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कांग्रेस ने वाईएस शर्मिला को आँध्रप्रदेश का अध्यक्ष घोषित किया है। पार्टी के आतंरिक संगठन में बड़े बदलाव के तहत शर्मिला को राज्य पार्टी की कमान सौपी गई है। कांग्रेस चाह रही है कि आंध्रा परदेश के लोकसभा और विधान सभा चुनाव में पार्टी की स्थिति मजबूत हो। कॉंग्रेस्सस के इस बदलाव के साथ ही अब आंध्रा प्रदेश में भाई और बहन एक दूसरे के खिलाफ राजनीति करते नजर आएंगे। बता दें कि अभी आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी की सरकार है और वह वाईएस शर्मिला के भाई है।
4 जनवरी को वाईएसआर तेलंगाना पार्टी की अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी की बहन वाई.एस. शर्मिला कांग्रेस में शामिल हुईं थी । दिल्ली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सांसद राहुल गांधी की मौजूदगी में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा था।
कांग्रेस में शामिल होने के बाद वाई.एस. शर्मिला ने कहा था, “मैं वाईएसआर तेलंगाना पार्टी का कांग्रेस पार्टी में विलय करते हुए बहुत खुश हूं। मुझे बहुत खुशी हो रही है कि वाईएसआर तेलंगाना पार्टी आज से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का हिस्सा बनने जा रही है। कांग्रेस पार्टी अभी भी हमारे देश की सबसे बड़ी धर्मनिरपेक्ष पार्टी है।”
बता दें कि शर्मिला राजनीतिक परिवार से हैं और आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की राजनीति का जाना-माना चेहरा हैं। उनके पिता वाई एस राजशेखर रेड्डी अविभाजित आंध्र प्रदेश के सबसे बड़े नेताओं में शामिल थे। वाई.एस शर्मिला ने हाल ही में हुए तेलंगाना विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अपना समर्थन देने की घोषणा की थी। उन्होंने चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाले भारत राष्ट्र समिति के कथित भ्रष्ट और जनविरोधी शासन को खत्म करने के लिए कांग्रेस को समर्थन देने की बात कही थी।
तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार बनाने के बाद आंध्रा प्रदेश में कांग्रेस क्या कुछ कर पाती है इसे देखने की जरूरत है। माना जा रहा है कि आँध्रप्रदेश में लड़ाई बड़ी हो सकती है। एक तरफ जगन की पार्टी सत्ता में है तो दूसरी तरफ चंद्रबाबू नायडू की पार्टी तेलगु देशम पार्टी भी सत्ता में लौटने की तैयारी में जुटी हुई है। उधर बीजेपी भी पूरी तैयारी के साथ अपनी रणनीति बना रही है। बीजेपी को लग रहा है कि अगर आंध्र प्रदेश की राजनीति में भी उसकी पकड़ मजबूत होती है तो दक्षिण का दरबाजा उसके लिए फिर से खुल सकता है। लेकिन अब शर्मिला के कांग्रेस में आने और पार्टी की कमान मिलने के बाद आंध्र की राजनीति किस मोड़ पर पहुँचती है इसे देखने की बात होगी।

