हम जो भी खाते हैं, उसे शरीर ग्लूकोज के रूप में ही उपयोग करता है। ग्लूकोज को उपयोग करने के लिए इंसुलिन हॉर्मोन की ज़रूरत होती है, जिसे पैनक्रिआस (बीटा) बनाता है। पर जब मोटापे, गलत लाइफस्टाइल, फैमिली हिस्ट्री, फिजिकल ऐक्टिविटी से दूरी आदि की वजह से पैनक्रिआस डिमांड के हिसाब से इंसुलिन नहीं पैदा कर पाता तो खून में शुगर का स्तर बढ़ने लगता है। यही शुगर की स्थिति होती है। लगातार शुगर बढ़े रहने से इसका असर शरीर के तमाम अंगों और यहां तक कि कोशिकाओं पर पड़ता है। इसलिए इसे काबू में रखना ज़रूरी है। खुद की कोशिशों से और दवाओं की मदद से।
शुगर को काबू रखने के लिए निम्न चीजों पर ध्यान देना चाहिए: –
सही डाइट से: खानपान में मीठा, कार्बोहाइड्रेट्स (चावल, रोटी आदि), फैटी चीज़ को कम करके। साथ में सलाद, फल यानी फाइबर वाली चीजें ज्यादा खाकर।
वज़न, स्ट्रेस और लाइफस्टाइल बेहतर करके: अगर वज़न बढ़ा हुआ है तो शुगर को काबू करना मुश्किल है। एक्सरसाइज़, योग आदि को ज़िदगी का हिस्सा बनाने से काफी फायदा होता है। दरअसल, मांसपेशियों के मजबूत होने से शुगर का खतरा कम हो जाता है। शरीर में ग्लूकोज का इस्तेमाल 2 जगहों पर पर होता है- बड़ी मांसपेशियों में और लिवर में। मांसपेशियां तभी ग्लूकोज का भरपूर इस्तेमाल कर पाती हैं, जब वे मजबूत हों। कमजोर मांसपेशियां अपने हिस्से का ग्लूकोज भी लिवर को भेज देती हैं। इससे लिवर को एक्स्ट्रा ग्लूकोज को भी खपाना होता है।
ऐसा न होने पर शरीर पहले उसे फैट के रूप में स्टोर करता है यानी फैटी लिवर। इससे भी ज्यादा होने पर खून में छोड़ देता है तो कलेस्ट्रॉल में बढ़ जाता है। ज्यादा होने पर खून की नलियों में चर्बी जमा होने लगती है तो हाई बीपी हो जाता है। इसलिए हर दिन ब्रिस्क वॉक और एक्सरसाइज़, योग करने के लिए कहा जाता है। साथ ही, 6 से 8 घंटे की नींद पूरी करने से भी काफी फर्क पड़ता है। वैसे तो स्ट्रेस की वजह से सीधे तौर पर शुगर नहीं बढ़ता, लेकिन यह दूसरी कई वजहें ज़रूर पैदा करता है। हॉर्मोन की गड़बड़ियां, नींद खराब आदि।
टैबलेट या इंसुलिन से: अगर ऊपर के उपायों से शुगर काबू में आ जाए तो मुमकिन है टैबलेट या इंसुलिन की ज़रूरत ही न पड़े। लेकिन अमूमन ऐसा बहुत कम होता है। इसलिए डॉक्टर बाकी उपायों के साथ टैबलेट या इंसुलिन भी लिख देते हैं।
कब मानें कि आपकी डायबीटिक क्लब में एंट्रीहो चुकी है?
सामान्य टेस्ट
खाली पेट (फास्टिंग) और नाश्ता या ग्लूकोज लेने के बाद (पीपी)।
फास्टिंग ब्लड शुगर (नॉर्मल): 70-100 mg/dl
ध्यान दें: रात में खाना खाने के बाद 12 घंटे की फास्टिंग ज़रूर हो। अगर रात में 8 बजे कुछ खाया है तो अगले दिन सुबह 8 बजे से पहले टेस्ट न कराएं। अगर 100 से ऊपर और 110-115 से कम तो यह प्रीडायबीटिक स्टेज है। अगर इससे भी ऊपर है तो डायबीटीज़ हो चुका है। यह फास्टिंग का मार्कर है।
पोस्ट प्रैंडियल (PP) शुगर: 70-140 तक mg/dl
ध्यान दें: खाने का पहला कौर खाने के 2 घंटे बाद टेस्ट किया जाता है। टाइम की कैलकुलेशन पहली बाइट से हो जाती है। इसमें अगर शुगर का स्तर 150-160 तक जाता है तो प्रीडायबीटिक स्टेज है। अगर इससे ऊपर चला गया तो डायबीटीज़ हो चुका है।
. HbA1c टेस्ट: इसे हीमोग्लोबिन A1c या ऐवरेज ब्लड शुगर टेस्ट भी कहते हैं। इस टेस्ट से पिछले 3 महीने के ऐवरेज ब्लड शुगर लेवल का पता लग जाता है। इसमें खाली पेट और खाने के दो घंटे बाद का ब्लड सैंपल देना नहीं पड़ता। कभी भी, किसी भी लैब में जाकर एचबीए1सी (ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन) टेस्ट के लिए सैंपल दे सकते हैं।
