Supreme Court on Protest: धरना-प्रदर्शन के अधिकार और आम लोगों के कारोबार पर पड़ने वाले असर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि विरोध जताना संवैधानिक अधिकार है, लेकिन व्यापार और आजीविका भी उतने ही महत्वपूर्ण अधिकार हैं। किसी एक समूह को लंबे समय तक प्रदर्शन स्थल पर कब्जा बनाए रखने की छूट नहीं दी जा सकती।
मंगलवार को अदालत में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों के सिलसिले में दाखिल विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई हुई। इनमें पुलिस कार्रवाई, कथित अवैध हिरासत, आवाजाही में बाधा, पत्रकारों और वकीलों पर हमले तथा प्रदर्शन के कारण कारोबार प्रभावित होने जैसे मुद्दे शामिल थे।
‘दिहाड़ी मजदूर अपनी रोजी-रोटी कहां से कमाएगा?’
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि मामले में प्रदर्शनकारियों और व्यापारियों, दोनों पक्षों की दलीलें हैं। व्यापारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दावा किया कि प्रदर्शनों के कारण करीब 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। वहीं, मेनका गुरुस्वामी ने प्रदर्शनकारियों का पक्ष रखा।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि विरोध का अधिकार संवैधानिक है, लेकिन कारोबार चलाने और आजीविका कमाने का अधिकार भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि रास्ते और कामकाज प्रभावित होंगे तो दिहाड़ी मजदूर अपनी रोजी-रोटी कमाने कहां जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कोई भी समूह किसी प्रदर्शन स्थल पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकता। अन्य संगठनों, किसानों, श्रमिकों और आम लोगों को भी अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। प्रदर्शन के लिए जगह सीमित अवधि के लिए दी जा सकती है, ताकि दूसरे समूहों को भी मौका मिले।
एक दिन की अनुमति, 17 दिन तक प्रदर्शन का आरोप
तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी को एक दिन के प्रदर्शन की अनुमति मिली थी, लेकिन कथित तौर पर प्रदर्शन 17 दिनों तक जारी रहा। उन्होंने बिना अनुमति संसद की ओर मार्च करने और सुप्रीम कोर्ट परिसर में प्रदर्शन की कोशिश पर भी आपत्ति जताई।
इस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने निजता और CCTV निगरानी से जुड़े सवाल उठाए। अदालत ने CCTV को जरूरी बताते हुए सुनवाई जारी रखी।
वकीलों के शोर पर CJI ने लगाई फटकार
सुनवाई के बीच वकीलों के एक साथ बोलने और शोर करने पर CJI सूर्यकांत नाराज हो गए। उन्होंने अधिवक्ताओं को एक-एक करके अपनी दलील रखने की हिदायत दी और कहा कि अदालत में मछली बाजार जैसा माहौल नहीं होना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि उस समय आदेश भी लिखवाया जा रहा था। पीठ में CJI सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।

