पश्चिम बंगाल में एसआईआर होगा मुख्य चुनाव मुद्दा

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पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है। यहां 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को दो चरणों में हो रहे विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होंगे। वैसे तो यहां चुनाव मैदान में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के अलावा कांग्रेस पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, हुमायूं कबीर के नेतृत्व वाली आम जनता उन्नयन पार्टी तथा असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआइएमआइएम पार्टी भी चुनाव मैदान में अपना अपना भाग्य आजमा रही है। पश्चिम बंगाल के 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए हुए चुनाव में टीएमसी ने 213 और बीजेपी ने 77 सीटें जीती थी। कांग्रेस और कांग्रेस पार्टी ने गठबंधन कर चुनाव लड़े थे लेकिन कोई सीट जीतने में इन्हें कामयाबी हासिल नहीं हुई थी। सिर्फ दो सीटों पर ही उम्मीदवार स्थानीय मुद्दे को लेकर चुनाव जीत पाए थे।

2026 के चुनाव में भी चुनाव मुख्य रूप से टीएमसी और बीजेपी के बीच ही लड़े जाने हैं, क्योंकि कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने पिछले 5 साल में ऐसा कुछ नहीं किया है,जिससे वह मुख्य चुनावी पार्टी बन सके, अलबत्ता हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी बाबरी मस्जिद के नाम पर चर्चा में बनी रहने में तो सफल हुई है लेकिन इनके लिए भी चुनाव के केंद्र बिंदु में आना संभव संभव नहीं है। एक दो सीट भी जीत है तो यह भी बड़ी बात होगी।अब्बल तो ईसकी भी संभावना नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में अक्सर ऐसे उन्नमादी मामले चुनावी परिणाम में परिणत नहीं होते हैं।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव मैं जीत हासिल करने के उद्देश्य से टीएमसी और बीजेपी ही वहां पूरा जोर लगाती दिख रही हैं। बीजेपी के तरफ से सुवेंदु अधिकारी जैसे स्थानीय नेता के अलावा खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह पश्चिम बंगाल में बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे हैं और लोगों से बीजेपी के पक्ष में वोट देने डालने का आह्वान कर रहे हैं। तो वहीं टीएमसी भी अपने पिछला रिकॉर्ड को दोहराने के लिए ममता बनर्जी के नेतृत्व में बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे हैं प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को टारगेट कर रही है और लोगों से टीएमसी के पक्ष में वोट डालने का आह्वान कर रही हैं।

ऐसे धुआंधार चुनाव प्रचार और एक दूसरे को लेकर आरोप प्रत्यारोप एक हद तक तो तू इन राजनीतिक दलों को फायदा पहुंचाते हैं। कम से कम इसी बहाने कार्य करता अपनी पार्टी से जुड़े रहते हैं। लेकिन इस दौरान कही जाने वाली अधिकांश बातें किसी पार्टी की बड़ी जीत या किसी पार्टी की बड़ी हार का कारण नहीं बनती हैं, लेकिन इस दौरान कही गई एक आध बात ही किसी पार्टी की जीत और किसी पार्टी की हार का बड़ा कारण बन जाती है।

वर्ष 2021 के चुनाव में आपने देखा होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा बार-बार कहे जाने वाले दीदी और दीदी को लेकर जब टीएमसी की नेत्री ममता बनर्जी ने इस मामले को खुद की हजरत से ज्यादा बंगाल की हजरत करने वाला बता दिया तो पश्चिम बंगाल की जनता का मूड ही कुछ ऐसा हो गया जिससे पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने की दावा करने वाली बीजेपी 77 सीटों पर सिमट गई और टीएमसी को 213 सीटों पर जीत का एक बड़ा उपहार मिल गया।

अब बात 2026 के चुनाव के संदर्भ में ऐसे मुद्दे की करें जो कि एक की फैक्टर हो सकता है। यह मुद्दा है मतदाता सूची के एसआईआर यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की। वैसे तो फिर की प्रक्रिया बिहार चुनाव के दौरान भी चल रही थी और संप्रति जिन राज्यों में इस समय चुनाव की प्रक्रिया जारी है, उसमें पश्चिम बंगाल के अलावा पुडुचेरी और तमिलनाडु में भी एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन पश्चिम बंगाल को छोड़कर किसी भी अन्य राज्यों में एस ए आर कोई बड़ा चुनावी मुद्दा बनता नहीं दिख रहा है। बिहार चुनाव के दौरान भले ही राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने बीजेपी पर एस ए आर के जरिए वोट चोरी के आरोप लगाए थे लेकिन वह इसे कोई बड़ा मुद्दा नहीं बना पाए थे और बीजेपी भी इसे लेकर कोई खास आक्रामक नहीं थी। लेकिन पश्चिम बंगाल में तो एसआईआर ही चुनावी हथियार बन गया है। बीजेपी भी और टीएमसी भी एसआईआर को अपना हथियार बनाकर एक दूसरे परिवार कर चुनावी जीत हासिल करने में जुड़ गई है।

