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दो पार्टियों के बीच डगमगाती विपक्षी पार्टियां क्या बीजेपी को चुनौती दे सकेंगी ?

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अखिलेश अखिल 
मौजूदा समय में देश की विपक्षी पार्टियां दो गुटों में बंटती जा रही है। एक गुट केसीआर का बनता दिख रहा है जबकि एक गुट कांग्रेस के भरोसे है। यह बात और है कि सभी विपक्षी तरह ही कांग्रेस की भी चाहत है कि विपक्षी एकता बने और मिलकर बीजेपी का मुकाबला किया जाए। लेकिन यह विपक्षी एकता कांग्रेस की शर्तों के मुताबिक हो। लेकिन क्या ऐसा संभव है ? क्या देश की क्षत्रप पार्टियां ऐसा मानती है ? खेल बड़ा दिलचस्प हो चला है। इसी खेल का लाभ बीजेपी को मिलना है और बीजेपी मौन साधे सब कुछ होते देना चाह रही है। बीजेपी की चाहत है कि विपक्षी एक नहीं हो। और गर हो भी तो इसके कई मोर्चे तैयार हो ताकि आने वाले समय में उसका राजनीतिक लाभ लिया जा सके। कांग्रेस के साथ जाने वाली पार्टियों से बीजेपी को कोई आस भी नहीं है लेकिन गैर कांग्रेस मोर्चा से बीजेपी को उम्मीद हो सकती है।

सच तो यही है कि कोई भी क्षत्रप अभी किसी पर यकीं नहीं कर रहे।  जरूर हैं लेकिन किसी पर विश्वास नहीं करते। कभी कोई किसी के साथ खड़े दीखते हैं तो कभी वे दूसरे के साथ भी आ मिलते हैं। संसद के भीतर कई मसलो पर सब एक हो जाते हैं और संसद के बाहर एक दूसरे पर वार नहीं चूकते। ऐसे में विपक्षी एकता की राजनीति कितना आगे बढ़ेगी कहना मुश्किल है।

इधर एक नयी बात सामने देखने को मिल रही है। अगले दो महीने में दो ऐसे बड़े कार्यक्रम होने वाले हैं, जिसमें कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां अपनी ताकत का प्रदर्शन करेंगी। तेलंगाना के मुख्यमंत्री और भारत राष्ट्र समिति के नेता के चंद्रशेखर राव और कांग्रेस एक- एक शक्ति प्रदर्शन कर चुके हैं और सबने देखा कि केसीआर ने कांग्रेस को मात दी थी।
कांग्रेस ने भी भारत जोड़ो यात्रा की समोती पर जम्मू कश्मीर में शक्ति प्रदर्शन की तैयारी की थी लेकिन संभव नहीं हो सका। अब दोनों के बीच दूसरा शक्ति प्रदर्शन होने वाला है। यानी केसीआर और कांग्रेस के बीच का प्रदर्शन। केसीआर एक गुट को लेकर आगे बढ़ते दिख रहे हैं जबकि कांग्रेस एक गुट को आगे बढ़ाना चाहती है।

खबर है कि अब कांग्रेस अपनी सहयोगी डीएमके के कंधे पर बंदूक रख कर चलाने जा रही है तो दूसरी ओर केसीआर एक बार फिर अपनी ताकत का प्रदर्शन करने जा रहे हैं। पहले कांग्रेस और डीएमके का प्रदर्शन होगा। एक मार्च को डीएमके नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन का जन्मदिन है। वे 70 साल के हो रहे हैं और इस मौके पर उन्होंने सभी विपक्षी पार्टियों को आमंत्रित किया है। चेन्नई में होने वाले जन्मदिन समारोह में कांग्रेस की ओर से राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल होंगे।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें भारत राष्ट्र समिति के नेता और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नहीं बुलाया गया है। कहा जा रहा है कि स्टालिन कांग्रेस को ध्यान में रख कर इन नेताओं से सहमति बनाते हुए इनको नहीं बुलाया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नहीं बुलाया गया है। दलील यह दी गई है कि उनका भी जन्मदिन एक मार्च को ही है। वे स्टालिन से दो साल बड़े हैं।  बीआरएस, तृणमूल कांग्रेस और जदयू के अलावा बाकी सारी विपक्षी पार्टियां आमंत्रित हैं और जुटेंगी भी। वह एक तरह से कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन है।

इसके जवाब में के चंद्रशेखर राव 14 अप्रैल को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती के मौके पर अपने राज्य में एक बड़ा जलसा करने की तैयारी कर रहे हैं। इसमें वे कांग्रेस को छोड़ कर बाकी सभी पार्टियों के नेताओं को बुला रहे हैं। कहा जा रहा है कि विपक्षी एकता बनाने के लिए वे विपक्ष की तमाम पार्टियों के साथ बैठक करेंगे और उसके बाद एक रैली भी होगी। इसमें डीएमके, तृणमूल कांग्रेस, जदयू , राजद, जेएमएम, सपा, जेडीएस, आम आदमी पार्टी और सीपीएम, सीपीआई सहित लगभग सभी विपक्षी पार्टियों को बुलाया गया है। कहा जा रहा है कि इसमें आधा दर्जन मुख्यमंत्री हिस्सा लेंगे। एमके स्टालिन, पिनरायी विजयन, अरविंद केजरीवाल, भगवंत मान, नीतीश कुमार और हेमंत सोरेन इन सबके शामिल होने की संभावना है।

क्या ऐसे में बीजेपी को मात देने के लिए कोई एकता की सम्भावना बन रही है ? केसीआर की परेशानी है कि तेलंगाना में उसकी सीधी लड़ाई कांग्रेस से ही है। ऐसे में वह कांग्रेस के साथ जा नहीं सकते। वे बार -बार कहते हैं कि गैर कांग्रेस और गैर बीजेपी एकता बने। लेकिन क्या यह संभव है कि कांग्रेस के बिना कोई एकता बीजेपी को मात दे सकती है ?

इसके जवाब भी ढूंढे जा रहे हैं। केसीआर को लगता है कि पहले गैर कांग्रेस वाला मोर्चा बने और बाद में जब सरकार बनाने की स्थिति होगी तो वक्त के मुताबिक किसी को सपोर्ट किया जा सकता है। भले ही कांग्रेस को ही सपोर्ट क्यों न करना पड़े। लेकिन इसके लाभ ये हैं कि अगर कांग्रेस कोई गलत फैसला लेगी तो सपोर्ट ख़त्म भी किया जा सकता है।

केसीआर को यह भी लगता है कि अगर मोर्चा ज्यादा सीट जितने में सफल होता है तो कांग्रेस का सपोर्ट भी लिया जा सकता है। क्या इस बात को कभी कांग्रेस मानेगी ? ऐसे बहुत से पेंच फंसे हुए हैं। और ऐसे में आगे क्या होगा देखना काफी दिलचस्प होगा।

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