लालू यादव के सिंगापुर से लौटने का बिहार में बेसब्री से इंतजार

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  • बीरेंद्र कुमार झा

लालू यादव के सिंगापुर से लौटने का बिहार में बेसब्री से इंतजार। आरजेडी-जेडीयू में सुधाकर और डील की बात पर अटकी सांस।

बिहार में राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के आगमन का बेसब्री से इंतजार है। लालू पिछले कई महीने से सिंगापुर में हैं। इसी महीने उनके भारत लौटने की संभावना है। महागठबंधन के घटक दलों में आरजेडी और जेडीयू को लालू के आते ही कई फैसलों की प्रतीक्षा है। इसे इन दलों के लोग सार्वजनिक तो नहीं कर रहे, लेकिन भीतर ही भीतर सबकी सांसें अटकी हैं। आरजेडी की सांस इसलिए अटकी है कि उसे अपने विधायक सुधाकर सिंह के बारे में फैसला लेना है। बार-बार आरजेडी की ओर से यही कहा गया है कि लालू प्रसाद आएंगे, तभी सुधाकर पर कोई फैसला होगा। जेडीयू की सांसें इसलिए टंगी हैं कि कहीं शर्तों के मुताबिक नीतीश कुमार को गद्दी न छोड़नी पड़े। वहीं विपक्ष में बैठी बीजेपी भी महागठबंधन में अनबन से आनंद लेने की फिराक में लालू के बिहार आने कैंतजार कर रही है।

कुशवाहा को किनारे कर जेडीयू ने निभाया गठबंधन धर्म ।

बागी नेता उपेंद्र कुशवाहा के प्रति सख्ती दिखा कर जेडीयू ने गठबंधन धर्म का पालन किया है। उपेंद्र कुशवाहा अपने नेता नीतीश कुमार के प्रति जितना तल्ख तेवर अपनाये हुए हैं, उससे कम आक्रोश उन्हें आरजेडी को लेकर नहीं है। पहले उन्होंने आरजेडी पर ही आरोप लगाया था कि उसके शीर्ष नेतृत्व की बीजेपी से मिलीभगत है। बाद में यही बात उन्होंने अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं के बारे में कही। हद तो तब हो गयी, जब उन्होंने जगदेव प्रसाद की जयंती समारोह में लालू-नीतीश राज में बिहार की दुर्गति की चर्चा कर दी। जाहिर है कि कुशवाहा के इस तरह के चाल – चलन से आरजेडी आहत हुआ है। जेडीयू ने आरजेडी की नाराजगी का ख्याल रखते हुए उपेंद्र कुशवाहा को फिलहाल उन्हें किनारे कर दिया है। उपेंद्र कुशवाहा को अब पार्टी की बैठकों में शामिल भी नहीं किया जा रहा है।जेडीयू ने उनके पार्टी कार्यक्रमों पर रोक लगा दी है। आरजेडी की नाराजगी से बचने के लिए जेडीयू ने उपेंद्र कुशवाहा को अकेला छोड़ दिया है। पार्टी से उनके निष्कासन और उनकी विधान परिषद की सदस्यता रद्द करने की औपचारिकता पूरा करना अभी बाकी है।

सुधाकर सिंह पर लटकी है निष्कासन की तलवार।

लालू के आने से सबसे बड़ा खतरा सुधाकर सिंह के सिर पर मंडरा रहा है। आरजेडी ने उन्हें शो कॉज दिया और उन्होंने जिस तरह से उसका का जवाब दिया है, वह तकनीकी रूप से सही होते हुए भी व्यावहारिक रूप से महागठबंधन धर्म के खिलाफ है।

सुधाकर सिंह अभी भी अपने बयान पर काबिज हैं।

सुधाकर सिंह ने ने उस आदमी (नीतीश कुमार ) के बारे में अपशब्द कहे हैं, जो महागठबंधन का अभी सर्वमान्य नेता है और बिहार में महागठबंधन सरकार का मुखिया है। सुधाकर सिंह ने इस बात का भी ख्याल नहीं रखा। ऊपर से अपनी बात पर यह कह कर अड़े हैं कि उन्होंने जो कहा, वह पार्टी लाइन के खिलाफ नहीं है। साथ ही उन्होंने अपनी पार्टी आरजेडी पर भी तोहमत लगा दिया कि अकेले उनको शो कॉज देकर ए टू जेड की अवधारणा को खत्म किया जा रहा है। लालू के बाद आरजेडी में दूसरे बड़े नेता तेजस्वी यादव ने सभी जातियों को आरजेडी से जोड़ने के लिए ए टू जेड का नारा दिया था। सुधाकर सिंह के तेवर देख कर ऐसा लग रहा है कि वे भी आर-पार के मूड में हैं। लालू पर एक नैतिक दबाव यह भी होगा कि जब जेडीयू ने उपेंद्र कुशवाहा को शंट कर दिया है तो उसे सुधाकर सिंह को लेकर भी यही अपेक्षा होगी।

लोकसभा चुनाव के लिए लालू प्रसाद महागठबंधन वाली सरकार को देंगे विशेष मंत्र।

लालू प्रसाद किडनी ट्रांसप्लांट के बाद शारीरिक रूप से कितना सक्रिय हैं, यह तो उनके यहां यहां आने पर ही पता चलेगा। फिर भी यहां आने के बाद वे महागठबंधन की नीतीश कुमार की अगुआई वाले सरकार को सलाह तो दे सकते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारियां भी महागठबंधन को करनी हैं। महागठबंधन में लोकसभा के लिए सीटों का बंटवारा भी कठिन काम होगा। साथ ही उपेंद्र कुशवाहा बार-बार जेडीयू – आरजेडी एक डील की बात कर रहे हैं।इन सब बातों की स्थिति स्पष्ट करने की जिम्मेवारी यहां आने के बाद लालू प्रसाद पर ही होगी। डील के बारे में यही कहा जाता है कि नीतीश कुमार अपनी पार्टी का आहिस्ता-आहिस्ता आरजेडी में विलय कर देंगे और 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर राष्ट्रीय राजनीति में खुद को लगाएंगे और बिहार की गद्दी तेजस्वी यादव को सौंप देंगे। डील की इस बात में कितनी सच्चाई है, यह भी लालू प्रसाद के बिहार आने बिहार पर ही स्पष्ट होने की उम्मीद जताई जाती है।

नीतीश कुमार जा सकते हैं केंद्रीय राजनीति में।

नीतीश कुमार भले ही यह कह लें की वे पी एम के रेस में नहीं हैं, लेकिन विपक्षी एकता के बहाने वे अंदर ही अंदर पी एम की कुर्सी के लिए अपनी गोटी सेट करने में लगे हुए हैं।ऐसे में नीतीश को अगर सच में राष्ट्रीय राजनीति का रुख करना है तो, इसके लिए उनके पास अब ज्यादा समय नहीं बचा है। वैसे नीतीश कुमार पहले से ही यह भी कह चुके हैं कि इस महीने होने वाले विधानसभा के बजट सत्र के बाद वह देश के दौरे पर निकलेंगे ।उनके इस अभियान में लालू प्रसाद की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।लिहाजा उन्हें भी लालू प्रसाद के बिहार आने का बेसब्री से इंतजार है।

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