इंडोनेशिया दौरे के बाद ऑस्ट्रेलिया पहुंचे पीएम मोदी का जमकर स्वागत हुआ है। ऑस्ट्रेलिया दौरे पर पीएम मोदी ने ऑस्ट्रेलिया से अहम समझौता किया है। यह समझौता यूरेनियम सप्लाई के लेकर दोनों देशों के बीच हुआ है।इसे भारत की एक बड़ी जीत माना जा रहा है।
भारत की एनर्जी से जुड़ी महत्वाकांक्षाएं को लेकर यह एक बड़े कदम के तौर पर दर्ज किया गया है।भारत में बिजली की भारी मांग है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया के पास ज्ञात यूरेनियम भंडार है, जिसका वह इस्तेमाल नहीं करता है। वहां कई कानूनी रुकावटों और राजनीतिक संवेदनशीलता की वजह से बिजनेस नहीं हो सका।
दोनों देश ने एक ज्वाइंट स्टेटमेंट भी जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि इस सिस्टम के तहत इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के तय सुरक्षा मानकों के दायरे में सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए लंबे समय तक यूरेनियम निर्यात किया जा सकेगा।
ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का 28% प्रतिशत यूरेनियम भंडार है। वह न तो न्यूक्लियर पावर का इस्तेमाल करता है और न ही न्यूक्लियर हथियार बनाता है। वह सारा यूरेनियम निर्यात कर देता है।इससे 1.4 अरब की आबादी वाला भारत 2047 तक 100 गीगावाट न्यूक्लियर पावर क्षमता को स्थापित करना चाहता है ताकि इससे 6 करोड़ भारतीय घरों को बिजली मिल सके। भारत ने पिछले दशकों में न्यूक्लियर पावर क्षमता को दोगुना किया है।कुल बिजली उत्पादन में न्यूक्लियर बिजली की हिस्सेदारी सिर्फ 3 प्रतिशत है जिसकी वजह यूरेनियम की कमी है।
भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण 1974 में ही किया था।1998 में परमाणु परीक्षण करने के बाद भारत पर इंटरनेशनल टेक्नोलॉजी बैन, और यूरेनियम बिजनेस पर रोक लगा दी गई थी। लेकिन हालात 2008 में बदले, जब न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप ने भारत को अपने सदस्यों से यूरेनियम खरीदने पर छूट दे दी थी।इसके अलावा दोनों देश मिलकर हिंद महासागर में ऑस्ट्रेलिया के कोकोस कीलिंग द्वीप पर एक अस्थायी स्पेस ट्रैकिंग टर्मिनल बनाएंगे।यह भारत के अंतरिक्ष उड़ान प्रोजेक्ट्स में मदद करेगा।
ऑस्ट्रेलिया न्यूक्लियर नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी को साइन करने वाला देश है।यह ट्रीटी अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस को ही परमाणु हथियार संपन्न देश मानती है और भारत जैसे परमाणु क्षमता वाले उन देशों को यूरेनियम बेचने से इनकार करती है, जिन्होंने इस संधि पर साइन नहीं किए हैं। भारत इस ट्रीटी को भेदभावपूर्ण बताता है।यह ट्रीटी उन्हीं देशों को संपन्न देश मानती है, जिन्होंने 1967 से पहले परमाणु उपकरणों का परीक्षण किया था।इस नियम के तहत भारत को परमाणु संपन्न देश का दर्जा नहीं मिल पाया है।
ऑस्ट्रेलिया पीएम अल्बानीज ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि यह व्यवस्था भारत को ऑस्ट्रेलिया यूरेनियम के निर्यात को आसान बनाती है ताकि, नॉन फॉसिल फ्यूल पावर क्षमता को विकसित किया जा सके।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एंथनी अल्बानीज के साथ बातचीत के बाद कहा है कि हमने आज न्यूक्लियर एनर्जी पर एक अहम समझौते पर साइन किए हैं।इससे ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम सप्लाई का रास्ता साफ होगा। हमारे क्लीन एनर्जी के लक्ष्यों को गति मिलेगी।

