RBI ने क्यों कहा पुरानी पेंशन योजना लागू करना बेहद खतरनाक है 

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न्यूज़ डेस्क 
देश जाए भाड़ में,राजनीतिक दलों का एजेंडा चलता रहे। मौजूदा राजनीति का यही शगल है और इसी शगल में सभी पार्टियां आगे बढ़ती दिखती है। पार्टी को लाभ मिले और सरकार बने इसी सोच के साथ पार्टियों की कहानी आगे बढ़ती है और यह ऐसा खेल है जिसे कोई गलत नहीं कह सकता। इस खेल में सभी राष्ट्रीय पार्टियां तो शामिल है ही क्षेत्रीय पार्टियां भी यही सब करती है। मकसद सिर्फ एक ही है। और वह है वोट पाने की राजनीति।

इधर कांग्रेस लगातार पुरानी पेंशन योजना को लागू करने का अभियान चला रखी है भारतीय रिजर्व बैंक ने सोमवार कुछ राज्यों के पुरानी पेंशन स्कीम पर जोर देने को लेकर चेताया है। पहले राजस्थान ,छत्तीसगढ़ में यह योजना लागू की गई और अब हिमाचल में इस योजना को लागू किया गया। चुनाव के दौरान कांग्रेस ने हिमाचली लोगों को यही कहा था। लोगों ने वोट डाला। कांग्रेस की जीत हुई और फिर कांग्रेस की सुख्खू सरकार ने अपने वादे को पूरा कर दिया।

उधर आरबीआई इस तरह के खेल से परेशान है। आरबीआई ने कहा कि राज्य पुरानी पेंशन स्कीम लागू करते हैं तो उन्हें वित्तीय प्रबंधन के लिए एक बड़ा खतरा है। सोमवार को आरबीआइ ने राज्यों के वित्त व्यवस्था पर सालाना रिपोर्ट जारी की है जिसमें कोरोना महामारी के बाद राज्यों की वित्तीय स्थिति को काफी आशाजनक बताया है लेकिन पुरानी पेंशन स्कीम को लेकर चिंता जाहिर की है।

रिजर्व बैंक ने कहा कि पुरानी पेंशन स्कीम को लागू करने से वित्तीय बचत की जो बातें हैं वो कम समय के लिए ही कारगर हैं। आज वित्त का जो खतरा है उसे आगे आने वाले समय में टालने से राज्यों के सामने यह खतरा खड़ा हो जाएगा कि उन्हें आगे चलकर एक बड़े दायित्व को उन्हें पूरा करना होगा और इसके लिए उन्होंने कोई कोष का इंतजाम भी नहीं किया है।

हिमाचल प्रदेश, झारखंड, पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान समेत कई विपक्षी शासित राज्यों ने परिभाषित लाभ योजना में वापसी की घोषणा की है, जिसमें सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को मासिक पेंशन के रूप में प्राप्त अंतिम वेतन का 50% देने का वादा किया गया है।

आरबीआई की ताजा रिपोर्ट उस समय आई है जब जब देश में ओपीएस एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। इस साल कुछ बड़े राज्यों में चुनाव है और कई राज्य भी पुरानी पेंशन स्कीम को लागू करने की योजना पर काम कर रहे हैं। दूसरी तरफ,कई आर्थिक जानकार यह कह चुके हैं कि यह कदम राज्यों के भविष्य पर एक बड़ा बोझ लादने जैसा है।

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