आज के समय में बच्चों का स्मार्टफोन और स्क्रीन पर जरूरत से ज्यादा समय बिताना ज्यादातर माता-पिता के लिए एक बड़ी चिंता बन चुका है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, बड़ी संख्या में माता-पिता मानते हैं कि ज्यादा स्क्रीन देखने से बच्चों की मानसिक सेहत पर असर पड़ रहा है। खासतौर पर सोशल मीडिया, इंटरनेट से जुड़ी सुरक्षा और लगातार गैजेट इस्तेमाल को लेकर चिंताएं तेजी से बढ़ी हैं।
हेल्थ और साइंस से जुड़ी पत्रकार कैथरीन प्राइस का मानना है कि जब बच्चे लगातार स्क्रीन में डूबे रहते हैं तो वे असल जिंदगी के अनुभवों से दूर हो जाते हैं। न तो उन्हें वास्तविक दुनिया के जरूरी कौशल सीखने का मौका मिलता है और न ही वे लोगों से आमने-सामने बातचीत करना सीख पाते हैं।यही वजह है कि स्क्रीन टाइम को लेकर अब गंभीर सोच जरूरी हो गई है।
कैथरीन प्राइस ने ‘द एंग्जायस जेनरेशन’ के लेखक जोनाथन हैट के साथ मिलकर बच्चों और किशोरों में स्क्रीन और सोशल मीडिया के असर पर काम किया है।उनकी किताब The Amazing Generation: Your Guide to Fun and Freedom in a Screen-Filled World में माता-पिता के लिए कई व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं जो सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि दुनिया भर में लागू किए जा सकते हैं।
बच्चों की आदतें बदलने का सबसे असरदार तरीका है कि माता-पिता खुद वैसा ही व्यवहार करें, जैसा वे अपना बच्चों से चाहते हैं। अगर आप खुद फोन या लैपटॉप पर ज्यादा समय बिताते हैं तो बच्चों से दूरी बनाना मुश्किल हो जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि वे बच्चों के सामने कौन-सी आदतें दिखा रहे हैं।चाहें तो बच्चों को यह अधिकार भी दें कि अगर आप जरूरत से ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल करें तो वे आपको टोक सकें।
बच्चों को कम उम्र में अपना स्मार्टफोन देने के बजाय परिवार के लिए एक या दो फोन रखना बेहतर विकल्प हो सकता है। इससे बच्चों को यह समझ आता है कि फोन एक जरूरत का साधन है न कि हर समय इस्तेमाल की चीज।
घर पर लैंडलाइन या साधारण फोन से दोस्तों और रिश्तेदारों से बात करने की आदत डालना बच्चों के संवाद कौशल को बेहतर बनाता है।स्कूल के बाद की गतिविधियों या कहीं बाहर जाने के लिए फ्लिप फोन जैसा साधारण विकल्प भी काफी हो सकता है जिसे जरूरत पड़ने पर लेकर वापस कर दिया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को स्मार्टफोन देने में जितनी देर की जाए, उतना बेहतर होता है। अगर उम्र के साथ भी आप इसे टालना चाहते हैं तो बच्चों से कह सकते हैं कि वे अपना स्मार्टफोन खुद खरीदें।जब बच्चे जानते हैं कि फोन की कीमत उन्हें अपनी मेहनत से चुकानी है तो वे खुद ही इस फैसले पर दोबारा सोचते हैं। इससे उन्हें मेहनत, धैर्य और लक्ष्य के लिए काम करने जैसे अहम जीवन कौशल भी सीखने को मिलते हैं।
स्मार्टफोन और तकनीक को पूरी तरह से हटाना संभव नहीं है, लेकिन सही सीमाएं तय करना जरूरी है। अगर माता-पिता समझदारी से नियम बनाएं और खुद भी उनका पालन करें तो बच्चों का ध्यान दोबारा पढ़ाई, खेल और असली दुनिया की ओर लौट सकता है।
