जिस फार्मूले से शुरू हुई विपक्षी एकता की मुहिम, वही अटक रही इंडिया की गाड़ी, इन छ राज्यों मैं सीट बंटवारा टेढ़ी खीर

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बीरेंद्र कुमार झा

पिछले हफ्ते मंगलवार 18 जुलाई को 26 विपक्षी दलों ने विपक्षी एकता की खातिर ‘ इंडिया’ नाम का गठबंधन बनाया था ताकि 2024 के लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी बीजेपी को मात दी जा सके। सभी व्यक्तियों ने तब बेंगलुरु में हंसते मुस्कुराते और हैप्पी मोमेंट में हाथ मिलाते हुए मुंबई में तीसरी बार मिलने का वादा करते हुए विदाई ली थी। मुंबई में गठबंधन के नेता लोकसभा चुनाव के लिए सीट बंटवारे पर चर्चा करेंगे।

मंगलवार को बेंगलुरु में सभी दलों ने इस पर सहमति जताई थी कि मुंबई की आगामी बैठक में राज्यवार सीट शेयरिंग पर चर्चा होगी और सभी राज्यों में विशिष्ट गठबंधन को अमलीजामा पहनाया जाएगा।लेकिन यह बड़ा ही कठिन कार्य है क्योंकि कई राज्यों में ‘ इंडिया’ के ही घटक दल आपस में एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं।6 राज्य तो ऐसे हैं जहां लड़ाई के केंद्र में खुद कांग्रेस पार्टी ही है ।गौरतलब है कि विपक्षी एकता की मुहिम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक सीट एक उम्मीदवार (ओसीओसी) के परखे फार्मूले के तहत की थी।इसमें 1989 के लोकसभा चुनाव जैसा एक सीट पर विपक्षी गठबंधन का कोई एक सर्वमान्य उम्मीदवार उतारे जाने का प्रस्ताव है।लेकिन एक कैंडिडेट का चुनाव ही विपक्षी गठबंधन के लिए असली परीक्षा है,जिसमें इनकी गाड़ी फंसती नजर आ रही है।

जम्मू कश्मीर

कश्मीर से कन्याकुमारी तक विपक्षी गठबंधन की पहली चुनौती जम्मू कश्मीर से ही शुरू होती है, जहां गठबंधन में शामिल तीनों दल कांग्रेस नेशनल कांफ्रेंस (NC) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) एक दूसरे के दुश्मन रहे हैं।पिछले दो लोकसभा चुनाव पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2014 में राज्य में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस की सरकार थी। दोनों ने तब मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा था लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सके थे।राज्य की 5 लोकसभा सीटों में से घाटी की तीनों सीटें श्रीनगर,अनंतनाग और बारामूला पीडीपी ने जीत ली थी जबकि 2 सीटों जम्मू और उधमपुर सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की थी।

2019 में तीनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, लेकिन एनसी और पीडीपी दोनों ने जम्मू और उधमपुर कांग्रेस के लिए छोड़ दिया था।कश्मीर घाटी में नेशनल कांफ्रेंस ने सभी 3 सीटें जीत ली। जबकि बीजेपी ने 50% से अधिक वोटों के साथ जम्मू और उधमपुर को बरकरार रखा। गौरतलब है कि घाटी के तीनों सीटों पर एनसी और पीडी पी जाप।llसमान वोट शेयर करते रहें और ऐतिहासिक रूप से एमसी मजबूत रही है।

पीडीपी ने पिछले 4 सालों में केवल एक बार ही 2024 में श्रीनगर और बारामुला सीटें जीती है। 5 साल बाद 2019 में इन दोनों सीटों पर पीडीपी तीसरे स्थान पर आ गई।अनंतनाग में एनसी और पीडीपी बारी-बारी से जीतती रही है। कोई भी सीट नहीं जीतने के बावजूद कांग्रेस को राज्य में 26% वोट शेयर मिला है।अब विपक्षी गठबंधन के सामने चुनौती बनी हुई है कि क्या नेशनल कांफ्रेंस पीडीपी के लिए अपनी मौजूदा तीनो लोक सभा सीटों का त्याग करेगी।

