कैसा हो अगर आप अपने मोबाइल के चार्जर की तरह एक डिवाइस को सॉकेट में लगाएं और वह आपके लिए बिजली बनाने लगे? दरअसल कई लोग घर पर सोलर पैनल इसलिए नहीं लगवा पाते क्योंकि एक तो उन्हें लगवाना महंगा होता है और दूसरा सोलर पैनल लगवाने के लिए अच्छी-खासी जगह की जरूरत होती है।
इन तमाम दिक्कतों को एक नई तरह की तकनीक बखूबी सुलझाती है, जिसका नाम प्लग-इन सोलर पैनल तकनीक है। आम भाषा में इसे प्लग एंड प्ले सोलर भी कहा जाता है।
इस तकनीक की खासियत है कि इसके लिए छत पर किसी तरह का तामझाम नहीं करना पड़ता और ना ही इसमें भारी वायरिंग, स्ट्रक्चर या लाखों का खर्च आता है। प्लग-इन सोलर पैनल को इस्तेमाल करना उतना ही आसान है, जितना अपने फोन को चार्जिंग पर लगाना। इसे आप अपनी बालकनी, दीवार या किसी भी छोटी धूप वाली जगह पर खुद ही इंस्टॉल कर सकते हैं। चलिए इसके बारे में डिटेल में समझते हैं।
इन तमाम दिक्कतों को एक नई तरह की तकनीक बखूबी सुलझाती है, जिसका नाम प्लग-इन सोलर पैनल तकनीक है। आम भाषा में इसे प्लग एंड प्ले सोलर भी कहा जाता है।
इस तकनीक की खासियत है कि इसके लिए छत पर किसी तरह का तामझाम नहीं करना पड़ता और ना ही इसमें भारी वायरिंग, स्ट्रक्चर या लाखों का खर्च आता है। प्लग-इन सोलर पैनल को इस्तेमाल करना उतना ही आसान है, जितना अपने फोन को चार्जिंग पर लगाना। इसे आप अपनी बालकनी, दीवार या किसी भी छोटी धूप वाली जगह पर खुद ही इंस्टॉल कर सकते हैं। चलिए इसके बारे में डिटेल में समझते हैं।
आसान भाषा मेें कहें, तो यह प्लग-इन सोलर टेक्नोलॉजी सोलर पैनल का रेडी-टू-यूज वर्जन है। पारंपरिक सोलर पैनल से अलग इसे इस्तेमाल करना फोन के चार्जर को इस्तेमाल करने जितना आसान है।
हालांकि प्लग-इन सोलर और फोन के चार्जर में फर्क ये है कि फोन का चार्जर बिजली इस्तेमाल करते है और प्लग-इन सोलर पैनल बिजली बनाता है।
इसमें मुख्य रूप से दो चीजें शामिल होती है। पहली सोलर पैनल जो धूप से डायरेक्ट कंरट बनाता है। दूसरी माइक्रो-इनवर्टर जो DC बिजली को घरों में इस्तेमाल होने वाले AC करंट में बदलता है।
प्लगःइन सोलर पैनल इस्तेमाल करने में काफी आसान होते हैं। इसके लिए सबसे पहले पैनल को ऐसी जगह रखना होता है, जहां अच्छी धूप आती है। इसे बालकनी, दीवार या छत कहीं भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके बाद पैनल के पीछे लगे माइक्रो-इनवर्टर के 3-पिन प्लग को किसी भी पावर सॉकेट में लगा दें।
इसके बाद सॉकेट का स्विच ऑन करें। इसके बाद सॉकेट के रास्ते उल्टी दिशा में आपके घर की वायरिंग में सप्लाई होने लगेगी।
ऐसा होने पर आपके घर के उपकरण जैसे कि फ्रिज, पंखा या टीवी पहले सोलर बिजली को खीचेंगे, जिससे आपके घर का बिजली मीटर धीमा हो जाएगा और बिल में उसका फर्क देखने को मिलेगा।
गौर करने वाली बात है कि इसे इस्तेमाल करने के लिए घर की मौजूदा वायरिंग या मीटर में कोई बदलाव नहीं करना पड़ता और इसे भारत में भी इस्तेमाल किया जा सकता है
प्लग-एंड-प्ले सोलर पैनल अपने पोर्टेबल नेचर के अनुसार पारंपरिक सोलर पैनल कनेक्शन के मुकाबले कम बिजली बनाते हैं।
अगर आप एक 800 वॉट का प्लग-इन सोलर सिस्टम लेते हैं, तो यह दिनभर में 2-3 यूनिट बिजली बनाते हैं।
औसतन सालभर में 800 वॉट का प्लग-इन सोलर सिस्टम आपको 600 से 800 यूनिट बिजली बनाकर दे सकता है।
अगर आप किराएदार हैं और छत पर फिक्स सोलर सिस्टम नहीं लगवा सकते, तो आफ प्लग-एंड-प्ले सोलर टेक्नोलॉजी का फायदा उठा सकते हैं।
जिन लोगों के पास फिलहाल ज्यादा पैसा लगाने की गुंजाइश नहीं है वे भी कम खर्च में प्लग-एंड-प्ले सोलर पैनल का इस्तेमाल कर सकते हैं।
अगर आप सोलर पर हैवी उपकरण नहीं चलाना चाहते, तो भी इसका इस्तेमाल कर सकेत हैं। आमतौर पर यह गार्डन शेड, मोटरहोम या फिर कंप्यूटर और इंटरनेट राउटर जैसे चुनिंदा डिवाइसेज के लिए अच्छा रहता है।
अगर घर में बड़ा सोलर सिस्टम लगवाने की जगह ना हो, तो भी इस पोर्टेबल सिस्टम को आजमाया जा सकता है।
प्लग-इन सोलर तकनीक पर आने वाला खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस क्वालिटी का सिस्टम ले रहे हैं और कितनी क्षमता वाला सिस्टम खरीद रहे हैं। अंदाजन एक 300W से 400W सिस्टम का छोटा सेटअप लगभग 25,000 से 35,000 में आ जाता है।
वहीं 800W वाला स्टैंडर्ड सिस्टम लगभग 50,000 से 75,000 रुपये तक में मिल सकता है। इसमें आमतौर पर दो पैनल और एक एडवांस माइक्रो-इनवर्टर शामिल होता है।

