उम्र बढ़ने के साथ कभी चश्मा रखकर भूल जाना, किसी का नाम अचानक याद न आना या चाबी कहीं छोड़ देना बहुत आम बात है।हम अक्सर इसे “बुढ़ापे का असर” कहकर हंसकर टाल देते हैं। लेकिन बात तब चिंता की बन जाती है जब ये भूलने की आदत रोज का आदत रोज का सिरदर्द बन जाए और घर के बुजुर्ग के पूरे बर्ताव को ही बदल दे।
भारत में आज के समय बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में करीब 88 लाख से ज्यादा बुजुर्ग डिमेंशिया या अल्जाइमर के साए में जी रहे हैं। ऐसे में परिवार के सदस्यों को यह समझना बहुत जरूरी है कि हर भूलने की आदत सिर्फ बुढ़ापा नहीं होती, कई बार यह दिमाग की बीमारी का इशारा होती है।
उम्रदराज लोगों को कोई पुरानी बात याद करने में थोड़ा वक्त लग सकता है, पर बाद में उन्हें याद आ ही जाता है। लेकिन अगर कोई इंसान अभी पांच मिनट पहले हुई बात भूल जाए, डॉक्टर का अप्वाइंटमेंट दिमाग से निकल जाए, या एक ही सवाल बार-बार दोहराने लगे तो यह खतरे की घंटी है। इसका मतलब है कि दिमाग नई जानकारी को सेव ही नहीं कर पा रहा है।
भारत में आज के समय बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है।एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में करीब 88 लाख से ज्यादा बुजुर्ग डिमेंशिया या अल्जाइमर के साए में जी रहे हैं। ऐसे में परिवार के सदस्यों को यह समझना बहुत जरूरी है कि हर भूलने की आदत सिर्फ बुढ़ापा नहीं होती, कई बार यह दिमाग की बीमारी का इशारा होती है।
जो माँ सालों से बिना नापे-तौले पूरे घर के लिए स्वादिष्ट खाना बनाती आई हैं, अगर वो अचानक अपनी ही खास रेसिपी भूलने लगें, मसालों में कन्फ्यूज होने लगें, या घर का टीवी रिमोट और वाशिंग मशीन चलाना उनके लिए पहेली बन जाए, तो इसे सामान्य भूलना मत मानिए. अपने रोजमर्रा के काम न कर पाना एक बड़ा संकेत है।
पैसों की छोटी-मोटी गलती किसी से भी हो सकती है। पर अगर घर का समझदार बुजुर्ग अचानक बिजली या पानी का बिल भरना भूल जाए, बैंक के लेन-देन में भारी गलतियां करने लगे या अचानक से अजीबोगरीब जगह अनाप-शनाप पैसे लुटाने लगे, तो समझ जाइये कि दिमाग की प्लानिंग और निर्णय लेने की क्षमता पर असर पड़ रहा है।
गाड़ी चलाते या पैदल चलते हुए कभी गलत मोड़ ले लेना आम बात है। पर जिस रास्ते से इंसान 20 साल से आ-जा रहा हो, अपने उस लोकल बाजार का रास्ता भूल जाना, या अपने ही मोहल्ले में भटक जाना बहुत गंभीर बात है. यह सामान्य याददाश्त की कमजोरी बिल्कुल नहीं है।
कभी-कभी किसी का नाम जुबान पर आकर अटक जाना अलग बात है, थोड़ी देर में याद आ ही जाता है. लेकिन अगर बातचीत करते वक्त सही शब्द ही न मिलें, वाक्य अधूरे छूट जाएं या वो बिल्कुल सीधी बात को भी न समझ पाएं, तो यह दिमागी बदलाव का लक्षण हो सकता है।
अगर कोई व्यक्ति अचानक बिना सोचे-समझे बड़े फैसले लेने लगे, धूप में मोटे ऊनी कपड़े पहनकर निकल जाए, या ऐसी लापरवाहियां करने लगे जिनसे वो हमेशा बचता था, तो यह साफ इशारा है कि सही और गलत को परखने की ताकत घट रही है।
जो इंसान पहले मोहल्ले के पार्क में बैठना पसंद करता था, पूजा-पाठ या रिश्तेदारों के आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता था, वो अचानक अकेला रहने लगे। दरअसल जब दिमाग काम करना कम करता है, तो इंसान को लोगों से बातचीत में झिझक होने लगती है और वो खुद को सबसे काट लेता है।
याददाश्त कमजोर होने का मतलब हर बार अल्जाइमर ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। कई बार बहुत ज्यादा डिप्रेशन, शरीर में विटामिन B12 की भारी कमी, थायराइड की बीमारी, नींद पूरी न होना या दवाओं के साइड इफेक्ट से भी याददाश्त कमजोर पड़ जाती है।
अच्छी बात यह है कि इनमें से ज्यादातर समस्याओं का इलाज मुमकिन है।सीधी सी बात यह है कि अगर बुजुर्ग की दिनचर्या और उनके बात करने के तौर-तरीके में अचानक बड़ा फर्क दिखने लगे, तो उसे बुढ़ापा समझकर नजरअंदाज न करें। सही समय पर न्यूरोलॉजिस्ट से जांच करवाएं ताकि बीमारी को बढ़ने से रोका जा सके।

