बीरेंद्र कुमार झा
एक छोटे से अल्पविराम के बाद फिर से न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सख्त टिप्पणी की।शीर्ष कोर्ट ने सवाल किया कि केंद्र ने अभी तक उच्च न्यायालय की सिफारिशें कॉलेजियम को क्यों नहीं भेजी है? नामों को मंजूरी देने में केंद्र द्वारा देरी का आरोप लगाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संजय किशन कॉल और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि वे मामले की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं।
निर्णय से पहले कोलेजियम जानना चाहती है सरकार का दृष्टिकोण
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार न्यायमूर्ति कॉल ने केंद्र सरकार को संबोधित करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय के 80 नाम 10 महीने से लंबित हैं। केवल एक बुनियादी प्रक्रिया होती है ,जिसे किया जाना है।आपका दृष्टिकोण जानना होगा ताकि कॉलेजियम निर्णय ले सके। पीठ ने कहा कि 26 न्यायाधीशों का तबादला और संवेदनशील उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति लंबित है।
अटॉर्नी जनरल ने मांगा एक सप्ताह का समय
जस्टिस कॉल ने कहा कि मेरे पास इस बात की जानकारी है कि कितने नाम लंबित हैं,जिनके नाम की सिफारिश उच्च न्यायालय ने की है, लेकिन कॉलेजियम को यह सिफारिश नहीं मिली है। अटार्नी जनरल आर वेंकटरमनी ने जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय मांगा है। पीठ ने उन्हें दो सप्ताह का समय दिया और कहा कि वे इस मामले पर केंद्र की दलील के साथ आएं ।अब इस मामले की सुनवाई 9 अक्टूबर को होगी।
केंद्र जजों की नियुक्ति को मानती है कार्यपालिका का अधिकार
सख्त टिप्पणी में जस्टिस कॉल ने कहा कि कहने को तो बहुत कुछ है, लेकिन मैं खुद को रोक रहा हूं। मैं चुप हूं क्योंकि एजी ने जवाब देने के लिए एक हफ्ते का समय मांगा है,लेकिन अगली तारीख पर मैं चुप नहीं रहूंगा।न्यायाधीशों की नियुक्ति सर्वोच्च न्यायालय और कार्यपालिका के बीच विवाद का एक प्रमुख मुद्दा रहा है।केंद्रीय मंत्रियों का तर्क है कि जजों के चयन में सरकार की भूमिका होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की थी राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति अधिनियम
सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति अधिनियम को रद्द कर दिया था। अगर वह अधिनियम रहता तो न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की बड़ी भूमिका होती। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच विवाद पिछले साल उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की उसे टिप्पणी से और बढ़ गया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कानून को 19 प्रभावित कर दिया है।

