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अग्निवीर में हो सकता है बदलाव,जेडीयू और चिराग के साथ बीजेपी की खुद की भी मंशा

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2024 ईस्वी में हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत से कम सीट मिलने के लिए एक बड़ी वजह अग्निवीर योजना भी रही।विपक्षी राजनीतिक दलों ने इसे चुनावी मुद्दा बनाकर वोट बटोर लिया,जबकि चुनाव के दौरान अग्निविर योजना का सर्वे कर इसमें सुधार लाने की बात कहने के बावजूद बीजेपी को मतदाताओं खासकर युवा मतदाताओं का इस कदर कोपभजन होना पड़ा कि 370 का ख्वाब देख रहे बीजेपी को खुद का बहुमत प्राप्त नहीं हुआ ,और यह 240 सीट पर ही सिमट गई।लेकिन अब जब एनडीए जिसे 293 सीट मिली है की सरकार बन रही है, तब इसकेे सहयोगी दल एलजेपी (रामविलास)) और जेडीयू ने एक बार फिर से अग्निवीर योजना में बदलाव की मांग उठाई है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने कहा था कि हम इस स्कीम को खत्म करने के पक्ष में नहीं है,लेकिन कुछ बदलाव इसमें होने चाहिए। रामविलास के नेता चिराग पासवान का कहना है कि इस स्कीम में बदलाव किया जाए।मोदी. 3 सरकार के गठन के पूर्व भले ही अग्निवीर योजना में बदलाव की यह मांग गठबंधन की सहयोगियों ने उठाई है, लेकिन चुनाव के दौरान बीजेपी ने भी अग्निवीर स्कीम का सर्वे करने की मंशा जाहिर की थी। ऐसे में एनडीए के सहयोगी दलों की इस मांग को पूरा करना बीजेपी के लिए कठिन नहीं होगा।

बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान अग्निवीर योजना को लेकर कही थी यह बात

अग्निवीर योजना को लेकर चुनाव से पहले बीजेपी के नेताओं ने कहा था कि हम अग्निवीर योजना में कुछ ऐसे बदलाव करना चाहते हैं इसके तहत जवानों को अग्निवीर की नौकरी के बाद दूसरी जगह पर आरक्षण मिल सके।इसके अलावा उन्हें मिलने वाले वेतन और भत्ते में भी थोड़ा सुधार किया जाए। यह एक बड़ा बदलाव हो सकता है कि अग्निवीर के तौर पर भर्ती जवानों में से 25 परसेंट को नियमित नौकरी के लिए जो मौका मिलता है,उसे अब बढ़ाया जा सकता है।इसके अलावा सेना में अग्निवीरों की हिस्सेदारी कम हो सकती है।सरकार का मत है कि इस स्कीम का सर्वे करना चाहिए। स्कीम के हानि और लाभ को समझने के बाद ही इस पर फैसला लिया जाना चाहिए।

सैनिकों के समतुल्य सुविधा

फिलहाल आतंकियों से लोहा लेने के दौरान या अन्य किसी ऑपरेशन में अग्निवीरों के शहीद होने पर नियमित सैनिकों के मुकाबले मुआवजा कम मिलता है।ऐसे में अग्निवीरों द्वारा इस मुआवजा का विरोध होता रहा है।अब सरकार इसमें भी सुधार करने पर विचार कर सकती है। सरकार और सेना के सामने एक चिंता यह भी है कि नियमित भर्ती रुकने के चलते सैनिकों की संख्या कम हो रही है ।

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