साम्राज्यवादी ब्रिटेन के वंशजों वाली अमेरिका कई दशकों तक दुनिया की राजनीति का केंद्र वाला मुल्क रहा है।दुनिया के सबसे ज्यादा ताकतवर देश के रूप में उसके फैसले ही वैश्विक नियम तय करते थे, सहयोगी उसी की लाइन पर चलते थे और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था उसी की धुरी पर उसके इर्द-गिर्द घूमती थी।लेकिन यह कहानी अब बदल रही है, खासकर तब से जब से ट्रंप ने दूसरी बार अमेरिका राष्ट्रपति का पद संभाला है। ट्रंप के आने के बाद ट्रैरिफ की मार, उनके मनमर्जी वाले फैसले, अड़ियल रवैये से ज्यादातर देश खफा है, इसलिए तमाम मुल्क उस रास्ता को अख्तियार करने में लगे हैं, जिससे वे अबतक हिचकते नजर आ रहे थे।इस बदलाव को समझने के लिए हाल की कुछ घटनाओं पर नज़र डालना ही काफी है।
इधर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार कहा कि कनाडा के लिए बेहतर है कि वह अमेरिका का 51वां राज्य बन जाए। यह बयान कनाडा के लिए अपमानजनक था। साथ ही ट्रंप की वेनेज़ुएला में सैन्य दखल की भाषा, ग्रीनलैंड को लेकर जिद, और यूरोप पर दबाव ने कनाडा समेत कई सहयोगी देशों मुश्किल स्थिति में डाल दिया। ऐसे माहौल में कनाडा का चीन की ओर झुकना अमेरिका के लिए रणनीतिक सिरदर्द बन गया, क्योंकि अमेरिका आर्कटिक और ग्रीनलैंड क्षेत्र में चीन के प्रभाव को किसी भी हाल में रोकना चाहता है।लेकिन कनाडा के रवैये से साफ दिखा कि वह अब केवल अमेरिका पर निर्भर रहने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक विकल्प तलाशने वाला बन रहा है।
अमेरिका का सबसे करीबी पड़ोसी कनाडा लंबे समय से उसके सुरक्षा और आर्थिक ढांचे का हिस्सा रहा है। मगर हाल ही में कनाडा ने चीन के साथ जो टैरिफ डील की, उसने दुनिया के बॉस के लिए खतरे की घंटी बजा दी।कनाडाई सरकार ने चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर 100% से घटाकर केवल 6.1% टैरिफ कर दिया और बदले में चीन ने कनाडाई कनोला व सी फ़ूड पर शुल्क कम कर दिए। यह सौदा केवल व्यापार का मामला नहीं है, बल्कि एक संकेत है कि कनाडा अब दुनिया को अमेरिका की नजर से नहीं, बल्कि अपने हितों को ध्यान में रखकर ही देखने लगा है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इसे “दुनिया जैसी है, वैसी स्वीकार करो” वाली नीति कहा, जिसमें विचारधाराओं से ज्यादा महत्व व्यवहारिक लाभ को दिया जाता है।
अमेरिका और कनाडा में वेनेज़ुएला को लेकर नजरिया का फर्क भी सामने आ रहा है। एक तरफ अमेरिका में ट्रंप प्रशासन जहां कठोर शक्ति मिलिट्री प्रेशर, प्रतिबंध और दबाव का इस्तेमाल करता रहा, वहीं कनाडा ने चीन से टैरिफ डील जैसे आर्थिक रास्ते खोल अमेरिका को इशारा कर दिया कि यह “ट्रेड और टैरिफ” वाला जियो-इकोनॉमिक मॉडल अमेरिका की सुरक्षा-केंद्रित रणनीति के विपरीत है। ऐसे सहयोगी, जिन्हें अमेरिका अपनी लाइन में मानता है, अब अपने आर्थिक हितों के आधार पर फैसले लेने लगते हैं, तो अमेरिकी ब्लॉक में दरारें दिखाई देने लगती हैं।
ऐसा नहीं कि यह कहानी केवल कनाडा की है बल्कि दुनिया के अन्य बड़े देश भी यही रास्ता अपना रहे हैं। भारत इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।भारत एक तरफ अमेरिका से टेक, डिफेंस और इंडो-पैसिफिक सहयोग करता है, दूसरी तरफ रूस से तेल और हथियार लेता है, चीन के साथ भारी व्यापार रखता है और यूरोप से सप्लाई-चेन जोड़ता है। इस रणनीति को “मल्टी-एलाइन्मेंट” कहा जाता है। अक्सर भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर कहते भी कहते हैं कि हम दुनिया के एक धुव्रीय होने में यकीन नहीं रखते इसके कई आयाम हो सकते हैं
मल्टी-एलाइन्मेंट जिसमें कोई भी देश एक शक्ति के साथ नहीं बंधता, बल्कि कई शक्तियों के साथ अलग-अलग मुद्दों पर काम करता है। हालांकि गौर करने वाली बात ये है कि डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत-अमेरिका रिश्तों में उतार आया क्योंकि ट्रंप ने भारत पर मनमर्जी टैरिफ बढ़ाए बल्कि भारत के ही दुश्मन मुल्क पाकिस्तान को ज़रूरत से ज़्यादा तवज्जो दी और कई निर्णय बिना परामर्श के ले लिए।ऐसे में भारत समेत कई लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाएं अब एक-ध्रुवीय दुनिया के बजाय बहुध्रुवीय दुनिया को ज़्यादा सुरक्षित समझने लगी हैं।
