अखिलेश अखिल
मध्यप्रदेश में बीजेपी को सत्ता में बने रहने की चुनौती है तो विपक्षी कांग्रेस को सत्ता में वापसी की चुनौती है। दोनों के अपने अपने दावे भी हैं। लेकिन कोई भी इस हाल में नहीं है कि वह अकेले दम पर सत्ता में लौट सके। इसकी वजह भी है। मध्यप्रदेश में 47 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित है और इसके साथ ही करीब 84 सीटों पर आदिवासी चुनावी खेल को प्रभावित करते रहे हैं। इसके साथ ही कई इलाकों में बंटे सूबे की राजनीति भी अलग तरह की है। कही दलितों का प्रभाव है तो कही पिछड़ी जातियों क असर है। कहीं समाजवादियों की पकड़ है तो कही वाम दलों की आज भी पकड़ है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर भी कुछ ऐसी पार्टियां है जो सिर्फ आदिवासी समाज के लिए ही काम करती है और हर चुनाव में हार जीत का भी फैसला करती है। खुद जीतती भी है और दूसरों को जिताती और हराती भी है। ऐसे में एक बात तो साफ़ है कि बदले राजनीतिक परिदृश्य में बीजेपी और कांग्रेस के सामने यह चुनौती खड़ी है कि वह किसको अपना साथी बनाये ,किसको अपना सहयोगी बनाकर जीत हासिल करे !
मध्यप्रदेश में आदिवासियों के बीच इस समय जय आदिवासी युवा संगठन और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी सक्रिय है। जयस के एक गुट ने तो तेलंगाना की सत्ताधारी दल वीआरएस का दामन थाम लिया है तो वहीं, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की कांग्रेस से नजदीकी बढ़ रही है। चर्चा तो यहां तक है कि कांग्रेस ने गौंगापा को पांच सीटें देने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है लेकिन दोनों के बीच सम्बन्ध अच्छे हुए हैं। आगे क्या होगा इसे देखना होगा।
उधर ,भाजपा लगातार आदिवासी इलाकों पर अपनी नजर बनाए हुए है और उसके तमाम बड़े नेता इन इलाकों का दौरा भी कर रहे हैं। इसके साथ ही बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के ऐसे नेताओं से उसका संपर्क बना हुआ है जो चुनाव के समय साथ दे सकते हैं। बसपा और सपा से नाता रखने वाले दो विधायक पहले ही भाजपा का हिस्सा बन चुके हैं।
राज्य का ग्वालियर, चंबल, विंध्य और बुंदेलखंड वह क्षेत्र है जो उत्तर प्रदेश की सीमा का स्पर्श करता है और इन इलाकों में बसपा और सपा का प्रभाव है। ग्वालियर-चंबल में जहां अनुसूचित जाति नतीजे प्रभावित करने की स्थिति में है तो विंध्य में पिछड़ा वर्ग। बुंदेलखंड में वामपंथियों, समाजवादियों की जड़ें काफी गहरी रही है। इसके अलावा कई ऐसे सामाजिक संगठन है जो विंध्य, ग्वालियर-चंबल और महाकौशल में प्रभाव रखते है। इन संगठनों की भी चुनाव में बड़ी भूमिका होती है।
राज्य के वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा के दो, सपा का एक और चार स्थानों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। इससे पहले राज्य में कभी बसपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, सपा के बड़ी सफलता मिली थी, मगर वर्तमान में इन दलों के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है। बसपा ने ग्वालियर-चंबल में अपनी पूरी ताकत दिखाई थी और कई स्थानों पर उसके उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे।
आगामी चुनाव में यह दल फिर अपनी ताकत दिखाने की तैयारी में हैं। यही कारण है कि भाजपा और काग्रेस दोनों की मुश्किलें बढ़ी हुई है। कौन किसके साथ जाता है इस पर सबकी निगाहें तिकी हुई है।

