टाइफाइड आज भी कई इलाकों में एक गंभीर बीमारी बना हुआ है, जिसकी सबसे बड़ी वजह दूषित पानी और खाना है।साफ-सफाई की कमी वाले क्षेत्रों में इसका खतरा ज्यादा रहता है। समस्या यह भी है कि टाइफाइड को लेकर फैली गलत धारणियां लोगों को समय पर इलाज से दूर कर देती हैं।
टाइफाइड हर साल हजारों लोगों को प्रभावित करता है, खासकर उन जगहों पर जहां पीने का पानी सुरक्षित नहीं है।यह बीमारी साल्मोनेला टाइफी नाम के बैक्टीरिया से होती है और खाना या पानी इसके फैलने का मुख्य जरिया है।सही समय पर पहचान और इलाज से जान बचाई जा सकती है, लेकिन कई मरीज देर से अस्पताल पहुंचते हैं।
एक आम गलतफहमी यह है कि टाइफाइड हमेशा बहुत तेज बुखार से ही शुरू होता है जबकि हकीकत में इसकी शुरुआत हल्के बुखार, सिरदर्द, कमजोरी या पेट की परेशानी से भी हो सकती है।शुरुआती लक्षण सामान्य लगने की वजह से लोग इसे वायरल समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।
कई लोग यह भी मानते हैं कि अगर भूख ठीक है तो टाइफाइड नहीं हो सकता।जबकि सच्चाई यह है कि हर मरीज में भूख खत्म होना जरूरी नहीं होता।खासकर बच्चों और युवाओं में शुरुआती दिनों में बीमारी ज्यादा गंभीर नहीं लगती, लेकिन अंदर ही अंदर इंफेक्शन बढ़ता रहता है।
यह धारणा भी गलत है कि साफ घरों में टाइफाइड नहीं हो सकता। बीमारी का सीधा संबंध सिर्फ घर की सफाई से नहीं है। दूषित पानी, कच्ची सब्जियां, बाहर का खाना या बर्फ भी इंफेक्शन की वजह बन सकते हैं, चाहे घर कितना ही साफ क्यों न हो।
एक और खतरनाक मिथक यह है कि बुखार उतरते ही एंटीबायोटिक बंद कर देना चाहिए। ऐसा करना बेहद नुकसानदायक हो सकता है। अधूरा इलाज बैक्टीरिया को पूरी तरह खत्म नहीं करता, जिससे बीमारी दोबारा लौट सकती है और दवाओं का असर भी कम हो सकता है।
कई लोग यह भी सोचते हैं कि टाइफाइड का टीका लगवाने के बाद जीवनभर सुरक्षा मिल जाती है।जबकि टीके का असर समय के साथ कम हो जाता है और यह सभी स्ट्रेन से पूरी सुरक्षा नहीं देता। इसलिए टीका लगने के बाद भी लक्षण दिखें तो जांच जरूरी है।
टाइफाइड से बचाव के लिए सिर्फ दवाओं पर भरोसा काफी नहीं है।साफ पानी पीना, खाने में सावधानी, सही समय पर जांच और पूरा इलाज बेहद जरूरी है। लगातार बुखार या टाइफाइड जैसे लक्षण दिखें तो बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क करना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।