बात बीजेपी के नजरिए से करें तो इस बार बीजेपी ने पश्चिम बंगाल के चुनाव में एसआईआर की आड़ में चुनाव आयोग को आगे कर दिया और उसकी मदद से पश्चिम बंगाल में बहुत सारे मतदाताओं के नाम तो काटे जा ही रहे हैं ऊपर से पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिन और डीजीपी जैसे उच्च पदस्थ पदाधिकारी को बदलने के साथ-साथ ब्लॉक स्तर तक और थाना स्तर तक में वीडियो को और थाना प्रभारी तक को बदल कर रख दिया है। इसके अलावा बीजेपी के हर बड़े नेता अपने हर बड़ी पार्टी में घुसपैठिया घुसपैठियों चिल्लाते हैं और इसके लिए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी सरकार को दोषी ठहराते हैं।

वहीं ममता बनर्जी एसआईआर के मुद्दे पर बीजेपी को वैसे ही अपने लपेटे में लेकर पश्चिम बंगाल की जनता को अपने पक्ष में करने में जुट गई है ,जैसा कि उसने 2021 ई के विधान सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के द्वारा कहे गए दीदी और दीदी वाले बातों से जनता को अपने पक्ष में करके 213 सीटों पर टीएमसी के उम्मीदवारों को जिताने में सफलता प्राप्त की थी। यह बात अलग है कि अपनी पार्टी को इतनी बड़ी जीत दिलाने वाली ममता बनर्जी खुद नंदीग्राम में सुबेंदु अधिकारी के हाथों पराजित हो गई थी और बाद में उन्हें मुख्यमंत्री बने रहने के लिए अपने एक सहयोगी से भवानीपुर की सीट को खाली करवा कर चुनाव लड़ना पड़ा था,जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई थी। ममता बनर्जी चुनाव आयोग के द्वारा एसआईआर के माध्यम से 50 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा देने की बात को बीजेपी के इशारे पर पश्चिम बंगाल के लोगों का निरादर करने वाला बता रही हैं। वहां के लोगों को यह भरोसा दे रही है कि वह एक भी ऐसे वास्तविक मतदाताओं को जिसे बीजेपी घुसपैठिया या घुसपैठिया कहकर मतदाता सूची से नाम हटवा रहा है, उसे हटाने नहीं देगी और ऐसे लोग चुनाव में मतदान करेंगे। एसआईआर के मुद्दे पर बीजेपी ने भले ही यह मन बना लिया हो कि वह इसके द्वारा ममता बनर्जी को घेर कर बंगाल की 2026 विधानसभा चुनाव में अपनी जीत हासिल कर लेगी और ममता बनर्जी को अपने इस प्रयास पर उंगली उठाने का मौका ही नहीं देगी। इसलिए इस समय जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और वहां एसआईआर का काम चल रहा है उसमें से एक केंद्र शासित प्रदेश पुडीचेरी को भी शामिल करवा दिया है, जहां बीजेपी की गठबंधन वाली सरकार है,ताकि ममता बनर्जी बीजेपी पर यह आरोप न लगा सके कि केंद्र के नरेंद्र मोदी सरकार ने जानबूझकर सिर्फ उन्हीं राज्यों में ऐसआईआर की प्रक्रिया प्रारंभ की है जहां गैर बीजेपी सरकार है, क्योंकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल इन दोनों ही राज्यों में गैर बीजेपी की सरकार है। लेकिन ममता बनर्जी ने यह कहकर बीजेपी को लपेटे में ले लिया कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के दरमियान अगर एस आई आर की प्रक्रिया चल रही है ,तो यह पड़ोसी राज्य असम में जहां बीजेपी की सरकार है और चुनाव हो रहे हैं ,वहां क्यों नहीं हो रही और फिर इसी बात को वे बंगाल के अपने मतदाताओं को समझा रही है कि किस प्रकार से बीजेपी बंगाल की जनता को हिकारत भरी नजरों से देख रही है।

इन दोनों राजनीतिक दलों के एस ए आर के प्रति रवैया को लेकर पश्चिम बंगाल में सी आर को लेकर मुद्दे विस्फोटक होने लगे हैं। मालदा में इस मामले के निपटारे के लिए बनी न्यायिक कमेटियों का भी लोगों के द्वारा घेराव किया जाने लगे हैं और उनसे अमानवीय वार्ताओं किए जाने लगे हैं। हालांकि फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप किया और इसके व्यापक जान क नी करने की चुनाव आयोग से मांग कर दी।

अब इस मामले को भी बीजेपी और टीएमसी के नेता अपने-अपने तरीके से लेकर लोगों के बीच जा रहे हैं और उन्हें इस मामले को लेकर भड़का कर अपने पक्ष में मतदान के लिए तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी एसआईआर के बहाने चुनाव आयोग के माध्यम से वर्ष 2026 के चुनाव में जीत हासिल कर पहली बार पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी की सरकार बनाने में सफल होगी या फिर एक बार इसी एसआईआर के मुद्दे से पश्चिम बंगाल की जनभावना को अपने पक्ष में कर कर ममता बनर्जी बीजेपी को एक बड़ी शिकस्त देने में कामयाब होती है और चौथी बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बन जाती हैं।

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