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पितरों को आदर देने का पर्व है पितृपक्ष , ऋषि नेमि ने की थी पितृपक्ष की शुरुआत

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इस वर्ष पितृ पक्ष का प्रारंभ 18 सितंबर से हो रहा है। पितृपक्ष का विषद वर्णन गरुड़ पुराण में मिलता है। इसके अलावे कई अन्य धर्म ग्रंथों में भी इसका उल्लेख है।एक कथा के अनुसार महाभारत के युद्ध में जब लाखो निर्दोष लोग मारे गए और उनका कोई नाम लेने वाला तक नहीं बचा तो भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को बुलाकर उनका श्राद्ध करने के लिए कहा।भीष्म पितामह ने उन्हें बताया कि पुराण में यह बताया गया है कि ऋषि नेमि अपने पुत्र के असमय मृत्यु से बहुत दुखी थे।इससे घबराकर उन्होंने अपने पूर्वजों का आह्वान करना शुरू कर दिया था। तब उनके पूर्वजों ने उन्हें बताया कि तुम्हारा पुत्र पितृ देवों के बीच स्थान प्राप्त कर चुका है।पितरों के आह्वान के समय उन्होंने पितरों को भोजन अर्पित किया था। उस समय से यह आह्वान पितरों को समर्पित माना गया है और यह पक्ष पितृ पक्ष कहलाता है।

पितृ पक्ष के 15 दिनों की अवधि के दौरान यह माना जाता है कि हमारे पूर्वज हर वर्ष इस काल में भोजन और पानी की मांग करने धरती पर आते हैं। जब उनकी यह उम्मीद पूरी होती है, तब वे अपने परिजनों को आशीर्वाद देकर वापस लौट जाते हैं।

हिंदू धर्म में देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण,ये 3 ऋण माने जाते हैं।इनमें पितृ ऋण को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है।माता-पिता किसी व्यक्ति को इस धरती पर लाते हैं और उसे संस्कारों से सुसज्जित कर आदर्श मानव बनाते हैं।इसलिए उनका ऋण चुकाना अत्यावश्यक है और पितृपक्ष में पिंडदान करना भी पितृ ऋण चुकाने के कर्मों में शामिल है।

पितृ पक्ष में पिंड दान करने की महत्ता है।पिंड दान में कुल का वंशज अपने पितरों को भोजन प्रदान करने के लिए पिंड दान करते हैं।पिंड दान की प्रक्रिया में चावल के आटा में तिल का प्रयोग कर गोलाकार आकृति बनाई जाती है।यह गोलाकार आकृति पिंड कहलाता है और इसकी पुजाविधि पिंड दान कहलाता है।यह पूर्वजों के मोक्ष प्राप्ति हेतु किया जाने वाला एक अनुष्ठान है।पिंड दान की यह प्रक्रिया उस तिथि को की जाती है ,जिस तिथि को व्यक्ति की मृत्यु हुई हो।जो वंशज अपने पूर्वजों का पिंड दान गया में करना चाहते हैं,उन्हें पहले अपने घर में एकोदिष्ठ श्राद्ध करना होता है। एकोदिष्ठ श्राद्ध पूर्वज की मृत्यु की तिथि को ही होता है।

पूर्वजों के गया में पिंडदान को लेकर प्रचलित कथा के अनुसार गयासुर एक विष्णु भक्त असुर था। वह हमेशा भगवान विष्णु की भक्ति किया करता था। उसकी भक्ति से देवता भयभीत हो गए और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान विष्णु देवताओं के साथ उस स्थान पर गए जहां गयासुर तपस्या कर रहा था। भगवान विष्णु ने उससे तपस्या का कारण पूछा तो उसने यह बताया कि वह सभी देवताओं और स्थानों से पवित्र होने की चाहत रखता है।भगवान ने उसे यह वर दे दिया।इसके बाद गयासुर ने उसका दुरुपयोग शुरू कर दिया और पापियों को अपने शरीर का स्पर्श करवाकर उन्हें बैकुंठ भेजने लगा। तब यमराज ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से शिकायत की।इसके बाद योजना बनाकर गयासुर से उसका शरीर यज्ञ के लिए मांगा गया।गयासुर अपने शरीर को पांच कोस तक फैलाकर दक्षिण मुख करके लेट गया।तब उसके शरीर पर यज्ञ हुआ। जिस जगह पर गयासुर लेटा था और यज्ञ हुआ था वह जगह आज का गया शहर है,जो बिहार राज्य में स्थित है। जब भगवान विष्णु ने गयासुर के शरीर के टुकड़े किए तो वह विष्णुपद मंदिर में गिरा। गयासुर ने भगवान विष्णु से मृतात्माओं के लिए भी वरदान मांगा, यही वजह है कि जब पूर्वजों के उद्धार के लिए गया में पूजा की जाती है तो वह उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

धर्म शास्त्र के अनुसार पितृपक्ष अशुभ नहीं होता है और न ही इसमें किसी भी तरह के मांगलिक कार्य करने की कोई मनाही है,जैसा कि कुछ लोग कहते हैं। संतानों को लेकर किया जानेवाला जीमूतवाहन अर्थात जीतीया जैसा महापर्व तो इसी अवधि में होता है।दरअसल पितृपक्ष पूर्वजों का काल या उत्सव है,इसलिए इस दौरान हम उन पर ज्यादा ध्यान देते हैं बनिस्पत किसी तरह के मांगलिक कार्य करने के।

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