वर्तमान समय में कांग्रेस की कार्य समिति से लेकर अन्य कई प्रमुख सदस्यों के मुंह से निकलने वाले बोल कुछ इस तरह से हो गए हैं कि मल्लिकार्जुन खड़गे के कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहने के बावजूद ऐसा नहीं लगता है कि अध्यक्ष होंने के नाते वह कांग्रेस के नीति नियंता हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री के पद को लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और मुख्यमंत्री की कुर्सी झटक लेने के फिराक में लगे डीके सिंह कुमार के बीच के घटनाक्रम को लेकर मल्लिकार्जुन खुद निर्णय लिए पाने में अपने आप को असहज बताते हुए ऐसे मामले में निर्णय आला कमान के द्वारा लिए जाने की बात कह चुके हैं। ऐसा करते हुए ऐसा भी नहीं है कि लंबे समय से राजनीति में रहे मल्लिकार्जुन खड़गे को इस बात की जानकारी नहीं हो कि किसी पार्टी में अध्यक्ष से बड़ा दूसरा कोई पद नहीं होता है। ऐसे में उनके द्वारा किसी बड़े मुद्दे पर उनके द्वारा लिए गए निर्णय किसी अन्य के इशारे पर लिए गए निर्णय ही प्रतीत होते हैं।
अब चर्चा जिद कर कुछ समय तक कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहे राहुल गांधी की।राहुल गांधी 16 दिसंबर 2017 से 10 अगस्त 2019 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के अध्यक्ष रहे। उन्होंने अपनी मां सोनिया गांधी से यह पद संभाला था और 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद सोनिया गांधी ने फिर से अंतरिम अध्यक्ष के रूप में पार्टी की कमान संभाली। अपनी मां पर दबाव डालकर भले ही राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी संभाली थी लेकिन बाद में कांग्रेस कार्यकर्ता के दबाव की वजह से उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी गवानी पड़ी थी।आज भी कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता राहुल गांधी को अपना नेता मानने से इनकार कर रहे हैं, कईयों को तो राहुल गांधी ने दंड स्वरूप अलग-थलग कर दिया है। सचिन पायलट जैसे नेता इसके प्रत्यक्ष गवाह है।
मनी शंकरअय्यर ने कहा कि ममता दीदी के बिना, INDIA अलायंस का ‘I’, ‘N’, ‘D’, ‘I’ और सबकुछ खत्म हो जाएगा।क्योंकि ममता बनर्जी इस गठबंठन की नेता हैं।उन्होंने कह दिया कि राहुल गांधी को इस पद पर बने रहने की कोशिश करने के बजाय क्षेत्रीय दलों के नेताओं को आगे आने देना चाहिए।
मणि शंकर ने तो यहां तक कह दिया कि वह गांधीवादी हैं, नेहरू वादी हैं इंदिरावादी हैं, लेकिन राहुल वादी कतई नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी भी पूरी तरह से पार्टी के नीति नियंता नहीं दिखते हैं।
प्रियंका गांधी की तो ऐसी हैसियत अभी हुई ही नहीं है, क्योंकि इस दिशा में आगे बढ़ने पर उसे अपने ही परिवार की प्रतिद्वंदिता का सामना करना पड़ सकता है।
अब रही बात सोनिया गांधी की जिन्हें पर्दे के पीछे रहकर प्रधानमंत्री के पद तक को संचालित करने का अनुभव है, जिन्होंने राहुल गांधी की अध्यक्ष पद वाली नैया को डगमगाता देख सोनिया गांधी ने राहुल गांधी से इस्तीफ़ा दिलवा कर खुद अंतरिम अध्यक्ष बन बैठी और कांग्रेस को अपने परिवार के घेरे में ले लिया।भले ही कांग्रेस को मल्लिकार्जुन खड़गे के रूप में अध्यक्ष मिल गया है,लेकिन कांग्रेस की नीति नियंता के रूप में खड़गे नहीं सोनिया गांधी ही काम करती नजर आ रही हैं। तभी तो सोनिया गांधी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी इनके परिवार के तीनों सदस्य संसद के सदस्य बने हुए हैं।
2026 में, कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी की ताकत अब “सक्रिय अध्यक्ष” के रूप में नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक (Mentor) और ‘अंतिम निर्णयकर्ता’ (Final Arbiter) के रूप में है। हालांकि उन्होंने 2017 और फिर 2022 में अध्यक्ष पद छोड़ दिया था (और अब वे राजस्थान से राज्यसभा सांसद हैं), फिर भी पार्टी में उनका रसूख कम नहीं हुआ है।
सोनिया गांधी की वर्तमान ताकत के मुख्य बिंदु यहां दिए गए हैं:-
पार्टी के आम कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं के बीच आज भी राहुल गांधी से ज्यादा विश्वास और सम्मान सोनिया गांधी को मिलता है। उन्हें ‘संकटमोचक’ के रूप में देखा जाता है।
विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA bloc) को एकजुट करने में उन्होंने ‘बाइंडिंग फोर्स’ (जोड़ने वाली शक्ति) की भूमिका निभाई है। उनके शरद पवार, ममता बनर्जी जैसे विपक्षी नेताओं से व्यक्तिगत संबंध बहुत मजबूत हैं, जिससे गठबंधन को ताकत मिलती है।
मल्लिकार्जुन खड़गे अध्यक्ष जरूर हैं, लेकिन बड़े राजनीतिक निर्णयों, गठबंधन की शर्तों और राज्यों में मुख्यमंत्री चयन जैसे महत्वपूर्ण फैसलों में सोनिया गांधी की सहमति अनिवार्य मानी जाती है।
राहुल गांधी की तुलना में, सोनिया गांधी के पास पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं (जैसे G-23 समूह) को साधने की राजनीतिक परिपक्वता (maturity) और कूटनीतिक कौशल ज्यादा है।
उनका स्वास्थ्य अब उन्हें सक्रिय राजनीति (रैलियां, सभाएं) में भाग लेने से रोकता है। वह अब बहुत कम समय के लिए सक्रिय रहती हैं और पर्दे के पीछे से काम करना पसंद करती हैं।
