कांग्रेस-टीएमसी-सपा, द्रमुक समेत लगभग सभी विपक्षी गठबंधन के 73 सांसदों ने शुक्रवार को ज्ञानेश कुमार पर संविधान तथा लोकतंत्र के खिलाफ काम करने का आरोप लगाते हुए राज्यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस सौंपा।
राष्ट्रपति को संबोधित इस नोटिस में सीईसी पर नौ आरोप लगाते हुए उनके कामकाज को शर्मनाक बताते हुए दावा किया गया है कि चुनाव आयोग के शीर्ष संवैधानिक पद की गरिमा के खिलाफ वे प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री के इशारे पर काम कर रहे हैं और इसलिए उन्हें पद से हटाया जाना चाहिए।
बंगाल में एसआइआर पर सुप्रीम कोर्ट से लेकर सियासी मैदान में जारी संग्राम के बीच बीते डेढ़ महीने में ज्ञानेश कुमार को घेरने के लिए विपक्षी दलों ने दूसरी बार महाभियोग प्रस्ताव को हथियार बनाने का दांव चला है।
राज्यसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक तथा पार्टी महासचिव जयराम रमेश तथा टीएसमी सांसद सागरिका घोष ने शुक्रवार को महाभियोग का यह नोटिस राज्यसभा के महासचिव को सौंपा।
विपक्षी दलों की सीईसी के खिलाफ इस ताजा पहल की जानकारी एक्स पर साझा करते हुए जयराम रमेश ने कहा कि 73 विपक्षी सांसदों ने राष्ट्रपति को संबोधित प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए एक नया नोटिस सौंपा है जिसमें ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का आग्रह किया गया है।
यह मांग 15 मार्च 2026 और उसके बाद उनके द्वारा किए गए कृत्यों और गलतियों के आधार पर सिद्ध के आधार पर की गई है जो संविधान के अनुच्छेद 324(5) को अनुच्छेद 124(4) के संदर्भ में दी गई है।
इसमें सीईसी के खिलाफ नौ विशिष्ट आरोप हैं जिन्हें बेहद विस्तार से दर्ज किया गया है और जिन्हें न तो नकारा जा सकता है और न ही दबाया जा सकता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर आरोप लगाते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि ज्ञानेश कुमार का इस पद पर बने रहना संविधान पर एक हमला है और यह पूरी तरह शर्मनाक है कि वह व्यक्ति अब भी पद पर बना हुआ है ताकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के इशारों पर काम कर सके।विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार पर अपने सभी नौ आरोपों का साक्ष्य और संदर्भ विस्तृत से दिया है।
इसमें पहला आरोप आदर्श आचार संहिता के पालन में लगातार पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने की बात उठाई गई है। पीएम तथा बीजेपी नेताओं के खिलाफ शिकायतों को नजरअंदाज करने तथा विपक्ष के नेताओं को तत्काल नोटिस जारी कर धमकाने के उदाहरण गिनाए गए हैं।
पक्षपात का दूसरा आरोप तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने लगाया है। इसमें तृणमूल कांग्रेस के सांसदों के प्रतिनिधिमंडल को अपमानित कर दफा हो जाने की बात कहने तथा आयोग के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर आठ अप्रैल 2026 की ‘स्ट्रेट-टॉक’ पोस्ट के जरिए एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की पक्षपातपूर्ण और सार्वजनिक निंदा का मुद्दा शामिल किया गया है।
साथ ही 18 अप्रैल को पीएम मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन के दौरान आचार संहिता का उल्लंघन करने को लेकर की गई शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं करने का भी जिक्र है।
एक अन्य आरोप में पश्चिम बंगाल में एसआइआर के दौरान लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाने तथा करीब 34 लाख मतदाताओं को न्यायिक आदेश द्वारा मताधिकार से बाहर करने को बेहद गंभीर बताते हुए कहा गया है कि पक्षपातपूर्ण तरीके से बड़ी संख्या में नागरिकों को वोट के अधिकार से वंचित करने की यह साजिशपूर्ण कार्रवाई है।
एक और आरोप में आधिकारिक पक्षपात की विशिष्ट और दस्तावेजी शिकायतों पर जानबूझकर कार्रवाई न करने की बात उठाते हुए भवानीपुर के रिटर्निंग अधिकारी तथा पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को लेकर की गई शिकायतें पर कोई कदम नहीं उठाने का जिक्र है।
बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश समेत22 अन्य राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में दोषपूर्ण एसआइआर भी आरोप के रूप में है तो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बार-बार प्रतिकूल न्यायिक टिप्पणियां और अनु 142 के तहत अकारण तमिलनाडु में नौकरशाहों के तबादलों और नियुक्तियों का निर्देश देने के लिए अपनी शक्ति का अवैध दुरुपयोग करने का आरोप भी ज्ञानेश कुमार पर लगाया गया है।
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस, टीएमसी, सपा, द्रमुक, वामपंथी दलों, शिवसेना समेत समान विचारधारा वाले अन्य विपक्षी दलों के सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। इसमें आम आदमी पार्टी के टूट से अलग रह गए दो सदस्य संजय सिंह और एनडी गुप्ता भी शामिल हैं।
देश के इतिहास में यह पहली बार बीते 12 मार्च को सीईसी के खिलाफ महाभियोग का नोटिस संसद के दोनों सदनों में दिया गया था। मगर सभापति और लोकसभा अध्यक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के लगाए सात आरोपों को निराधार बताते हुए महाभियोग नोटिस को खारिज कर दिया था।

