऐसे बयानों से बचने की जरूरत
इसमें कोई संदेह नहीं है कि राहुल को इस तरह के सामान्यीकरण से बचना चाहिए। दो चार लोगों की गलतियों के लिए पूरे समाज को दोष नहीं दिया जा सकता है। लेकिन इसमें दो बातें ध्यान रखने वाली हैं। पहली तो यह कि मोदी नाम का कोई जातीय समुदाय नहीं होता है। कई जातियों और उपजातियों के लोग यह सरनेम लगाते हैं और दूसरा मोदी सरनेम वाले लोग ज्यादातर मामलों में पिछड़ी जाति के नहीं होते हैं। जैसे नीरव मोदी गुजरात के हैं और जैन समाज के हैं। इसी तरह ललित मोदी राजस्थान के मारवाड़ी हैं और वैश्य समाज के हैं। दोनों अगड़ी जाति में आते हैं। हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार भाजपा के नेता सुशील मोदी जरूर पिछड़ी जाति में आते हैं।
बहरहाल, एक तरफ भाजपा दो सवर्ण आर्थिक अपराधियों के मुद्दे को ओबीसी के अपमान में तब्दील करने में लगी है तो दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी इसे अदानी समूह के साथ जोड़ रही है। भाजपा कह रही है कि राहुल ने ओबीसी समुदाय का अपमान किया, जिसके लिए सूरत की अदालत ने उनको सजा दी है। इसमें भाजपा या सरकार का कोई हाथ नहीं है। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस मामले में यहां तक कहा कि नेहरू गांधी परिवार अपने लिए अलग आईपीसी बनाना चाहता है।
राहुल के सवाल पर कोई जवाब नहीं
इसके जवाब में कांग्रेस का कहना है कि राहुल गांधी ने अदानी समूह की आर्थिक गड़बड़ियों का मुद्दा उठाया था। उन्होंने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान अदानी और मोदी की एक विशेष विमान की तस्वीर दिखाई थी। राहुल ने आरोप लगाया था कि मोदी से दोस्ती के चलते अदानी को बचाया जा रहा है। कांग्रेस का दावा है कि इन आरोपों के बाद ही सरकार परेशान हुई और राहुल गांधी के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी हुई। कांग्रेस का कहना है कि लंदन में राहुल के भाषण के बहाने उनकी सदस्यता खत्म करने का प्रयास हुआ और जब लगा कि उससे काम नहीं चलेगा तो सूरत की अदालत के फैसले को बहाना बनाया गया। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता के बीच भाजपा अपना मुद्दा स्थापित करती है या कांग्रेस अदानी का मुद्दा बनाने में कामयाब होती है।
बीजेपी के लिए मिशन 2024 में ओबीसी वोट कितना अहम है?
अगर बीजेपी के लिए ओबीसी वोट बैंक की अहमियत समझनी है तो पिछले चुनावी नतीजों पर नजर डालने की जरूरत है। 1990 के दशक में मंडल की राजनीति का मुकाबला करने के लिए भगवा पार्टी को बहुत कठिन संघर्ष करना पड़ा और इसका काट उसने कमंडल (हिंदुत्व) में खोजने की कोशिश की। भले ही बीजेपी ने लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में कड़ी मेहनत की और 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव जीते और गठबंधन सहयोगियों के साथ एनडीए सरकार का गठन किया, लेकिन क्षेत्रीय दल बहुत मजबूत बने रहे। 1998 और 1999 में क्षेत्रीय दलों को क्रमश: 35.5% और 33.9% वोट मिले. इन क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक का एक बहुत बड़ा हिस्सा ओबीसी वोटों का है। यहां तक कि जब 2014 के लोकसभा चुनावों में 31% मतों के साथ बीजेपी ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया। क्षेत्रीय दलों को 39% वोट मिले थे. लोकनीति-सीएसडीएस नेशनल इलेक्शन स्टडीज के आंकड़ों के अनुसार 2014 के चुनावों में ओबीसी वोटों का 34% हिस्सा बीजेपी को जबकि 43% हिस्सा क्षेत्रीय दलों को मिला था।
2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने ओबीसी मतदाताओं के बीच बड़े पैमाने पर घुसपैठ की और क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक में सेंध लगाई। 2019 के चुनावों में क्षेत्रीय दलों का ओबीसी वोटों में शेयर घटकर 26.4% रह गया, जबकि बीजेपी ने बड़ी बढ़त हासिल करते हुए 44% ओबीसी वोट अपने पाले में किए। साफ़ है कि बीजेपी किसी भी सूरत में इस मुद्दे को आगे बढ़ाती रहेगी। मुद्दे को जगाना बीजेपी खूब जानती है।

