US Tariff on India: रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिका में ऐसा विधायी कदम उठाया गया है, जिससे भारत के निर्यात कारोबार पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी सीनेट ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने से संबंधित प्रस्ताव को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी है।
इस घटनाक्रम पर Global Trade Research Initiative (GTRI) ने चिंता जताई है। संगठन के मुताबिक यदि प्रस्ताव आगे चलकर कानून बनता है तो भारत से अमेरिका जाने वाले कई उत्पादों की कीमत बढ़ सकती है और इसका सीधा असर निर्यात पर पड़ सकता है।
अभी पूरी तरह लागू नहीं हुआ है बिल
सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद यह प्रस्ताव अब सितंबर में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सामने रखा जाएगा। वहां भी इसे स्वीकृति मिलने पर बिल अमेरिकी राष्ट्रपति के पास जाएगा।
राष्ट्रपति की मंजूरी और हस्ताक्षर के बाद ही यह कानून का रूप लेगा। इसलिए फिलहाल इसे भारत पर लागू हो चुका टैरिफ नहीं माना जा सकता। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में रूस को दंडित करना बताया गया है।
रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर असर की आशंका
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल की खरीद जारी रखी है। इसी वजह से प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ का संभावित असर भारतीय उत्पादों पर पड़ सकता है।
यदि भारतीय सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लागू होता है, तो अमेरिका में उनकी लागत काफी बढ़ जाएगी। इसका परिणाम यह हो सकता है कि भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर पड़े और वहां उनकी मांग प्रभावित हो।
भारतीय एक्सपोर्ट को लग सकता है झटका
GTRI ने चेतावनी दी है कि अमेरिका में भारतीय सामान पर भारी टैरिफ लगाए जाने की स्थिति में भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर दबाव आ सकता है।
संगठन के अनुसार 2026 में भारत ने रूस से करीब 40.08 अरब डॉलर मूल्य का कच्चा तेल आयात किया है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों में चीन के बाद भारत प्रमुख खरीदारों में शामिल है।
रूसी तेल की खरीद ने भारत को अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कीमतों के दबाव से कुछ हद तक बचाने में भूमिका निभाई है। इसके चलते घरेलू स्तर पर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी को सीमित रखने और महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने में भी मदद मिली है।
चीन ज्यादा तेल खरीदता है, फिर भारत पर खतरा क्यों?
GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक चीन भारत की तुलना में रूस से ज्यादा तेल खरीदता है, लेकिन संभावित टैरिफ का खतरा भारतीय निर्यात के लिए अधिक गंभीर हो सकता है।
उनका तर्क है कि अमेरिकी बाजार में चीनी उत्पादों की श्रेणी काफी व्यापक है और वहां उनकी मांग भी बड़ी है। ऐसे में टैरिफ का प्रभाव दोनों देशों के निर्यात पर एक जैसा नहीं होगा।
भारत के लिए आगे क्या चुनौती?
अगर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से भी प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बनता है, तो भारतीय निर्यातकों के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है।
विशेषज्ञों की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि भारी आयात शुल्क के कारण भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो जाएंगे। इससे ऑर्डर, बिक्री, प्रतिस्पर्धा और निर्यात वृद्धि पर असर पड़ने की आशंका है।
हालांकि, अभी इस प्रस्ताव को कानून बनने की पूरी प्रक्रिया से गुजरना बाकी है। इसलिए वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम कानून में क्या प्रावधान रखे जाते हैं और उन्हें किस तरह लागू किया जाता है।

