वैज्ञानिकों ने लैब में बनाया इंसानी कोशिका से ‘दिमाग’! बिजली के सिग्नल से कर रहा बात

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क्या आप सोच सकते हैं कि आपकी त्वचा की एक छोटी सी कोशिका से लैब के अंदर एक इंसानी दिमाग का हिस्सा तैयार किया जा सकता है? यह सुनने में भले ही यह हैरान कर देने वाला है, लेकिन अब यह हकीकत में हो रहा है। वैज्ञानिकों ने लैब में इंसानी कोशिकाओं से छोटे-छोटे जीवित दिमाग विकसित कर रहे हैं, जिन्हें ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स या मिनी इंसानी दिमाग कहा जा रहा है।इन मिनी दिमाग की सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि साइंटिफिक प्लेट (पेट्री डिश) में ये छोटे टुकड़े सिर्फ बेजान कोशिकाएं नहीं हैं, बल्कि ये आपस में बिजली के सिग्नलों के जरिए बात करते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं और यहां तक कि वीडियो गेम खेलना भी सीख रहे हैं!

रिसर्चर्स इंसानी कोशिकाओं को रीप्रोग्राम करके इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल्स में बदल रहे हैं। इसके बाद इन कोशिकाओं को न्यूरॉन्स यानी दिमाग की मूल कार्य प्रणाली कोशिकाएं में विकसित होने के लिए निर्देशित किया जाता है। सही परिस्थितियां मिलने पर ये कोशिकाएं खुद को 3D संरचनाओं में व्यवस्थित कर लेती हैं, जिन्हें मिनी-ब्रेन कहा जाता है। ये मिनी-ब्रेन पूरी तरह से वास्तविक इंसानी दिमाग जितने जटिल नहीं होते, लेकिन ये विकसित हो रहे इंसानी दिमाग की कई गतिविधियों को दर्शाते हैं।

ये ऑर्गेनॉइड्स सिर्फ दिमाग का एक मॉडल भर नहीं हैं, बल्कि यह जीवित और इंसानी कोशिकाओं से बने न्यूरल टिश्यू हैं। जैसे-जैसे ऑर्गेनॉइड के अंदर न्यूरॉन्स तैयार होते हैं, वे आपस में नेटवर्क बनाते हैं और इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स के माध्यम से बात करते हैं।वैज्ञानिक इन सिग्नल्स को डिटेक्ट भी कर सकते हैं और बाहर से इलेक्ट्रिकल सिग्नल देकर न्यूरॉन्स को उत्तेजित करने का भी काम कर सकते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो, वैज्ञानिक लैब में सिर्फ कोशिकाओं का समूह नहीं तैयार कर रहे, बल्कि एक जीवित न्यूरल नेटवर्क को बढ़ते और रिस्पॉन्ड करते हुए देख रहे हैं।

वैज्ञानिकों के पास इन मिनी-ब्रेन को विकसित करने के मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं-

अल्जाइमर और ऑटिज्म जैसी बीमारियों पर रिसर्च
इंसानी दिमाग में जिन बीमारियों पर रिसर्च करना बहुत कठिन और मुश्किल होता है, उन्हें इन ऑर्गेनॉइड्स की सहायता से आसानी से समझा जा सकता है

दवाओं की टेस्टिंग

जो दवा जानवरों पर काम करती है, वह इंसानों पर भी असरदार हो, यह जरूरी नहीं। मिनी-ब्रेन की सहायता से वैज्ञानिक दवाओं का सटीक परीक्षण इंसानी टिश्यू पर कर सकते हैं।इससे जानवरों पर टेस्ट करने की निर्भरता कम होगी।
अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने इस सेक्टर में बड़ा निवेश किया है।सितंबर 2025 में NIH ने स्टैंडर्डाइज्ड ऑर्गेनॉइड मॉडलिंग सेंटर के लिए 87 मिलियन डॉलर की घोषणा की थी, जो शुरुआत में लीवर, फेफड़े, हृदय और आंतों के मॉडल के बाद अब ब्रेन मॉडल पर भी काम करेगा। वहीं मार्च 2026 में, मानव-आधारित रिसर्च को बढ़ावा देने के लिए 150 मिलियन डॉलर से ज्यादा के अतिरिक्त फंड का ऐलान किया गया।

ये मिनी-ब्रेन एक्टिव है या नहीं ,इसका सीधा जवाब अभी नहीं है। वैज्ञानिकों के पास फिलहाल ऐसा कोई टेस्ट नहीं है जो यह बता सके कि कोई ब्रेन ऑर्गेनॉइड एक्टिव है या नहीं।इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी या किसी उत्तेजना पर प्रतिक्रिया देने का मतलब यह नहीं होता कि वह जीव चेतना का एक्सपीरियंस कर रहा है।

जुलाई 2026 में नेचर की एक रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई थी कि जो लोग मेडिकल रिसर्च के लिए अपने टिश्यू दान करते हैं, उन्हें यह अंदाजा भी नहीं होता कि उनकी कोशिकाओं का इस्तेमाल बायोलॉजिकल कंप्यूटिंग बनाने में किया जा सकता है। ऐसे में यह सवाल भी गहरा गया है कि क्या अपनी कोशिकाओं से बने बायोलॉजिकल कंप्यूटर पर डोनर का कोई अधिकार होगा या नहीं?

AI सिलिकॉन चिप्स, सॉफ्टवेयर और आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क का अभी प्रयोग करता है, लेकिन अब रिसर्चर्स एक ग्रुप ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस यानी OI प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं।साल 2023 में फ्रंटियर्स जर्नल में इस फील्ड का प्रस्ताव पेश किया गया था। जिसका टारगेट AI को खत्म करना नहीं, बल्कि जीवित न्यूरल टिश्यू को इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ मिलाकर एक नए तरह का कंप्यूटिंग सिस्टम बनाना है। जीवित न्यूरॉन्स बहुत ही कम ऊर्जा में और बहुत कम डेटा से सीखने का प्रयास करते हैं।

यह रिसर्च ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के एडवांस लेब में हो रही है।मेलबर्न स्थित बायोटेक स्टार्टअप कोर्टिकल लैब्स में रिसर्चर्स की टीम ने डिशब्रेन प्रोजेक्ट को विकसित किया है, जहां न्यूरॉन्स को चिप से जोड़कर Pong और Doom जैसे वीडियो गेम की ट्रेनिंग दी जा रही है।

इसके साथ ही अमेरिका की जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में रिसर्च टीम ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस तकनीक पर काम कर रही है, जिससे इंसानी दिमाग की कोशिकाओं से बायो-कंप्यूटर तैयार किया जा सके। अमेरिका का स्वास्थ्य संस्थान NIH स्टैंडर्डाइज्ड ऑर्गेनॉइड मॉडलिंग सेंटर के जरिए इन मिनी-ब्रेन और मानव-आधारित रिसर्च मॉडल्स को बड़े पैमाने पर फंड दिया जा रहा है।

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