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भाषण स्वतंत्रता दिन का या चुनावी रैली का?

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प्रकाश पोहरे (संपादक– मराठी दैनिक देशोन्नति, हिंदी दैनिक राष्ट्रप्रकाश, साप्ताहिक कृषकोन्नति)

मौका चाहे देश में हो या विदेश में, संसद में हो या चुनावी रैली या कोई और अवसर…. हर जगह धार्मिक व सांप्रदायिक प्रतीकों का इस्तेमाल और आत्मप्रशंसा! अधूरा सच, सफेद झूठ, परनिंदा, नए-नए शिगूफे! यही पांच प्रमुख तत्व होते हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर भाषण में। हर साल स्वाधीनता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से होने वाला उनका भाषण भी न तो पहले कभी अपवाद रहा और इस बार तो अपवाद होने का सवाल नहीं उठता था, क्योंकि आठ महीने बाद आम चुनाव होना है।

लाल किले से अपने भाषण के जरिए प्रधानमंत्री मोदी ने अगले साल होने वाले आम चुनाव का एजेंडा सेट कर दिया। उन्होंने इस बार ‘देशवासियों’ के बजाय ‘140 करोड़ परिवारजनों’ को संबोधित करते हुए अपनी सरकार के पिछले साढ़े नौ साल का रिपोर्ट कार्ड पेश किया और कहा, ‘अगले साल 15 अगस्त को भी मैं ही लाल किले पर झंडा फहराने आऊंगा और जिन योजनाओं का अभी शिलान्यास किया जा रहा है, 2024 के बाद उनका उद्घाटन भी हम ही करेंगे।’ ये उनका कथन देवेद्र फडणवीस ने जैसा ‘मैं फिर से आऊंगा’… ‘मैं ही दोबारा लौट कर आऊंगा’ ऐसी जो दर्पोक्ती की थी, उसकी याद दिला कर गया।

राजनीतिक विमर्श में ‘परिवारवाद’ मोदी का सबसे प्रिय मुद्दा रहता है। उन्होंने कहा कि परिवारवादी राजनीति देश को खोखला कर रही है और परिवारवादी राजनीति करने वाले ही भ्रष्टाचार तथा तुष्टीकरण को बढ़ावा दे रहे हैं, जिससे सामाजिक न्याय की लड़ाई कमजोर हो रही है। मोदी ने किसी पार्टी का नाम नहीं लिया, लेकिन परोक्ष रूप से उनके निशाने पर विपक्षी दल ही थे। उन्होंने जिस तुष्टीकरण की बात कही, उसके बारे में साफ नहीं किया कि आखिर कौन-सी पार्टी किसका तुष्टीकरण कर रही है, लेकिन सब जानते हैं कि मोदी और उनकी पार्टी की ओर से तुष्टीकरण शब्द का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के संबंध में होता है।

प्रधानमंत्री मोदी आमतौर पर वर्तमान की बात करने के बजाय या तो अतीत की बात करते हैं या सुदूर भविष्य की! 15 अगस्त को भी उन्होंने यही किया।. उन्होंने कहा कि हजार-बारह सौ साल पहले देश पर एक आक्रमण हुआ था, जिसमें एक छोटे से राज्य के राजा की हार हुई थी, लेकिन तब लोगों को अंदाजा नहीं था कि यही घटना भारत को एक हजार साल की गुलामी में फंसा देगी। हालांकि मोदी का यह कथन इतिहास की मनमानी व्याख्या और अधूरे सच पर आधारित है, लेकिन इसके जरिए उनका इशारा महमूद गजनवी के हमले की ओर था।

आरएसएस से मिली शिक्षा-दीक्षा के मुताबिक गुलामी के कालखंड का जिक्र करते हुए मोदी हमेशा मुस्लिम शासकों का जिक्र ही करते हैं, 200 साल की ब्रिटिश हुकूमत का जिक्र उनके भाषण में शायद ही कभी होता है। इस बार का भाषण भी उसका अपवाद नहीं रहा। हजार साल पुराने इतिहास की इस घटना का जिक्र करने के बाद उन्होंने सरसरी तौर पर आज़ादी की लड़ाई का और आज़ादी के बाद बनी सरकारों का जिक्र किया और फिर अपने दस वर्षों के कार्यकाल पर आ गए। अपनी पूर्ववर्ती सभी सरकारों को किए-धरे को नकारते हुए उन्होंने कहा कि 2014 में उनके सत्ता में आने से पहले तीन दशक तक जोड़-तोड़ से बनी सरकारों ने कोई काम नहीं किया। जिस मे अटलजी का कार्यकाल भी आता है।

मोदीजी ने अपनी पीठ खुद थपथपाते हुए कहा कि 2014 में देश को पहली बार पूर्ण बहुमत वाली और काम करने वाली स्थिर व मजबूत सरकार मिली, जिसने देश को समस्याओं के दलदल से निकाला और विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ाया। उन्होंने परोक्ष रूप से देशवासियों से 2024 के लिए भी जनादेश मांगते हुए कहा कि यह मान कर चलें कि हम जो कदम उठाएंगे, जो भी फैसले लेंगे, वे भारत के लिए आने वाले एक हजार साल तक की दिशा निर्धारित करने वाले होंगे। इससे पहले तक मोदी आगामी 25 और 50 साल की बात करते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने लंबी छलांग लगाते सीधे एक हजार साल की बात कही।

