क्या जनता और सामाजिक संगठनों से जुड़े बिना कांग्रेस का कायाकल्प होगा ?

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अखिलेश अखिल 
मौजूदा दौर की राजनीति से भले ही देश की बड़ी आबादी को चिढ होने लगी है लेकिन यह भी सच है कि आज के इस दौर में ही देश की एक बड़ी आबादी बीजेपी के साथ जुडी भी है और उसके हिंदुत्व का समर्थन भी करती दिख रही है। आज से पहले इस देश के भीतर इस तरह का माहौल कभी नहीं देखा गया था। माहौल तो ऐसा है कि अगर मौजूदा सत्ता सरकार और पार्टी के बारे में कोई विरोध भी करता है तो उसकी परिणति घातक होती है और सामने वाले को काफी नुक्सान पहुंचाने की कोशिश की जाती है। बानगी के तौर पर हालिया पवन खेड़ा मामले को याद किया जा सकता है। खेड़ा ने अपने बयान में पीएम मोदी के पिता के नाम पर अडानी दास का नाम जोड़ दिया था। हालांकि खेड़ा के उस बयान का समर्थन नहीं किया जा सकता। किसी भी सभ्य आदमी से यह अपेक्षा की जा सकती है कि किसी की जाति धर्म और उपासना पर कोई बात न कहे। यह मर्यादा के खिलाफ है और घटिया आचरण का द्योतक भी। बदले की भावना से की जाने वाली राजनीति को कोई भी समाज कब ही बर्दास्त नहीं करता।

हालांकि बीजेपी भी इस तरह की बातें करती रही है और खासकर गाँधी परिवार को लेकर बीजेपी नेताओं से लेकर खुद प्रधानमंत्री मोदी ने जो भी बयान दिए हैं क्या उसे जायज ठहराया जा सकता है ? हरगिज नहीं। पीएम मोदी के कई बयानों पर जब आप नजर डालेंगे तो दुःख ही होगा। लेकिन क्या तब मोदी को कठघरे में खड़ा किया गया था ? क्या कोई पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए कॉल किया था ? क्या बीजेपी के उन तमाम नेताओं से आज तक कोई पूछताछ या उनकी गिरफ्तारी की गई जो आये दिन भड़काऊ बयान देते हैं और समाज को खंडित करने की बात भी करते रहे हैं ? अभी असम बीजेपी का एक नया हिंदुत्व केंद्र बनता दिख रहा है। महारष्ट्र के नेता भी असम में ही पहुँच जाते हैं तो जिग्नेश मेवानी की गिरफ्तारी भी असम पुलिस द्वारा ही की गई थी। झारखंड में हेमंत की सरकार गिराने की रणनीति भी असम में ही बनी और झारखंड के कई नेता असम पहुंचे भी थे। पवन खेड़ा को भी असम पुलिस ही पकड़ने आयी थी। इसकी राजनीति की तह में जाएंगे तो कई चौंकाने वाली बाते सामने आ सकती है।

बहरहाल अभी चर्चा का विषय तो कुछ और ही है। रायपुर में जो कांग्रेस का मंथन चल रहा है उसकी परिणीति क्या होगी इसे देखने की बात है। अगले विधान सभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस क्या गेन करती है उसे देखने की बात है। अगर विधान सभा चुनाव में कांग्रेस कर्नाटक ,मध्यप्रदेश ,छत्तीसगढ़ और राजस्थान नहीं जीत पाती है तो कांग्रेस के साथ शायद ही विपक्ष की कोई एकता बन सके। करीब दस राज्यों में चुनाव हो रहे है ऐसे में करीब चार पांच राज्यों में कांग्रेस अगर चुनाव जीत जाती है तब ही विपक्षी दलों  की एकता कांग्रेस के शर्तो पर संभव है। और ऐसा नहीं हुआ तो सब अलग लड़ेंगे और फिर कहानी बीजेपी के पक्ष में ही चली जाएगी।

ऐसे में आज जरूरत कांग्रेस को मजबूत करने और उसे ऐसी स्थिति में लाने की है जहां वह लोगों को विश्वास दिला सके कि वह अपने दम पर 150-175 लोकसभा सीटें जीत सकती है। विपक्ष को इस बारे में भरोसा दिलाए बिना उनसे कांग्रेस को विपक्षी एकता के आधार के रूप में स्वीकार करने की अपेक्षा करना व्यर्थ है।

अभी  हाल में ने इतिहासकार अशोक कुमार पांडेय ने एक लेख के जरिये कग्रेस को कई सुझाव दिए हैं जिसकी चर्चा यहां की जा सकती है।  वे कहते हैं कि  बीजेपी एक चुनावी मशीन है जिसे आरएसएस की वैचारिक और सांस्कृतिक एकजुटता से ताकत मिलती है। आरएसएस से जुड़े संगठनों का आबादी के बड़े हिस्से पर गहरा प्रभाव है। यही वजह है कि इसके खिलाफ राजनीतिक लड़ाई को अकेले लड़ना आसान नहीं। यह ऐसी लड़ाई है जिसे कई मोर्चों पर लड़ा जाना चाहिए- सांस्कृतिक रूप से भी और नीतिगत स्तर पर भी। थिंक टैंक और संस्थानों को भी इस लड़ाई में शामिल किया जाना चाहिए।

आरएसएस और बीजेपी की विचारधारा का विरोध करने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं से जुड़ते समय नेताओं को अपने अहं को किनारे रख देना चाहिए।

पांडेय कहते हैं कि  देश के लिए कांग्रेस के वैकल्पिक एजेंडे की धुरी आर्थिक कल्याणवाद, छोटे और मध्यम व्यवसायों के पुनरुद्धार, कृषि के आधुनिकीकरण के अलावा मजबूत और नवीन सांस्कृतिक हस्तक्षेप पर टिकी होनी चाहिए।

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