बीरेंद्र कुमार झा
छात्रों का संबंध पढ़ाई से होता है, लेकिन झारखंड में इस समय छात्रों का संबंध आंदोलन और स्ट्राइक से हो गया है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि पढ़ाई के बाद छात्रों का ज्यादातर रुझान नौकरी की तरफ होता है, लेकिन झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार ने अपनी गलत नियोजन नीति से ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी है,जिससे यहां के छात्रों को नौकरी ही नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में अपने भविष्य को अंधकारमय देखकर अब छात्र अपना ज्यादातर समय पढ़ाई की जगह आंदोलन और स्ट्राइक में लगाने लगे हैं।
लटकाने वाली नियोजन नीति लाती है हेमंत सोरेन सरकार
झारखंड की हेमंत सोरेन की सरकार ने सबसे पहले 1932 के खतियान को आधार बनाकर नियोजन नीति लाया था, लेकिन इसे हाई कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद अब हेमंत सोरेन की सरकार 60:40 की अनुपात वाली नियोजन नीति लेकर आई है,लेकिन हेमंत सोरेन सरकार की इस नीति को छात्रों ने ही अस्वीकार कर दिया है।इस 60:40 के अनुपात वाली नियोजन नीति के अनुसार 60% नौकरियां झारखंड के स्थाई निवासियों को दिया जाना है और 40 % इससे इतर लोगों को दी जानी है।छात्रों का मानना है कि यह सब हेमंत सोरेन की सरकार ने इसलिए किया है,ताकि जैसे वे अवैध रूप से झारखंड के खनिज को बाहर भेजकर कमाई कर रहे थे वैसे ही कमाई वह झारखंड की नौकरियों को भी बाहर वालों को बेचकर कर सके।छात्रों का कहना है कि इस बार वे हेमंत सोरेन की इस चालाकी को कामयाब नहीं होने देंगे।छात्रों ने कहा कि वे बार – बार आंदोलन और झारखंड बंद कर सरकार को चेतावनी दे रहै हैं कि वे झारखंडियों को नौकरी देने वाला नियोजन नीति लाएं।
सरकार के नहीं मानने पर बड़े आंदोलन की तैयारी
छात्रों की मांग के विपरीत झारखंड की हेमंत सोरेन की सरकार वह बार बार लटकाने वाली नीति लेकर दिखावे के लिए आ जाती है।झारखंड के परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखे बिना पूरा होमवर्क किए सरकार द्वारा लाई जा रही नियोजन नीति में कई पेंच होते है,जिस कारण अक्सर मामला फंस जाता है।लेकिन अब छात्रों ने भी हेमंत सोरेन सरकार की मनसा को भांप लिया है कि असल में सरकार की मनसा यहां के छात्रों को रोजगार देने की है ही नहीं।ऐसे में अब अगर सरकार ने ढंग से झारखंड की स्थानीयता तय कर नियोजन नीति नहीं लाई,तब छात्र बड़ा आंदोलन करने के लिए भी तैयार हो रहे हैं।सरकर के विरुद्ध इस मुद्दे पर आम लोगों को जोड़ने के लिए इन लोगों गांव गांव में सखुआ का पत्ता परंपरागत ढंग से घुमाकर राज्य सरकार की विरुद्ध जनमत तैयार किया जा रहा है,ताकि चुनाव के सरकार के लिए संकट की स्थित उत्पन्न किया जा सके।।
क्यों फंसता है पेंच
