भाप बनकर उड़ गए थे लोग, गीता पढ़ते थे परमाणु बम बनाने वाले ओपेनहाइमर

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बीरेंद्र कुमार झा

न्यूयार्क में जर्मन अप्रवासी के रूप में रह रहे एक यहूदी परिवार में जन्मे परमाणु बम बनाने वाले वैज्ञानिक ओपेन हाईमर का जीवन कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान में लाखों लोगों की जान लेने वाले परमाणु बम को बनाने वाले ओपेनहाईमर भगवत गीता पढ़ा करते थे।हालांकि उनके हाथों जो होना था वह हो गया,लेकिन बाद में वे इसके लिए पश्चाताप की आग में जलते रहे और परमाणु मिशन को रोकने की दवाई देते रहे।हालांकि उनकी एक न सुनी गई और उल्टे उन्हें गद्दार घोषित कर दंडित किया गया ।

परमाणु बम परीक्षण के धमाके के मध्य मुंह से निकला गीता के श्लोक का भावार्थ

ओपेनहाईमर की जीवनी लिखने वाले शेरविन देवारा के अनुसार जब उनके द्वारा बनाए गए परमाणु बम का टेस्ट होने जा रहा था, तब वे ढंग से सांस तक नहीं ले पा रहे थे। एक रात पहले वह सोए तक नहीं थे।वास्तविक परीक्षण में उन्हें जितने भयंकर विस्फोट की उम्मीद थी, उससे भी कई गुना बड़ा धमाका हुआ। सूरज की चमक धुंधली हो गई और160 किलोमीटर तक इसका झटका महसूस किया गया। हालांकि सफल टेस्ट के बाद उनके हाव-भाव बदल गए ।परमाणु बम धमाके के वक्त उनके मुंह से गीता का श्लोक निकला – में ही वह काल हूं जो संसार का नाश कर देता है।गीता में भगवान श्री कृष्ण करते हैं –

कालोस्मी लोकक्षयकृतप्रवृद्धों लोकांस्माहुर्तुमिह प्रवृत्तः

परमाणु परीक्षण के बाद उदास रहने लगे थे ओपेनहाइमर

जीवनी के मुताबिक परमाणु परीक्षण के बाद ओपेनहाइमर बहुत उदास रहने लगे थे।इस परमाणु परीक्षण के 1 महीने के बाद ही द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 6 अगस्त को जापान के हिरोशिमा में परमाणु बम गिरा दिया गया। 6 अगस्त 1945 को मारियाना दीप से उड़ान भरने के बाद अमेरिकी विमान एलोना जे हिरोशिमा के ऊपर पहुंचा और सुबह के 8:15 बजे लिटिल बॉय बम को गिरा दिया। बम फटते ही आग और धुएं का गुबार आसमान की ओर उठा,आसपास का तापमान 3000 से 4000 डिग्री सेल्सियस हो गया। 10 सेकेंड के अंदर ही हिरोशिमा तबाह हो गया।हजारों लोग भाप बनकर उड़ गए,मकानों की दीवारों में चिपक गए। बताया जाता है कि कुछ ही मिनट में 70 हजार लोगों की जान चली गई ।इस बात का पता चला तो ओपेनहाइमर को बहुत खुशी हुई लेकिन उनकी यह खुशी ज्यादा वक्त नहीं ठहरी और वे पश्चाताप कीआग में जलने लगे।

मेरे हाथ खून से लाल हैं

6अगस्त और 9 अगस्त को हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गए। इसमें 2 लाख लोगों की मौत हो गई।इस हमले का दंश वहां की पीढ़ी आज भी भुगत रही है।इस हमले के 2 महीने बाद ओपेनहाइमर अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट से मिलने पहुंचे।वहां उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है कि मेरा हाथ खून से रंगा हुआ है।ओपेनहाइमर की यह बात राष्ट्रपति को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने ओपेनहाइमर को तत्काल दफ्तर से बाहर निकालवा दिया।राष्ट्रपति ने कहा कि मुझे बच्चों की तरह रोने वाले लोगों से मिलना अच्छा नहीं लगता। इसके बाद ओपेनहाइमर लगातार परमाणु मिशन का विरोध ही करते रहे, लेकिन अमेरिका ने 1952 तक हाइड्रोजन बम बना लिया।

हुई थी दर्दनाक मौत

ओपेनहाइमर ने सरकार का विरोध किया तो उन पर रूस का जासूस होने का आरोप लगा दिया गया। उन्हें सिक्योरिटी क्लीयरेंस नहीं मिला और ब्लैक लिस्ट कर दिया गया। उन्हें अमेरिकी सरकार ने गद्दार घोषित कर दिया और इसी कलंक के साथ उन्हें बाकी की जिंदगी बितानी पड़ी। ओपेनहाइमर को गले का कैंसर हो गया था।18 फरवरी 1967 को उनकी मौत हो गई।

गीता पढ़ते थे ओपेनहाइमर

विशेष शिक्षा लेकर जर्मनी से जब 1929 में ओपेनहाइमर वापस अमेरिका लौटे थे , तब वे दर्शन की किताबें पढ़ने लगे थे। उन्होंने भगवत गीता भी पढ़ा था।इससे वे काफी प्रभावित भी थे ।परमाणु बम बनाते वक्त जब भी उन्हें उलझन होती थी ,तब तब वे गीता का विशेष अध्ययन करते थे।वे कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन को मानते थे।ओपेनहाइमर कलाप्रेमी भी थे।लेकिन एक कला प्रेमी वैज्ञानिक एक ऐसा आविष्कार दे गया जो कि मानवता के लिए हमेशा के लिए खतरा बन गया। हालांकि दूसरी और गीता की माने तो निश्चित हो चुका है कि जो होना है वह होकर रहेगा। करने वाला तो निमित्तमात्र होता है। करवाने वाला सबसे ऊपर है और वह निश्चित कर चुका है कि आगे होना क्या है।

 

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