UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 (जिसे नए यूजीसी एक्ट/नियम के रूप में जाना जा रहा है) 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित (notify) किया गया था और यह 15 जनवरी 2026 से लागू हुआ था। इसे लेकर UGC का कहना था कि इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना और समानता लाना है, लेकिन यह नियम यूजीसी के कथनी के विपरीत ठीक उल्टा था। यह नियम पूरी तरह से जातिगत भेदभाव पैदा करने वाला और असमानता लाने वाला था। यह तो संविधान के अनुच्छेद 14 जिसमें भारत के सभी नागरिकों को बिना जाति,क्षेत्र और उसकी सामाजिक हैसियत पर विचार किये कानून की नजर में समान होने की बात कही गई है उसका भी खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन है। इसमें एक दो जाति को नहीं बल्कि पूरे सवर्णों के साथ भेदभाव किया गया है। और यह भेदभाव इतना गहरा है कि इस कानून के अंतर्गत सवर्णों को अपने ऊपर आरोप लगाए जाने के विरोध में इस कानुन के अन्तर्गत अपील करने तक का अधिकार नहीं दिया गया है।
यूजीसी ने अगर इतना बड़ा अनर्थकारी कदम उठाया तो यह उसके अकेले का तो फैसला नहीं हो सकता है। नहीं हो सकता है जोक्या,नहीं है। क्योंकि यह बिल तो संसद के एक विशेष समिति के द्वारा निर्णय लेने के बाद कानून के रूप में आया है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की नजरों में यह नहीं पड़ा होगा इसकी संभावना नहीं के बराबर है। नहीं के बराबर मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि ऐसा हो सकता है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान या अन्य किसी ने उन्हें सिर्फ यूजीसी के नए नियम बनाने की बात कहीं हो और उन्होंने इसे यूजीसी और विश्वविद्यालय का मुद्दा मानकर गंभीरता से नहीं लिया हो। लेकिन इसकी संभावना भी बहुत कम है, क्योंकि पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की कार्यशैली इतनी लचर नहीं है। हां यह भले ही हो सकता है कि उन्हें यह बात बताई गई हो कि विश्वविद्यालय की एक छोटे से हिस्से में इसे लागू कर देने से कुछ जाता ज्यादा बनता बिगड़ता नहीं है।लेकिन इसी बहाने ओबीसी के एक बड़े वर्ग को अपने पाले में कर केंद्र में लगातार चौथी बार पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का गठन
बड़े आसानी से किया जा सकता है। और पीएम मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी कितनी प्यारी है इसे हर कोई जानता है। प्रधानमंत्री की कखातीर तो वह किसी भी हद तक जा सकते हैं।
पूर्व में भी वह भूमि अधिग्रहण अधिनियम से लेकर किसानों के मुद्दे पर काफी आइडियल रुक अपने के बाद बैक फुट पर आ चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जब अनुसूचित जाति जनजाति उत्पीड़न अधिनियम के तहत दो सिद्ध नहीं होने तक आरोपी को जय नहीं जाने जैसा लोकप्रिय फैसला सुनाया था तो इन वर्गों के वोट के विदक जाने की वजह से प्रधानमंत्री की कुर्सी के खिसक जाने के दर से उन्होंने केंद्र में अपने बहुमत का उपयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को पलट दिया था। हालांकि तब इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप सवर्णों ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी को सत्ता में आने से रोक दिया तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी इस बड़ी गलती का एहसास हुआ था और उन्होंने स्वर्ण के लिए भी ईडब्ल्यूएस के अंतर्गत आरक्षण की व्यवस्था कर सवर्णों के क्रोध को शांत किया था।
13 जनवरी को जब यूजीसी के इस नये नियम का नोटिफिकेशन किया गया और 15 जनवरी से इसे लागू किया गया तब प्रधानमंत्री नरेंद्र इसे लेकर गंभीर नहीं हुए और ओबीसी के बड़े वोट बैंक के मिल जाने से चौथी बार केंद्र की सत्ता में आने का मुगालता पालते रहे।
लेकिन 15 जनवरी को यूजीसी के इस नए नियमन के लागू होते ही जिस प्रकार से स्वर्ण ने पहले पूरे देश में सड़क पर उतर कर अपना आंदोलन तेज कर दिया और बाद में मामले को सुप्रीम कोर्ट पहुंचा दिया।
इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले सरकार ने एक बड़ा चालाकी बड़ा कदम उठाया कि उसने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को स्वर्ण को यह समझने के लिए भेज दिया किस नियम से किसी को कोई हानि नहीं पहुंचने दी जाएगी। तब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का यह सूचना था की स्वर्ण से ऐसी ही मीठी-मीठी बातें कर उन्हें बहला दिया जाएगा और इस बीच कुछ दिनों तक यूजीसी को भी इस नियम में शिथिलता बरतने और किसी पर कोई कार्रवाई नहीं करने की बात कह कर अपना हित साथ लेंगे। सड़क दुर्घटना में चालकों से जमाने के रूप में एक करोड़ रूपया की वसूली वाला कानून को ऐसे ही सिर्फ जुबानी बंद रखने जैसे कई कानून इस समय देश में ऐसे हैं जो सिर्फ जुबानी रूप से अस्तित्व है जिसे एक केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार कभी भी व्यवहार में ला सकती है।
लेकिन सवर्ण तो उनके इस झांसे में आने वाले थे नहीं । सवर्णों ने जब तक सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को इस नियम को विभेदकारी बताते हुए इसे स्थगित कर दिया और पूर्व के यूजीसी के ऐसे एक कानून को प्रचलन में बनाने की बात कह दी तबतक सड़क पर अपना प्रदर्शन जारी रखा। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को प्रतिघाती कदम बताते हुए यह भी कहा किया देश को फिर से पुराने जातिवाद के दलदल में घसीट लेगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेषज्ञ कमेटी जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के साथ-साथ सभी वर्गों के विशेषज्ञों वाली एक कमेटी से इस पर विचार मंथन कर 19 मार्च तक एक हलफनामा कोर्ट में दाखिल करने का निर्देश दिया।
अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी गलती का पूरा अहसास हो चुका है और वे अब किसी के बार गलवे में आने वाले नहीं है। अब खुद इस मुद्दे को निपटने में जुटे हुए प्रतीत होते हैं ताकि स्वर्ण के नाराज होने के खतरों से बचा जा सके। ओबीसी पूरी तरह से बीजेपी के पक्ष में आएगी या नहीं इसका कोई ठिकाना नहीं क्योंकि कई राज्यों में या कई क्षेत्रीय दलों की भी एक थाती है। ऐसे में अब पीएम मोदी स्वर्ण के नाराज हो जाने का खतरा कतई मोल नहीं ले सकते।
शायद यही कारण है कि केंद्र सरकार ने 19 मार्च को यूजीसी के इस नए नियमन को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कोई हलफनामा दाखिल नहीं किया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अवमानना से बचने का उसके पास एक बड़ा तरीका यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह हलफनामा एक विशेषज्ञ कमेटी से निर्णय आने के बाद उसको आधार बनाकर दाखिल करने का निर्देश दिया है। केंद्र सरकार का यूजीसी के नियमन को बनाए रखने जैसा कोई हलफनामा दायर न करना यह बताता है की पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अब सवर्णो के महत्व को समझ चुकी है। अब जब तक केंद्र सरकार एक विशेषज्ञ कमेटी नहीं बैठा लेती है और उसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर नहीं करती है, तब तक यूजीसी का यह नया नियम ऐसे ही हवा में लटका रहेगा ।कोई भी बिना विशेषज्ञ कमेटी के निर्णय के इसे लागू नहीं करवा सकता है। यह स्वर्ण की एक बड़ी जीत मानी जा सकती है। और जब पीएम मोदी को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने सवर्णों के लिए एक प्रकार से जीत का अनुभव कराने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल नहीं किया।
इसके अलावा अब इससे ध्यान बंटाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2029 से पूर्व ही संसद में महिला आरक्षण से जुड़ा एक बिल लेकर आने की बात करने लगे हैं। हालांकि इस बिल को जब संसद में पास किया गया था तभी महिला को समग्रता से लिया गया था। लेकिन इसके बावजूद विपक्षी नेता महिला आरक्षण बिल में संशोधन की बात कह कर महिलाओं में भी जातिगत आरक्षण की बात कर सकते हैं। तब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार इस यूजीसी बिल के सुप्रीम कोर्ट द्वारा लटका दिए जाने की बात कह कर विपक्षियों के प्रयास पर पानी फेर सकते हैं। और महिलाओं के लिए चुनाव में आरक्षण के मामले में स्वर्ण वर्ग की महिलाओं को भी अन्य वर्ग के महिलाओं की तरह ही अधिकार मिलता रहेगा।

