
नेपाल के जनकपुर से दो बड़े ट्रकों में लाद कर लाई जा रही है शालिग्राम शिलाएं, कुशीनगर जनपद पहुंची। यूपी – बिहार बॉर्डर पर स्थित कुशीनगर जनपद में इस इलाके पहुंचने पर लोगों ने इस का भव्य स्वागत किया। राम शिलाओं के दर्शन के लिए यहां लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। विश्व हिंदू परिषद ने रामशिला के स्वागत कार्यक्रम का आयोजन किया।कुशीनगर बॉर्डर पर सलेमगढ़ के पास एनएच 28 के टोल पर इस रामशिला का स्वागत कार्यक्रम का आयोजन किया गया । ये दोनो रामसिला नेपाल के जनकपुर से लाई जा रही है जो अयोध्या के जाई जायेगी। वहां इससे श्री राम लला की प्रतिमा का निर्माण होगा। मंगलवार की रात गोरखपुर में विश्राम के बाद यह सुनाएं अयोध्या की ओर प्रस्थान करेंगी।
राम और सीता के पवित्र प्रेम के साथ भारत – नेपाल के घनिष्ठ संबंध की याद दिलाएगी ये शिलाएं।
अयोध्या और नेपाल के बीच एक बार फिर त्रेतायुग का संबंध ताजा होने जा रहा है।गौरतलब है कि अयोध्या में बन रहे भव्य राम मंदिर में रामलला की मूर्ति के लिए नेपाल से करोड़ों वर्ष पुरानी शालिग्राम शिलाएं आ रही हैं। इन शिलाओं को नेपाल के पोखरा से 50 किमी दूर गंडकी नदी से लाया जा रहा है। हालांकि जो पत्थर नेपाल से आ रहे हैं उन्हें अयोध्या पहुंचने के बाद मूर्तिकारों को दिखाया जाएगा और अगर कोई समस्या आती है तो विकल्प के रूप में ओडिशा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश से भी इसी तरह के पत्थर मंगाए जा रहे हैं।
6 करोड़ वर्ष पुरानी है ये राम शिलाएं।डेढ़ करोड़ वर्ष और मजबूत रहेगी ये शिलाएं।
नेपाल से शालिग्रामशिलाएं मंगाये जाने की बात करें तो इसके पीछे यह वजह है कि जिस तरह भारतवासियों ने राम मंदिर के निर्माण में बढ़-चढ़कर सहयोग कर रहे हैं, उसी तरह नेपाल के लोग भी राम मंदिर के निर्माण में सहयोग करना चाहते हैं। इसके लिए करीब सात महीने पहले नेपाल के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री बिमलेन्द्र निधि ने राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट के समक्ष प्रस्ताव रखा था कि राम मंदिर निर्माण में जनकपुर की तरफ से कुछ योगदान लेना चाहिए। गौरतलब है कि बिमलेन्द्र निधि जानकी यानी सीता माता की नगरी जनकपुरधाम के सांसद भी हैं। भारत सरकार और राम मंदिर ट्रस्ट की तरफ से हरी झंडी मिलते ही नेपाल सरकार ने देखा कि जब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण इस तरह से किया जा रहा है कि दो हजार वर्षों तक भी उसे कुछ नहीं हो पाये तो फिर मंदिर में लगने वाली मूर्ति भी उस तरह की होनी चाहिए जो उतने समय तक चल सके। इसके लिए नेपाल सरकार ने मंथन शुरू किया और बाद में कैबिनेट की बैठक में पवित्र काली गंडकी नदी के किनारे निकलने वाले शालीग्राम के पत्थरों को अयोध्या भेजने के लिए अपनी सहमति दे दी। सहमति के बाद इस तरह के पत्थर को ढूंढ़ने के लिए नेपाल सरकार ने विशेषज्ञों की एक टीम बनाई और गंडकी नदी क्षेत्र में भेजी। इस टीम ने अयोध्या भेजने के लिए जिन दो पत्थर का चयन किया वह छह करोड़ साल पुराना है। बताया जा रहा है इसकी आयु अभी भी एक लाख वर्ष तक रहने की बात बताई गई है।
-बीरेंद्र कुमार झा
