सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मौखिक तौर पर यह बात दोहराई है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में मतदाता सूची से नाम कटने भर से किसी की नागरिकता अपने आप खत्म नहीं हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि वह बिहार एसआईआर पर अपने फैसले में ही यह बात स्पष्ट कर चुका है।
सुप्रीम कोर्ट में भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना ने प्रसेनजीत बोस नाम के याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। लाइवलॉ के अनुसार वे कई याचिकाओं के माध्यम से एसआईआर के बाद वोटर लिस्ट से बाहर हुए लोगों के लिए कई तरह की राहत चाहते हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत के सामने कहा कि बंगाल में जिनके नाम एसआईआर में कटे हैं, उनकी अपील पर सुनवाई की प्रक्रिया बहुत ही धीमी चल रही है।
लेकिन, फिर भी पश्चिम बंगाल सरकार ऐसे लोगों का नाम कल्याणकारी योजनाओं से काट रही है और उन्हें इसके लाभ से वंचित किया जा रहा है।
दलील दी गई कि जाति प्रमाण पत्र देने से भी मना किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया बिहार एसआईआर जजमेंट का हवाला
इन दलीलों पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि बिहार एसआईआर जजमेंट में ही अदालत ने कहा है कि नागरिकता तय करने के लिए चुनाव आयोग संवैधानिक अथॉरिटी नहीं है। उन्होंने कहा, ‘हम इससे वाकिफ हैं। बिहार एसआईआर जजमेंट में हमने साफ किया था कि जैसे ही (चुनाव आयोग का) कोई फैसला हो, चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी है कि नागरिकता कानून के तहत फैसला लेने के लिए उसे इसे मंत्रालय को भेजना होगा। जबतक यह नहीं होता, यथास्थिति बनी रहे।’
इसपर याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से कहा कि किसी ने नहीं सोचा था कि एसआईआर के बाद सरकार मतदाता सूची से नाम कटने वाले लोगों को अन्य लाभों से वंचित करना शुरू कर देगी। इसपर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारा जजमेंट स्पष्ट है, आर्टिकल 9, 10, 11 और 12 के संबंध में चुनाव आयोग संवैधानिक अथॉरिटी नहीं है,चुनाव आयोग का नियंत्रण वोटर लिस्ट पर है। वह किसी को नहीं शामिल करने का फैसला ले सकता है। लेकिन, इससे नागरिकता का दर्जा अपने आप खत्म नहीं हो जाता।