प्रधानमंत्री मोदी अपने कथित ‘तीसरे कार्यकाल’ में भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बनाने की गारंटी दे रहे हैं। लाल किले के भाषण में भी उन्होंने इस गारंटी को दोहराया। लेकिन हकीकत यह है कि उनकी यह गारंटी कोई गारंटी नहीं, बल्कि सीधा-सा गणित है, जिसके तहत भारत 2027 तक अगर स्थिति सामान्य रही, तो भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा। उस समय देश में सरकार चाहे जिस पार्टी की या गठबंधन की हो, उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

पिछले तीन साल तक अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठे रहने के बावजूद ब्रिटेन को पीछे छोड़ कर भारत पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश जो बन गया है। उसका कारण किसानों का शोषण कर उनकी कृषि उपज के जो दाम गिराये गये, उसमे छुपे हुए हैं। अगर नोटबंदी न की होती और लॉकडाऊन न किया होता, तो भारत 2022 में ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया होता, जिसका श्रेय जीएसटी की भारी दरों के बावजूद व्यापारियों ने जो धंधा किया और रेकॉर्ड ब्रेक जीएसटी कलेक्शन दिया और भयंकर टैक्स लगाने के कारण महंगे हुए पेट्रोल, डीजल की रेकॉर्ड ब्रेक बिक्री से बढ़ा सरकारी राजस्व… ये कारण है।

मोदी अपनी पीठ खुद थपथपाते हुए अपनी पूर्ववर्ती सरकारों भले ही कितना भी कोसते रहे, लेकिन हकीकत यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था को गति देने का काम 2004 से 2014 के मनमोहन सरकार के बीच हुआ है। 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार हटी, तब भारत की जीडीपी 722 अरब डॉलर की थी, जो 2014 में बढ़ कर 2039 अरब डॉलर की हो गई। यानी 10 साल में तीन गुना बढ़ोतरी हुई। इसके बाद 2014-15 में रफ्तार ठीक रही, लेकिन 2016 के अंत में हुई नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी व कोरोना की महामारी की वजह से अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई। इसके बावजूद 2023 में जीडीपी 3737 अरब डॉलर की हो गई। यानी 84 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। इससे पहले मनमोहन सिंह के समय 183 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। अनुमान है कि अब अगले चार साल जीडीपी 38 फीसदी बढ़ेगी और भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। यह सीधा-सीधा गारंटी गणित है।

बहरहाल, जीडीपी के ये आंकड़े देश की अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर तो पेश करते हैं, लेकिन इन आंकड़ों से देश की असली आर्थिक तस्वीर जाहिर नहीं होती। असली तस्वीर प्रति व्यक्ति आय से जाहिर होती है, जिसमें भारत शीर्ष 10 देशों में भी नहीं है। लेकिन मोदी इस बारे में कभी भूल कर भी चर्चा नहीं करते हैं।

मोदी ने अपने भाषण में कहा कि उनके शासन में सीरियल बम धमाके और आतंकवादी हमले नहीं हो रहे हैं तथा नक्सल प्रभावित इलाकों में भी अब बदलाव देखने को मिल रहा है। उनका यह दावा कुछ हद तक सही है, लेकिन देश के अंदर प्रधानमंत्री की पार्टी के सहयोगी संगठनों के लोग जिस तरह की हिंसक वारदातों को आए दिन अंजाम दे रहे हैं, क्या वह आतंकवाद की श्रेणी में नहीं आती? मोदी ने अपने भाषण में मणिपुर का जिक्र किया और दावा किया कि वहां अब शांति कायम हो रही है, लेकिन हकीकत यह है कि वहां अब कुकी-मैतेई संघर्ष में अब नगा समुदाय भी शामिल हो गया है। प्रधानमंत्री ने न तो अपने भाषण में यह बताया कि मणिपुर में हालात इतने क्यों बिगड़े? और न ही यह बताया कि वहां की समस्या के समाधान के लिए उनकी डबल इंजन की सरकार क्या कर रही है?

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में 2022 तक हर व्यक्ति को घर और किसानों की आय दोगुनी करने जैसे वादों का भी जिक्र नहीं किया। हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने के अपने शुरुआती वादे की बात तो अब मोदी कभी करते ही नहीं हैं और आज भी उनके भाषण में बेरोजगारी का कोई जिक्र नहीं हुआ। बढ़ रही महंगाई को उन्होंने वैश्विक कारणों से जोड़ कर अपना दामन बचाने की कोशिश की। कहा कि उनकी सरकार ने अगर महंगाई पर नियंत्रण के उपाय नहीं किए होते तो हालात और ज्यादा गंभीर होते। कुल मिला कर साफ-साफ दिख रहा था कि प्रधानमंत्री का भाषण चुनावी रैली जैसा था, जिसमें उन्होंने अपने समर्थक वर्ग को संबोधित किया।

–प्रकाश पोहरे
(संपादक– मराठी दैनिक देशोन्नति, हिंदी दैनिक राष्ट्रप्रकाश, साप्ताहिक कृषकोन्नति)
संपर्क : 98225 93921
2prakashpohare@gmail.com

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