नीतीश कुमार के बाद बिहार में एनडीए के मुख्यमंत्री का बीजेपी के खेमे से बनना लगभग तय हो गया है।पूर्णता के लिहाज से जो कुछ बचा हुआ है, वह अब सिर्फ बीजेपी के किसी नेता के एनडीए के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेना भर है।
बीजेपी बिहार की सत्ता पर काबिज होने के लिए बीजेपी अपने मुख्यमंत्री के उम्मीदवारों के चयन के लिए धन मंथन भी कर रही है। मुख्यमंत्री के चयन की इस प्रक्रिया में बीजेपी हाल में हो रही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ वर्ष 2028 में होने वाली लोकसभा चुनाव और इससे पूर्व विभिन्न राज्यों की विधानसभा चुनाव पर भी नजर रख रही है। इसके अलावा यह विपक्षी गठबंधन की ताकत के साथ-साथ अपने गठबंधन के राजनीतिक दलों की ताकत को भी काम करने का विचार कर रही है जो भविष्य में बीजेपी को परेशान कर सकती है।
अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बीजेपी कई प्रकार के प्रोपेगेंडा का भी सहारा ले रही है। सम्राट चौधरी विजय सिंह नित्यानंद राय जैसे कई नामों को शगुफे के तौर पर सामने ला रही है। नीतीश कुमार जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा जैसे प्रमुख राजनीतिक हस्तियां सम्राट चौधरी के नाम पर सहमति जताकर बीजेपी पर अभी से ही दबाव बनाने की रणनीति पर भी काम कर रही है। लेकिन बीजेपी शायद ही इनमें से किसी को बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपे। वैसे भी बीजेपी के रणनीतिकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी जो नाम चर्चा में रहते हैं उसे पर कदाचित ही विचार करते हैं और अपने अंतर मंथन से ऐसे नाम को अंत में सामने मुख्यमंत्री के रूप में सामने लाती है जो सभी को चौक जाता है आम लोगों के साथ-साथ विपक्षी राजनीतिक दलों को भी और उनके अपने घटक दलों को भी।
बिहार के मुख्यमंत्री के लिए चर्चा में जो नाम है उनमें से किसी दलित व्यक्ति का नाम नहीं है। जबकि बीजेपी के आंतरिक सूत्रों के अनुसार बीजेपी के रणनीतिकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह मुख्यमंत्री के बहाने एक बड़े वोट बैंक को साधने में लगे हैं। वे एक दलित वोटों को एक बड़ा टारगेट मानकर चल रहे हैं। लगभग 17 प्रतिशत दलित मत कांग्रेस की कभी थाती रही थी। इस समय वर्तमान मुख्यमंत्री और जेडीयू नेता नीतीश कुमार की इसपर बड़ी पकड़ है।इसके अलावा हम पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की भी पकड़ इस दलित आबादी पर है।LJP रामविलास की भी इन दलित जातियों पर है।
अभी तक बिहार में कुल तीन दलित नेता मुख्यमंत्री बने हैं। इसमें भोला पासवान एक ऐसे दलित नेता थे, जो कुल तीन बार सीएम बने थे। राम सुंदर दास और जीतन राम मांझी एक-एक बार मुख्यमंत्री बने थे। ऐसे में दलित मुख्यमंत्री देकर भी बीजेपी इस बात का फायदा तो नहीं उठा पाएगी उसने बिहार में पहला दलित मुख्यमंत्री बनाया है। लेकिन इसके जरिए या एक तरफ जहां विधानसभा के चुनाव या आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्ष के इस दावे का जवाब देने में सक्षम हो जाएगी कि उसके किसी भी राज्य में कोई दलित मुख्यमंत्री नहीं है। साथी इसके द्वारा यह अपने गठबंधन जिनकी इन दलितों पर खासी पकड़ है उसे उनकी पकड़ को भी ढीला कर अपनी पकड़ उन पर मजबूत बनाएगी। खासकर जिस तरह से चिराग पासवान अभी से ही बिहार के अगले मुख्यमंत्री के रूप में ताल ठोक रहे हैं और विभिन्न चुनाव में बीजेपी पर दबाव बनाकर गठबंधन के अंदर हैसियत से ज्याद, सीटें लेते रहे, बीजेपी चिराग पासवान पर भी अपने इस दलित मुख्यमंत्री के द्वारा चिराग पासवान पर नकेल कस सकती है।
वर्तमान में देश में बीजेपी शासित प्रदेश में कोई दलित मुख्यमंत्री भी नहीं है।दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता (वैश्य),त्रिपुरा में माणिक साहा (वैश्य ),यूपी में योगी आदित्यनाथ (राजपूत), उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी (राजपूत), राजस्थान में भजन लाल शर्मा (ब्राह्मण), महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस (ब्राह्मण),असम में हिमांता बिस्व सरमा (ब्राह्मण), गुजरात में भूपेंद्र पटेल (कुर्मी), हरियाणा में नायाब सिंह सैनी (कुशवाहा), मध्यप्रदेश में मोहन यादव (यादव), छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय (आदिवासी) और ओडिशा में मोहन चरण मांझी (आदिवासी) मुख्यमंत्री हैं। इसलिए बिहार को लेकर बीजेपी में एक राय यह बन रही है कि इस बार प्रयोग के रूप पर दलित को सीएम की कुर्सी पर विराजमान कराया जाए।
इन तमाम परिदृश्यों के मत देना नजर बीजेपी के रणनीतिकार पीएम मोदी और अमित शाह निश्चित रूप से बिहार में किसी ने किसी दलित चेहरे को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन करने की योजना पर काम कर रहे होंगे। चेहरे भले ही चौंकाने वाले हो सकते हैं। अब पीएम मोदी और अमित शाह दो पैमानों पर इसे टोल सकते हैं पहले पैमाना होता दलित और युवा तथा दूसरा दलित और महिला।
दलित,युवा और महिला के रूप में बीजेपी जिन नाम पर विचार कर रही है, उनमें प्रमुख नाम जनक चमार, गुरु प्रकाश और दलित महिला के रूप में संगीता कुमारी का है।
बिहार बीजेपी केवल दलित ही नहीं युवा दलित नेता गुरु प्रकाश को आगे कर सकती है। और बीजेपी का यह कहीं मास्टरस्ट्रोक साबित न हो जाए। उनके अनुसार, बिहार बीजेपी के अन्य बड़े चेहरों के साथ किसी न किसी स्तर पर जातिगत समीकरणों के असंतुलित होने का जोखिम जुड़ा है, जबकि गुरु प्रकाश में नीतीश कुमार की भांति सभी वर्गों और जातियों को साथ लेकर चलने की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
एक उच्च शिक्षित दलित युवा चेहरे के रूप में गुरु प्रकाश की स्वीकार्यता है, जिससे न केवल विपक्षी गठबंधन के दलित आधार में सेंध लगेगी, बल्कि चिराग पासवान जैसे सहयोगियों की ‘बार्गेनिंग क्षमता’ को भी कुशलता से नियंत्रित किया जा सकेगा। जिन मापदंडों से बीजेपी ने नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया, उन मापदंडों से गुरु प्रकाश को मुख्यमंत्री बनाया जाना सटीक प्रतीत होता है।