दरशल झारखंड में दो तरह के लोग निवास कर रहे हैं।एक वैसे लोग हैं जिनके पास जमीन का खतियान है और दूसरे वैसे लोग जिनके पास जमीन का खतियान नहीं है। जिनके पास जमीन का खतियान नहीं है वह भी कई पीढ़ियों से यही रह रहे हैं कुछ परिवार तो 100 साल से भी ज्यादा समय से यहां बिना हक का खतियान वाले जमीन पर ही रह रहे हैं। दरअसल झारखंड में दो काश्तकारी कानून प्रचलित हैं। एक काश्तकारी कानून छोटानागपुर काश्तकारी कानून (CNT) जिसमें जमीन के स्वामित्व हस्तांतरण पर आंशिक रूप से प्रतिबंध है और दूसरा संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT) जिसमें जमीन के सुमित हस्तांतरण पर पूरी तरह से रोक है। ऐसे में यहां बड़ी संख्या में लोग आपसी मेल मिलाप के आधार पर दान पत्र के सहारे जो कानूनी रूप से वैध नहीं है, घर बनाकर लंबे समय से रह रहे हैं ।
इस द्वैध स्थिति का राजनीतिक लाभ के चक्कर में विफल हो रहा स्थानीय और नियोजन नीति
झारखंड में खतियान रैयत जिसके अंतर्गत आदिवासी और मूलवासी आते हैं। उसकी संख्या गैर खतियानी रैयतों से थोड़ी अधिक है। यही कारण है की चुनावी लाभ लेने के लिए अक्सर राजनीतिक दल यहां खतियान आधारित स्थानीय और नियोजन नीति बनाते हैं ,जो न्यायालय में नहीं टिक पाता है और समाज में भी विभेद की स्थिति उत्पन्न करता है।
सबसे पहले खतियान आधारित स्थानीय और नियोजन नीति लाने का प्रयास बाबूलाल मरांडी ने तब किया था जबकि वे बिहार से झारखंड के बंटकरअलग राज्य बनने के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में मुख्यमंत्री बने थे। उनके द्वारा इस नीति को लागू करने के बाद ही झारखंड में बाहरी और भीतरी को लेकर भारी मारकाट मचा था और तब हाईकोर्ट ने खतियान से उतर किसी अन्य मानकों के सहारे झारखंड में स्थानीय और नियोजन नीति बनाने की बात कही थी।बाद में इसी आधार पर बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री पद से हटाकर बीजेपी ने अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाया था।
बाबूलाल मरांडी द्वारा 1932 ईसवी के खतियान के आधार पर बनाई गई स्थानीय और नियोजन नीति का हाई कोर्ट से क्या हश्र हुआ था और समाज पर इसका क्या प्रभाव पड़ा था,यह सब जानने के बावजूद हेमंत सोरेन ने भी इस अवसर का लाभ उठाने के लिए 2019 में हो रहे विधानसभा चुनाव के दौरान खतियान रसों को अपने पक्ष में करने के लिए हेमंत सोरेन ने 1932 के खतियान आधारित स्थानीयता और नियोजन नीति लाने की बात कही थी।लोगों ने उनकी बात का भरोसा कर उन्हें वोट भी दिया। सता मे आने के 3 साल बाद उन्होंने 1932 के खतियान आधारित स्थानीय और नियोजन नीति लाने का प्रयास किया, लेकिन जैसा कि तया था इनके स्थानीय नीति को तत्कालीन राज्यपाल रमेश बैस ने पुनर्विचार के लिए लौटा दिया और नियोजन नीति को हाईकोर्ट नेअसंवैधानिक करार दिया। इसके बावजूद हेमंत सोरेन जोहार खतियान यात्रा निकालकर लोगों को यह भरोसा देते रहे कि वे हर हाल में 1932 के आधार पर ही स्थानीय और नियोजन नीति लाकर रहेंगे। लेकिन इस बीच अब इनकी सरकार एक नया नियोजन नीति लेकर आ गई है, जिसमें 60% नौकरी खतियानी रेयतों तको देने का प्रावधान है ज और 40% किसी भी अन्य लोगों को। यहां के छात्र इसी नियोजन नीति का इस समय विरोध कर रहे हैं और समय-समय पर हुए झारखंड बंदकर सरकार को चेतावनी दे रहे हैं।