5.7 से कम: नॉर्मल
5.7 से 6.4: प्री-डायबीटिक
6.5 या ज्यादा: डायबीटिक
डायबिटीज हो जाने की स्थिति में टैबलेट या इंसुलिन में कौन बेहतर होता है इसे जानने के लिए निम्न बातों पर ध्यान दिया गाना चाहिए:ये
यहां इस बात को समझना ज़रूरी है कि टैबलेट पेनक्रिआस को ज्यादा मात्रा में इंसुलिन उत्पादन करने के लिए प्रेरित करता है, न कि टैबलेट में इंसुलिन होती है। वहीं, सुई के माध्यम से इंसुलिन सीधे खून में पहुंचती है। टैबलेट को इसलिए पसंद किया जाता है क्योंकि इसे लेने में परेशानी नहीं होती, लेकिन इंसुलिन में सुई लगानी होती है। दूसरी वजह यह भी है कि जब कोई शख्स यह सुनता है कि इंसुलिन चलाने के लिए कहा जा रहा है तो उसे लगता है कि अब सब खत्म! पर ऐसा नहीं है। असल मकसद है शुगर को काबू करना।
इंसुलिन की ज़रूरत तब ज्यादा पड़ती है जब HbA1c (शुगर की तीन महीने की औसत रिपोर्ट) रिपोर्ट 8 से ज्यादा दिखाए। अगर टैबलेट के माध्यम से यह 7 या 7.5 तक दिखे तो मुमकिन है दूसरे अंगों पर असर पड़ने में काफी वक्त लग जाए। लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी अगर शुगर का स्तर 8 से ज्यादा बना हुआ है तो काबू करना सबसे ज़रूरी है। ऐसे में इंसुलिन ही उपाय है। इंसुलिन स्किन में (सब क्यूटेनियस) ली जाती है। एक पतली-सी नीड्ल होती है। उसी से इंसुलिन शरीर में पहुंचती है। वैसे आजकल इंसुलिन पैच भी आ गए हैं। इसमें हर दिन सुई नहीं लगानी होती है।
टाइप-1 डायबीटीज़ तो पूरी तरह बाहरी इंसुलिन पर ही निर्भर
टाइप-1: इसमें टैबलेट से काम नहीं चलता। शुरुआत से ही इंसुलिन लेना ही उपाय है। दरअसल, बचपन में अचानक इंसुलिन हॉर्मोन बनना बिलकुल बंद होने की वजह से इस तरह की परेशानी होती है। हर मील के बाद या हर दिन शरीर में बढ़े हुए ग्लूकोज को काबू करने के लिए बाहर से इंसुलिन के इंजेक्शन की ज़रूरत होती है।
कम फिजिकल ऐक्टिविटी और गलत खानपान की वजह से जब पेट के पास चर्बी (विसरल फैट) जमा होने लगती है। साथ ही कलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड बढ़ने लगता है। फैमिली हिस्ट्री भी हो तो इंसुलिन की सेंसिटिविटी जल्दी कम होती जाती है यानी असर करने की क्षमता कम हो जाए तो यही स्थिति ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस’ की बनती है। इससे शुगर लेवल कम करने के लिए ज्यादा मात्रा में इंसुलिन की ज़रूरत पड़ती है। ऐसे में पेनक्रिआस को ज्यादा मात्रा में इंसुलिन का उत्पादन करना पड़ता है। आखिरकार पेनक्रिआस के लिए इंसुलिन की पूर्ति करना मुमकिन नहीं हो पाता। फिर शरीर को बाहर से इंसुलिन लेने की ज़रूरत होती है। यही स्थिति टाइप-2 डायबीटीज़ की होती है। ऐसे में शुरुआत में टैबलेट से काम चल जाता है और बाद में जब टैबलेट से शुगर काबू न हो तो पुराने मरीज को इंसुलिन की ज़रूरत पड़ती है।
अगर शुगर टैबलेट से काबू रहे तो टैबलेट को लेते रहें, लेकिन अगर टैबलेट सक्षम न हो तो डॉक्टर की राय मानकर इंसुलिन शुरू कर देनी चाहिए।-डॉ. अशोक झिंगन, सीनियर एंडोक्राइनॉलजिस्ट एंड चेयरमैन, डायबीटीज़ रिसर्च फाउंडेशन के अनुसार इंसुलिन नुकसान नहीं करती है, नुकसान करेगा बढ़ा हुआ शुगर।
शुगर के पुराने मरीजों में ऐसा देखा जाता है कि टैबलेट से शुगर काबू नहीं होती। ऐसे में इंसुलिन ही एक विकल्प बचता है। आजकल पैच भी आ गए हैं। आने वाले बरसों में ओरल (मुंह से दिए जाने वाला) इंसुलिन भी लॉन्च हो जाएगी। तब सुई नहीं लगानी होगी।