दिल्ली और पंजाब

विपक्षी गठबंधन की अगली अग्निपरीक्षा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और पंजाब में होनी है। इन दोनों ही जगहों पर फिलहाल आम आदमी पार्टी की सरकार है दोनों ही राज्यों को मिलाकर लोकसभा की 20 सीटें आती हैं। दिल्ली में पिछले 2 लोकसभा चुनाव में बीजेपी सभी 7 सीटें जीती रही है। इसी के मद्देनजर 2019 में आप और कांग्रेस के बीच गठबंधन की सुगबुगाहट हुई थी लेकिन स्थानीय कांग्रेस नेताओं के विरोध करना संभव नहीं हो सका था।

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 80 सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचते हैं। 2019 के चुनावों में एसपी बीएसपी और आरएलडी के एक साथ चुनाव लड़ने के बावजूद बीजेपी ने 62 सीटों पर जीत दर्ज की थी,जबकि सहयोगी अपना दल को 2 सीटों पर सफलता मिली थी। एनडीए गठबंधन को 50% से ज्यादा वोट शेयर मिले थे,जबकि एसपी बीएसपी और आरएलडी गठबंधन को करीब 40 फीसद वोट मिले थे।अकेले चुनाव लड़ने वाले कांग्रेस को 6% वोट मिले थे और यह केवल रायबरेली की एक सीट ही जीत पाई थी।

अब जब 2024 के लिए सियासी बिसात बिछाई जा रही है, तब बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने ऐलान कर दिया है किसकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी, जबकि बीजेपी ने ओमप्रकाश राजभर को साथ कर लिया है। 80 सीटों पर इंडिया गठबंधन को एसपी आरएलडी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारा करना और वोट शेयर हासिल करना एक बड़ी चुनौती होगी।

पश्चिम बंगाल और केरल

पश्चिम बंगाल और केरल के भी दिल्ली और पंजाब जैसी ही सियासी सूरत है ।समस्या यह है कि कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दल एक ही वोट बैंक के लिए लड़ रहे हैं और वे आपस में ही सीधे मुकाबले में है। पश्चिम बंगाल में टीएमसी का दबदबा है जबकि कांग्रेस और लेफ्ट खत्म होने के कगार पर हैं।

हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी को बीजेपी के हाथों 12 सीटें गंवानी पड़ी है 2014 में 34 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस को 2019 में 22 सीटों पर संतोष करना पड़ा।बीजेपी ने तब 18 सीटें जीती थी जबकि कांग्रेस ने 2 सीटें जीती थी और वामदलों को निराशा हाथ लगी थी। कांग्रेस और वाम दल पश्चिम बंगाल में 2 विधानसभा चुनाव एक साथ लड़ चुके हैं और अगले चुनाव के लिए भी गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वाम नेता कहते रहे हैं कि टी एम सी के खिलाफ कांग्रेस और वाम संयुक्त रूप से लड़ने वाले हैं।

इसी तरह केरल में यूपीए कांग्रेस की अगुआई वाला गठबंधन ने 2019 में 20 में से 19 लोकसभा सीटें जीती थी और लेफ्ट केवल 1 सीटें जीत सका था। ऐसे में न तो कांग्रेस और ना ही वामपंथी राज्य में गठबंधन करना चाहेंगे।वहां दोनों के बीच कोई फ्रेंडली फाइट भी नहीं हो सकती है क्योंकि लोकसभा चुनाव में वामपंथ की कीमत पर कांग्रेस को ज्यादा फायदा होता दिख रहा है।

क्या हो सकता है आगे

26 दलों वाले इंडिया के आगे की राह इस पर निर्भर करेगी कि कांग्रेस दूसरे दलों को जगह देने के लिए क्या और कितना त्याग कर सकती है। हालांकि दिल्ली अध्यादेश पर समर्थन के लिए कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी की तरफ मदद का हाथ बढ़ाया है और पार्टी नेता पहले के मुकाबले अधिक विनम्र और मिलनसार प्रतीत हो रहे हैं ,लेकिन क्या अन्य दल भी चुनावी माहौल में वोट प्रतिशत खिसकने के डर के बीच उसी तन्मयता के साथ कांग्रेस के साथ आ सकते हैं।

 

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