बीरेंद्र कुमार झा
जम्मू कश्मीर मामले पर सुनवाई के दौरान सातवें दिन सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि क्या आप अनुच्छेद 370 खत्म करने की केंद्र की मंशा का आकलन करने की न्यायिक समीक्षा चाहते हैं? अदालत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा के दौरान यदि उसमें कोई उल्लंघन पाया गया तो यह अदालत हस्तक्षेप भी करेगी। संविधान पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कि क्या आप हमसे अनुच्छेद 370 निरस्त करने के सरकार के निर्णय के अंतर्निहित विवेक की न्यायिक समीक्षा करने को कह रहे हैं?
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ,न्यायमूर्ति संजय किशन कॉल, संजीव खन्ना, बी गवई और सूर्यकांत की संविधान पीठ ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सातवें दिन की बहस के दौरान यह सवाल किया।इसका जवाब देते हुए याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा कि मैं संविधान के साथ की गई धोखाधड़ी की बात कर रहा हूं।उन्होंने कहा कि इस मामले में सत्ता का संसदीय प्रयोग पूरी तरह से सत्ता के रंग में रंगा हुआ था।
दवे ने पीठ से कहा कि ऐसा महज इसलिए किया गया क्योंकि जम्मू कश्मीर की विधानसभा भंग कर दी गई थी और इस प्रकार संसद के पास शक्ति थी और राष्ट्रपति के पास अनुच्छेद 356 के तहत शक्ति थी। वरिष्ठ अधिवक्ता दवे ने बहस को आगे बढ़ते हुए कहा कि आप इतिहास विशेष कर संवैधानिक इतिहास दोबारा नहीं लिख सकते। उन्होंने कहा कि सरकार के पास अनुच्छेद 370 (3) के तहत अनुच्छेद 370 को हटाने का कोई अधिकार नहीं है।उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने की कवायद तेज संविधान के साथ पूर्ण धोखाघड़ी है।
बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में अनुच्छेद 370 हटाने का किया था वायदा
संविधान पीठ से कहा कि केंद्र की सत्ता में बैठी बीजेपी ने अपनी घोषणा पत्र में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का वादा किया था। दवे ने कहा कि शीर्ष कोर्ट ने फैसला दिया था कि राजनीतिक दलों की यह घोषणा पत्र संवैधानिक योजना और भावना के खिलाफ नहीं हो सकते। दवे ने शीर्ष न्यायालय से कहा कि राष्ट्रपति कोई रबड़ स्टांप नहीं है, बहुमत बोलता नहीं है,वह कोई घटक शक्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि केंद्र की ओर से जम्मू कश्मीर में विकास व अन्य बातें करना कोई मायने नहीं रखता। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 हटाना और राज्य को केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करना पूरी तरह से राजनीतिक फायदे के लिए किया गया है।
अनुच्छेद 370 खत्म क्या जाना कानूनी शक्ति का दुरुपयोग
वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने की कानूनी शक्ति का दुरुपयोग बताया। दवे ने संविधान पीठ के समक्ष बेरुबारी संघवाद मामले में उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 इसी का प्रतिबिंब है। दवे ने पीठ से कहा कि मुझे पिछले कई दिनों तक अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा इस बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।मैने बस इसका उल्लेख करना उचित समझा।वह मेरी सहायता कर रहे हैं। बेरुबारी संघ वाद मामले में शीर्ष न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का भाग मानते हुए कहा था कि संसद को इसमें संशोधन करने का अधिकार नहीं है।
दवे ने पीठ से कहा कि आप (देश ) एक राज्य के लोगों को अपने में शामिल होने के लिए प्रेरित करते हैं।लेकिन जिन शर्तों के साथ वे ( जम्मू कश्मीर के लोग) शामिल होते हैं, फिर उसका उल्लंघन होता है। इस पर जस्टिस गवई ने कहा कि वहां के महाराजा कुछ शर्ते चाहते थे? इसके जवाब में दवे ने कहा कि हां, यह ऐतिहासिक संदर्भ है, लेकिन महाराजा ने कुछ शर्तें भी रखी और इसमें अनुच्छेद 370 का प्रावधान किया गया और इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। दवे ने कहा कि राष्ट्रपति अकेले ही संविधान सभा के प्रस्ताव पर कार्रवाई कर सकते हैं।
संवैधानिक आदेशों को 1957 के बाद लागू क्यों किया गया
वरिष्ठ अधिवक्ता दवे ने कहा किया अनुच्छेद अपना जीवन जी चुका है और अपना उद्देश्य प्राप्त कर चुका है। अनुच्छेद 370 (1 )इसलिए बचा हुआ है क्योंकि यदि बाद में संविधान में संशोधन होता है और नए अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर में भी लागू किए जाते तो उस खंड का उपयोग किया जा सकता है। जहां तक अनुच्छेद 370( 3 )का संबंध है, राष्ट्रपति कार्यकारी अधिकारी बन गए
इस पर मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यदि संविधान सभा के समाप्त होने के बाद अनुच्छेद 370 ने अपना पूरा कर लिया है, तो संवैधानिक आदेशों को 1957 के बाद लागू क्यों किया गया? लेकिन यह तथ्य कि अनुच्छेद 370 ने अपना उद्देश्य पूरा किया उसके बाद लागू किए गए संवैधानिक आदेशों से झूठ लाया गया है इसलिए अनुच्छेद 370 अस्तित्व में बना रहा।
मुख्य न्यायाधीश ने दवे से कहा कि यदि आपका कथन खंड 3 के संबंध में सही है तो 1957 में संविधान सभा द्वारा अपना कार्य पूरा करने के बाद कोई भी संवैधानिक संशोधन नहीं हो सकता है।लेकिन इसे संवैधानिक प्रथा में ही झुठलाया गया है। संवैधानिक संशोधन हुए और 2019 तक होते रहे। मुख्य न्यायाधीश ने कहा यदि आप यह कह रहे हैं कि 370 (1) एक का अस्तित्व बना हुआ है तो फिर आप यह नहीं कर सकते हैं कि अनुच्छेद 370 (3 )का अस्तित्व समाप्त हो गया है। या तो सब कुछ एक साथ रहता है या सब कुछ एक साथ नष्ट हो जाता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता दवे ने इस पर कहा कि यह केवल संवैधानिक संशोधन द्वारा ही किया जा सकता था। उन्होंने कहा कि एक कहानी यह कहीं जाती है कि अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है, यह कहानी पूरी तरह से गलत है। उन्होंने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। यहां तक कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी इस कहानी को खारिज किया था। संविधान सभा की बहस से ही यह पता चलता है कि अनुच्छेद 370 को जारी रहना था। दबे ने पीठ से कहा का अनुच्छेद 370 (3 ) का उपयोग करके अनुच्छेद 370 को निरस्त नहीं किया जा सकता है।
