गाजियाबाद में तीन सगी नाबालिग बहनों ने एक बिल्डिंग के 9वें फ्लोर से कूदकर जान दे दी। इस घटना के पीछे की वजह- टास्क बेस्ड गेमिंग के एडिक्शन को बताया जा रहा है। आज हमने खुद अपने बच्चों के हाथों में खिलौनों की तरह स्मार्टफोन नहीं बल्कि उन्हें नुकसान पहुंचाने वाले ‘हथियार’ पकड़ा दिए हैं। हमें इस बात का अंदाजा ही नहीं कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि मासूम दिमागों को हाईजैक करने वाले साइलेंट किलर बन चुके हैं। ये प्लेटफॉर्म और गेमिंग ऐप्स उन्हें अपनी असलियत से नफरत करना सिखा रहे हैं। ऐसे समय में जब दुनियाभर के देश 16 साल तक के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगा रहे हैं, तब क्या भारत को भी इस काम में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
गाजियाबाद में जो हुआ, वह कोई पहली घटना नहीं थी। इससे पहले भी कई बार ये ऑनलाइन गेम्स और इंटरनेट की दुनिया मासूमों को अपनी चपेट में ले चुकी है। साल 2017 के ब्लू व्हेल चैलेंज नाम के गेम की दहशत मुझे आज भी याद है। उस गेम में भी बच्चों को अलग-अलग टास्क दिए जाते थे और 50वें टास्क के रूप में उन्हें आत्म हत्या करने के लिए उकसाया जाता था। इसके बाद मोमो चैलेंज और पिंक व्हेल जैसे टास्क आधारित चैलेंज और गेम्स के मामले भी सुर्खियों में आए। आजकल के PUBG, फ्री फायर और टास्क आधारित गेम्स बच्चों को चिड़चिड़ा और गुस्सैल बना रहे हैं। ये गेम्स सिर्फ मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि ब्रेन वॉश करने वाले ऐसे मानसिक हथियार हैं, जिन्होंने मासूमों को अवसाद की ओर धकेलने का काम किया है।
भारत को बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम को खतरे की घंटी की तरह देखना चाहिए। Economic Survey 2025-26 के अनुसार, भारतीय बच्चे सुरक्षित माने जाने वाली सीमा से दोगुना समय स्क्रीन पर बिता रहे हैं। दुनिया में सबसे सस्ते इंटरनेट डेटा का यह एक ऐसा नुकसान है, जिसकी ओर फिलहाल ध्यान देने की जरूरत है। रील्स और शॉर्ट्स ने बच्चों के अटेंशन स्पैन को पहले ही खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। वहीं अब गाजियाबाद की घटना बताती है कि बच्चे वर्चुअल कैरेक्टर्स के प्यार में पड़ने लगे हैं। अगर हम चाहते हैं कि बच्चे ब्लू व्हेल से लेकर कोरियन लव गेम जैसे खेलों से दूर रहें, तो आज ही कड़े नियम लागू किए जाना जरूरी है।
डिजिटल लाइफ के बच्चों पर पड़ते प्रभाव सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। दुनियाभर के कई विकसित देशों ने इस हकीकत को स्वीकार करना शुरू किया है कि सोशल मीडिया बच्चों के लिए धीमे जहर की तरह है। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला ऐसा देश बना है जहां बच्चों के लिए सोशल मीडिया को पूरी तरह से बैन कर दिया गया है। इसके अलावा नॉर्वे और डेनमार्क ने सोशल मीडिया का एक्सेस देने के लिए बच्चों की उम्र को बढ़ाकर 13 से 15 कर दिया है। इन देशों का साफ कहना है कि सोशल मीडिया और टेक कंपनियां बच्चों के दिमाग के साथ बुरी तरह से खेल रही हैं। यूरोप और यूके भी इस दिशा में बढ़ने की सोच रहा है। ऐसे में यह सबसे सही समय होगा कि भारत भी इस दिशा में कदम बढ़ाए और टेक कंपनियों से ऐसे नियमों का कढ़ाई से पालन करवाया जाए।
