बीरेंद्र कुमार झा
जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर बुधवार को चौथे दिन भी सुनवाई हुई। इस दौरान संविधान पीठ ने कहा कि 1947 में भारत में शामिल हुए जम्मू-कश्मीर सहित पूरे देश के लिए एक ही संविधान लागू है।अनुच्छेद 370 पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सवाल पूछा कि क्या 1957 के बाद विधानसभा और संसद ने राज्य के संविधान को भारतीय संविधान के दायरे में लाने के बारे में कभी नहीं सोचा? इसका जवाब देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि जम्मू कश्मीर का संविधान अलग है। यह राज्य का अपना संविधान है क्योंकि इसे जम्मू कश्मीर की संविधान सभा ने बनाया था।
जिसने बनाया सिर्फ वही हटा सकता था अनुच्छेद 370
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि जम्मू कश्मीर के संविधान में बदलाव करने की शक्ति सिर्फ उस निकाय के पास हो सकती है, जिसने उसे बनाया। जम्मू कश्मीर का संविधान वहां के संविधान सभा ने बनाया था। वरिष्ठ अधिवक्ता व पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम याचिकाकर्ताओं में से एक एम इकबाल खान की तरफ से पक्ष रख रहे थे।
जम्मू कश्मीर में अपनाया गया संविधान भारतीय था: जस्टिस खन्ना
वरिष्ठ अधिवक्ता सुब्रमण्यम के इस जवाब पर जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि1954 के आदेश के पहले भाग को पढ़ने से तो यह स्पष्ट हो गया कि जम्मू कश्मीर में भारतीय संविधान को अपवादों और संशोधनों के साथ अपनाया गया था।उन्होंने कहा कि आप इसे जम्मू कश्मीर का संविधान कर सकते हैं, लेकिन जो अपनाया गया था, वह संविधान भारतीय संविधान था। जस्टिस खन्ना ने कहा कि अनुच्छेद 370 बहुत लचीला है। उन्होंने कहा कि आमतौर पर संविधान समय और स्थान के साथ लचीले होते हैं, क्योंकि संविधान एक बार बनते हैं, लेकिन लंबे समय तक बने रहते हैं ।उन्होंने कहा कि यदि आप अनुच्छेद 370 को ही देखें ,जो यह कहता है कि इसमें संशोधन किया जा सकता है और जम्मू-कश्मीर पर लागू होने वाले भारत के संविधान में जो कुछ भी हो रहा है उसे आत्मसात कर लिया जाए।
एक तरफा व्याख्या संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं
जस्टिस खन्ना के सवाल के जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता सुब्रमण्यम ने कहा कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों की एकतरफा व्याख्या करना संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होगा। उन्होंने कहा कि मामले को देखने के कई नजरिए हो सकते हैं।पहला ऐतिहासिक, दूसरा लिखित ,तीसरा सैद्धांतिक, और आखरी ढांचागत। सुब्रमण्यम ने कहा कि ये सभी संवैधानिक व्याख्या के तरीके हैं , आप जिस भी नजरिए से देखेंगे, उसका परिणाम एक ही होगा। इस पर याचिकाकर्ताओं की ओर से एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता जफर शाह ने कहा कि अनुच्छेद 370 को समझने के लिए अलग – अलग नजरिया है।अधिवक्ता जफर शाह ने कहा कि जम्मू कश्मीर के महाराजा ने भारत के साथ समझौता किया था। उन्होंने रक्षा और विदेश मामलों के अलावा बाकी सभी शक्तियां अपने पास रखी थी।इसमें कानून बनाने की शक्ति भी शामिल है।यह एक तरह से दो देशों के बीच का समझौता था।
राष्ट्रपति के पास अनियंत्रित शक्ति नहीं
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि राष्ट्रपति के पास अनियंत्रित शक्ति नहीं है।उन्होंने संविधान पीठ को बताया कि अनुच्छेद 370 खंड 1 के तहत शक्ति का उद्देश्य आपसी समझ के सिद्धांत पर आधारित है। उन्होंने पीठ को बताया कि विलय के समय जम्मू-कश्मीर अन्य राज्यों की तरह नहीं था। उसका अपना संविधान था ।वरिष्ठ अधिवक्ता सुब्रमण्यम ने कहा कि हमारे संविधान में विधानसभा और संविधान सभा दोनों को मान्यता प्राप्त है। उन्होंने कहा कि मूल ढांचा दोनों के संविधान से निकाला जाएगा ।सुब्रमण्यम ने कहा कि डॉ भीमराव अंबेडकर ने संविधान के संघीय होने और राज्यों को विशेष अधिकार देने की वकालत की थी।
अनुच्छेद 370 हटाना राष्ट्रपति द्वारा शक्ति का था एक तरफा प्रयोग
वरिष्ठ अधिवक्ता सुब्रमण्यम ने कहा कि जम्मू कश्मीर और भारत के बीच यह व्यवस्था संघवाद का एक समझौता था। उन्होंने कहा कि संघवाद एक अलग तरह का सामाजिक अनुबंध है,और अनुच्छेद 370 इस संबंध का ही एक उदाहरण है।वरिष्ठ अधिवक्ता ने पीठ से कहा कि इस संघीय सिद्धांत को अनुच्छेद 370 के अंतर्गत ही पढ़ा जाना चाहिए। अनुच्छेद 370 को निरस्त नहीं किया जा सकता है ।सुब्रमण्यम ने पीठ को बताया इस मामले में राष्ट्रपति के द्वारा शक्ति का एकतरफा प्रयोग किया गया था।
370 का जम्मू कश्मीर वह भारत के बीच विशेष रिश्ता
वरिष्ठ अधिवक्ता जफर शाह ने पीठ को बताया कि अनुच्छेद 370 व इसके प्रावधानों का जम्मू कश्मीर और भारत के बीच एक विशेष रिश्ता है और इसे कायम रखा जाना चाहिए था।
