पूर्व नौकरशाह ने क्यों कहा कि यह चुराया हुआ जनादेश है ?

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न्यूज़ डेस्क
 83 साल के पूर्व नौकरशाह देवसहायम कंस्टीच्यूशनल कंडक्ट ग्रुप यानी सीसीजी और सिटिजन्स कमीशन ऑन इलेक्शंस यानी सीसीई  के प्रमुख सदस्य हैं। उनका कहना है कि नौकरशाहों और निर्वाचन आयोग की सरकार में बदलाव के लिए जनता के मत को चुराने में भागीदारी थी। वह कहते हैं कि ‘इसे सफाई से चुरा लिया गया’ और विशेषज्ञ तथा सिविल सोसाइटी समूह आंकड़ों को गौर से देख रहे हैं ताकि इसका ठीक से कैसे खुलासा कर सकें।

नेशनल हेरल्ड ग्रुप के संपादकों के साथ ऑनलाइन अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा कि इन सब में वह चालाकी है कि संतोष का झूठा भाव पैदा हो गया है, यह ऐसी ‘जीत’ है जिसे विपक्ष और जनता भी मान ले रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ‘वे लोग जनता की आंखों में धूल झोंकने में सफल रहे हैं और विपक्ष सिर्फ अपने को ही दोषी मान रहा है।’ उन्होंने विपक्षी दलों पर भी सीसीजी और सीसीई-जैसे सिविल सोसाइटी समूहों के किए कामों को भाव न देने का आरोप लगाया।

देवसहायम कहते हैं कि ईवीएम की विश्वसनीयता पर सुप्रीम कोर्ट के ‘सुस्त’ फैसलों ने जनादेश में छेड़छाड़ करने का चुनाव आयोग को मौका दे दिया। अब मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि जितना मतदान हुआ, आयोग ने उससे अधिक मतों की गणना की। thequint.com ने खबर दी कि 176 क्षेत्रों में 35,000 से अधिक वोट ‘अतिरिक्त’ थे और 362 सीटों पर कम-से-कम 5.5 लाख वोटों की गिनती नहीं की गई। निश्चित तौर पर साफ प्रमाण है कि यह चुराया हुआ जनादेश है।

सीसीजी 2018 से ही चुनावों और चुनाव व्यवस्था का गंभीरता से अध्ययन कर रहा है। इसी साल चुनावी बॉण्ड योजना और वीवीपैट यूनिट लागू हुई। इसी साल उप चुनाव आयुक्त के तौर पर एक नौकरशाह को तैनात किया गया। देवसहायम याद करते हैं कि ‘हमारे सूत्रों ने इस सज्जन के आरएसएस के साथ रिश्ते को लेकर हमें अलर्ट किया। यही वह साल था जब से आयोग ने हमारी चिट्ठियों का संज्ञान लेना और उत्तर देना बंद कर दिया।’

सीसीजी ने चुनावी गोरखधंधों पर अपनी पहली विस्तृत रिपोर्ट 2021 में दी। देवसहायम कहते हैं कि हालांकि, इसे सभी राजनीतिक दलों के साथ शेयर किया गया लेकिन उस वक्त सिर्फ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खतरे को समझा। विवादास्पद उपायुक्त विधानसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में तैनात थे और यह ममता बनर्जी का कड़ा प्रतिरोध ही था कि उन्हें वापस आना पड़ा।

2019 चुनावों ने सीसीजी की प्रारंभिक आशंकाओं की पुष्टि की है। यही तरीका पिछले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों समेत बाद के सभी चुनावों में दोहराया गया। उन्होंने कहा कि ‘हमें मध्य प्रदेश में बीजेपी की स्पष्ट जीत पर संदेह है। कम-से-कम 60 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां जोड़तोड़ का संदेह है; एक टेक्निकल ग्रुप परिणामों का अध्ययन कर रहा है। इसके नतीजों को जनता के सामने लाया जाएगा।’

देवसहायम कहते हैं कि ‘न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग पर से हमारा विश्वास बिल्कुल खत्म हो गया है।’ पिछले छह साल में सिविल सोसाइटी समूहों ने आयोग को असंख्य चिट्ठियां लिखी हैं; कई मुद्दे उठाए हैं; दो रिपोर्ट पेश की हैं और राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक आयोजन किए हैं। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने जयपुर सम्मेलन में प्रेजेन्टेशन दिया। उसके बाद एक अध्ययन दल का गठन किया जाना था। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।
 

चुनावी शुद्धता पर जन आयोग का गठन हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों के साथ वाला टेक्निकल ग्रुप भी बनाया जा चुका है। कानूनी विशेषज्ञों का एक समूह जन प्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों के आधार पर चुनाव को चुनौती देने का मसला देख रहा है। वीवीपैट पर्चियों की गिनती के जरिये पुष्टिकरण और प्रमाणीकरण वाले कदमों को रोककर आयोग ने लोकतांत्रिक चुनाव के आधारभूत सिद्धातों का किसी भी तरह उल्लंघन ही किया है। देवसहायम ने इस बात पर व्यंग्य किया कि वीवीपैट मशीन से निकलने वाली पर्ची में चुनाव चिह्न की इमेज निकलता देखकर मतदाता को संतुष्ट करने की बात लागू कर इसने चुनाव को बायस्कोप भर में बदल दिया है।

देवसहायम कहते हैं कि सिविल सोसाइटी समूह आयोग पर दबाव ढीला नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को सिंबल लोडिंग यूनिट्स (एसएलयू) को स्ट्रांग रूम में रखने को कहा था। हम देखेंगे कि इसे आयोग ने लागू किया या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा था कि परिणाम घोषित करने के एक सप्ताह के अंदर विजेता और उपविजेता (के शुल्क जमा करने पर) पांच प्रतिशत ईवीएम यूनिट की एक सप्ताह के अंदर जांच की जाएगी और उनका मिलान किया जाएगा।

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