क्या संसद में टकराव भी एक राजनीति है ?

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अखिलेश अखिल 

दो भाइयों  जो घर के भीतर लड़ाई होती है,लगभग वही हल संसद के भीतर का भी है।  गजब का तमाशा ! यह ऐसा  तमाशा है जो कभी  रुकता ही नहीं। हर सत्ताधारी खुद को महाबली मानता है और विपक्ष को बलहीन और दिशाहीन। लेकिन वही बलहीन और दिशाहीन पार्टी जब सत्ता पर हावी होती है तब वह भी वही काम करता है जो पहले वाला कर रहा था। लगता है यह संसदीय परंपरा है। इतिहास के पन्नो को  देखिये तो संसद की तस्वीर ऐसी  नहीं थी। संसद का अपना आदर्श था। संसद में एक से बढ़कर एक प्रखर वक्त थे। संसद  देश समस्याओं को लेकर जो बातें होती थी उसे देश  की जनता मानती थी। कई दिनों तक ही नहीं वर्षों तक उस पर  थी। संसद के भीतर सत्ताधारी दाल में भी ऐसे लोग होते थे जो अपने ही सरकार को जनता के मुद्दे पर घेरने से बाज नहीं आते थे। खासकर कांग्रेस के भीतर भी एक बसा विपक्ष था  नेहरू को घेरने  आते थे। लेकिन अब ऐसा कहा ?   
 खैर मौजूदा समय पर नजर डालने की जरूरत है। पिछले कई सत्रों से यह देखने को मिल रहा है कि किसी न किसी मसले पर संसद में गतिरोध पैदा होता है और उसके बाद लगातार टकराव चलता रहता है। ऐसा भी लगता है कि दोनों तरफ से गतिरोध दूर करने के प्रयास हो रहे हैं लेकिन गतिरोध दूर नही होता है। पिछले कई सत्रों से यह भी देखने को मिला है कि लगभग सत्र निर्धारित समय से पहले समाप्त हुए हैं। भले एक दिन पहले ही समाप्त हुआ लेकिन सत्र पहले समाप्त हुआ है। संसद सत्र का एक फीचर यह भी हो गया है कि विपक्षी पार्टियां संसद के परिसर में प्रदर्शन करती हैं और सरकार बिना बहस के बिल पास करा लेती है। सवाल है कि ऐसा सहज रूप से हो रहा है या इसके पीछे कोई राजनीति है? ध्यान रहे संसद को बाधित करना भी संसदीय राजनीति का एक तरीका है, यह बात विपक्ष में रहते भाजपा के नेता अरुण जेटली ने कही थी।   
         हालांकि यह अभी पता नहीं है कि अभी जिस राजनीति के तहत टकराव हो रहा है और हर बार गतिरोध बन रहा है वह विपक्ष की राजनीति का हिस्सा है या सरकार की राजनीति का? पिछले दो तीन सत्र देखें तो इस ट्रेंड का एक अंदाजा लगता है। मानसून सत्र शुरू होने से एक दिन पहले मणिपुर में दो महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाने और उनके साथ यौन हिंसा का वीडियो वायरल हुआ। यह बेहद दुखद और अमानवीय घटना थी, जो चार मई को घटित हुई थी और उसी दिन वीडियो बना था। यह अनायास नहीं था कि वीडियो 19 जुलाई को वायरल हुआ। संभव है कि ज्यादा व्यापक राजनीतिक असर की वजह से वह वीडियो संसद सत्र से पहले जारी किया गया हो। उसका असर साफ दिख रहा है। संसद सत्र की कार्यवाही चार दिन ठप्प रही और अंत परिणति अविश्वास प्रस्ताव में हुई है।
               इस साल बजट सत्र से ठीक पहले अडानी समूह को लेकर हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट आई। 31 जनवरी से बजट सत्र शुरू होने वाला था और 24 जनवरी को हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आई, जिसमें अडानी समूह की हजारों करोड़ रुपए की कथित वित्तीय गड़बड़ियों की जानकारी दी गई। संसद सत्र शुरू होने के बाद विपक्ष ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का इंतजार किया और उसके बाद हिंडनबर्ग की रिपोर्ट पर हंगामा शुरू हो गया। अभिषाषण पर चर्चा में राहुल गांधी ने पूरी तरह से अडानी समूह के ऊपर भाषण दिया। इसके बाद सत्र का समापन राहुल गांधी की संसद सदस्यता समाप्त करने और उस पर विवाद के साथ हुआ।
              उससे पहले पिछले साल के शीतकालीन सत्र के दौरान अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीनी सैनिकों की घुसपैठ और भारतीय सेना के जवानों के साथ उनकी झड़प का वीडियो आया। पिछले साल शीतकालीन सत्र गुजरात चुनाव की वजह से थोड़ी देरी से सात दिसंबर को शुरू हुआ था और उसके बाद नौ दिसंबर को भारत-चीन के सैनिकों की हुई झड़प का एक वीडियो सामने आया। इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में बयान भी दिया पर गतिरोध शुरू हो गया और इस वजह से 29 दिसंबर तक चलने वाला सत्र 23 दिसंबर को समाप्त हो गया। इसके पीछे जाएंगे तो हर सत्र से पहले इस तरह का कोई मुद्दा आने और गतिरोध चलने का इतिहास मिलेगा। इससे विपक्ष की राजनीति तो चमकती है पर सरकार को यह फायदा होता है कि उसे कोई भी बिल पास कराने में दिक्कत नहीं होती है।

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