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UCC: समान नागरिक संहिता से हिंदुओं पर भी पड़ेगा असर, आदिवासी समाज भी UCC के खिलाफ कर सकता है आंदोलन

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विकास कुमार
समान नागरिक संहिता को लेकर देश में हलचल बढ़ गई है। समान नागरिक संहिता को लेकर मुस्लिमों और हिंदुओं की अपनी अपनी चिंताएं हैं। कई मुस्लिम नेताओं का कहना है कि सरकार ने यूसीसी का मुद्दा मुसलमानों को टारगेट करने के लिए उठाया है। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या समान नागरिक संहिता का असर सिर्फ़ मुसलमानों पर ही पड़ेगा?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड से सबसे ज्यादा प्रभावित मुस्लिम कम्युनिटी होगी। लेकिन इसमें कुछ बातें ऐसी भी हैं, जिसकी वजह से तमाम हिंदू भी यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध कर रहे हैं। एक खतरा ये है कि हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली एक्ट खत्म हो जाएगी। हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली को इनकम टैक्स एक्ट 1961 के तहत टैक्स में छूट मिलती है। हिंदू लॉ के तहत हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन अनडिवाइडेड फैमिली के दायरे में आते हैं। कुछ लोग आशंका जता रहे हैं कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली खत्म हो जाएगी। वहीं हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली का सिस्टम मुस्लिम और ईसाई धर्मों में नहीं है। संयुक्त परिवार हिंदुओं का ही विशिष्ट सिस्टम है,अगर समान नागरिक संहिता से अनडिवाइडेड फैमिली खत्म की जाती है तो हिंदुओं पर इसका असर पड़ेगा।

समान नागरिक संहिता से दूसरे धर्मों में शादी करने वाले कानून स्पेशल मैरिज एक्ट पर भी असर पड़ेगा। स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 देश में सिविल मैरिज या रजिस्टर्ड मैरिज के लिए बना कानून है। इस एक्ट के तहत किसी भी व्यक्ति को कुछ शर्तों के साथ किसी अन्य धर्म या जाति के व्यक्ति से शादी की इजाजत है। ये एक्ट दो अलग-अलग धर्मों और जातियों के लोगों को अपनी शादी को रजिस्टर्ड कराने के लिए बनाया गया है। इसमें की गई शादी एक सिविल कॉन्ट्रैक्ट होती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि समान नागरिक संहिता आने के बाद स्पेशल मैरिज एक्ट को रिप्लेस कर दिया जाएगा।

समान नागरिक संहिता से आदिवासी समुदाय में एक साथ एक से ज्यादा पत्नी रखने वाली प्रथा खत्म हो सकती है। अनुसूचित जनजातियां यानी एसटी उन समूहों की सरकारी लिस्ट है,जो आमतौर जंगलों और पहाड़ी इलाकों में निवास करते हैं। भारत में सात सौ पांच आदिवासी समुदाय हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, इनकी आबादी 10 करोड़ से ज्यादा है। यह भारत की कुल आबादी का 8फीसदी से ज्यादा है। आदिवासी समुदायों में एक मर्द एक साथ एक से अधिक महिलाओं से शादी या फिर एक महिला की एक से अधिक मर्द से शादी हो सकती है। ऐसे में समान नागरिक संहिता लागू होने से यह प्रथा खत्म हो सकती है। इसीलिए राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद 2016 में ही अपने रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में जनजाति आबादी काफी ज्यादा है। इसलिए नॉर्थ ईस्ट में समान नागरिक संहिता के खिलाफ बड़ा आंदोलन हो सकता है।

समान नागरिक संहिता से दक्षिण भारत के हिंदू परिवारों में रिश्तेदारों के बीच होने वाली शादियां नहीं हो पाएंगी। तमिलनाडु में करीब 26 फीसदी लोग रिश्तेदारों में शादी करते हैं। 2015-16 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक तमिलनाडु में 10 दशमलव 5 फीसदी महिलाएं कजिन मैरिज करती हैं। दक्षिण के दूसरे राज्यों में भी ऐसा देखने को मिलता है। बताया जा रहा है कि समान नागरिक संहिता आने से मुस्लिम अपने कजिन से शादी नहीं कर पाएंगे। वैसे ही दक्षिण भारत के ये हिंदू परिवार भी ऐसी शादी नहीं कर पाएंगे।

मोदी सरकार को समान नागरिक संहिता पर समाज के सभी वर्गों से संवाद करना चाहिए। और संवाद के नतीजों के आधार पर ही समान नागरिक संहिता को देश में लागू करना चाहिए।

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