पटना: बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को अब आधुनिक तकनीक की मदद से नए सिरे से समझने और संरक्षित करने की तैयारी शुरू हो गई है। प्रदेश की पुरातात्विक धरोहरों के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए बिहार विरासत विकास समिति और IIT पटना के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
इस पहल के जरिए राज्य के प्राचीन गढ़ों, टीलों और अन्य महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों के भीतर छिपी पुरातात्विक संरचनाओं और अवशेषों का पता लगाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसका उद्देश्य विरासत स्थलों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण करने के साथ-साथ उनके संरक्षण की दिशा में ठोस तकनीकी आधार तैयार करना है।
LiDAR और GPR से जमीन के नीचे छिपे इतिहास की तलाश
MoU के तहत बिहार की चुनिंदा ऐतिहासिक धरोहरों का LiDAR सर्वे कराया जाएगा। इसके साथ ही GPR यानी Ground Penetrating Radar तकनीक के जरिए प्राचीन गढ़ों और टीलों की स्कैनिंग की जाएगी।
GPR तकनीक की मदद से जमीन के भीतर मौजूद संभावित संरचनाओं और पुरातात्विक अवशेषों की पहचान करने में सहायता मिलेगी। इससे बिना बड़े पैमाने पर खुदाई किए ऐतिहासिक स्थलों की संरचना और उनके नीचे छिपे संभावित अवशेषों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी जुटाई जा सकेगी।
AI करेगा आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण
इस पूरे अभियान में सिर्फ सर्वे और स्कैनिंग तक ही काम सीमित नहीं रहेगा। आधुनिक Artificial Intelligence (AI) तकनीक की मदद से सर्वे के दौरान जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया जाएगा। इससे बड़ी मात्रा में प्राप्त डेटा को व्यवस्थित करने और पुरातात्विक अध्ययन को अधिक तकनीकी एवं वैज्ञानिक बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
बिहार की विरासत को मिलेगी टेक्नोलॉजी की ताकत
इस पहल को बिहार की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। राज्य में मौजूद प्राचीन स्थलों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़ने का उद्देश्य यह है कि अतीत से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्यों को बेहतर तरीके से समझा, रिकॉर्ड किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जा सके।
IIT पटना के साथ मिलकर बनेगा विशेष Centre
आगे चलकर IIT पटना और कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार के संयुक्त प्रयास से एक विशेष Centre विकसित करने की भी योजना है। प्रस्तावित Centre में बिहार की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों का अध्ययन, तकनीकी दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक संरक्षण किया जा सकेगा।
इस Centre के जरिए तकनीक और पुरातत्व के बीच समन्वय को बढ़ावा देने तथा बिहार की विरासत से जुड़े शोध कार्यों को नई दिशा देने की योजना है।
कार्यक्रम में ये अधिकारी और विशेषज्ञ रहे मौजूद
MoU हस्ताक्षर के अवसर पर राज्य पुरातत्व के निदेशक श्री कृष्ण कुमार, भा.प्र.से., IIT पटना के निदेशक प्रो. टी. एन. सिंह, IIT पटना के रजिस्ट्रार डॉ. अक्षर पटेल, बिहार विरासत विकास समिति के कार्यपालक निदेशक प्रो. अनिल कुमार, डॉ. सप्तऋषि चौधरी और सुश्री तिष्य घोष समेत अन्य अधिकारी एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
बिहार की प्राचीन धरोहरों को अत्याधुनिक तकनीक से जोड़ने की यह पहल पुरातात्विक अनुसंधान, विरासत संरक्षण और तकनीकी दस्तावेजीकरण के क्षेत्र में नई संभावनाओं का रास्ता खोल सकती है।

