आसान भी नहीं है विपक्षी एकता की कहानी !एकता बन जाए तो बीजेपी सिमट जाएगी वरना —

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अखिलेश अखिल 

पिछले दो दिनों तक दिल्ली का लुटियंस जोन गर्म रहा। दिल्ली का सियासी तापमान भी बढ़ा। चारो तरफ एक ही चर्चा रही कि विपक्षी एकता  बीजेपी भारी नुकसान हो  सकता है। लेकिन लगे हाथ यह भी चर्चा का विषय रहा कि क्या विपक्ष एक हो पायेगा ?  देश के   भीतर जिस तरह की क्षेत्रीय राजनीति है और जिस तरह के मजबूत क्षत्रप हैं उससे नहीं लगता कि विपक्षी एकता आसानी से तैयार होगी। इतिहास को देखें तो तो साफ़ हो जाता है कि आज की तारीख में देश के भीतर जितनी क्षेत्रीय पार्टियां काम करती  दिख रही हैं उनमे से अधिकतर कांग्रेस के खिलाफ राजनीति की है और जातीय राजनीति को हवा देकर सत्ता -सरकार और विपक्ष की राजनीति करती रही है। कांग्रेस के खिलाफ ही इनकी राजनीति शुरू हुई और आज भी कांग्रेस के आधार वोट पर ही इनकी राजनीति चल रही है। क्षेत्रीय पार्टियां आगे बढ़ती गई और कांग्रेस कमजोर होती गई और कई राज्यों से वह ख़त्म भी हो गई।  कभी बिहार और यूपी में कांग्रेस की सत्ता सरकार चलती थी लेकिन आज वह कहीं की नहीं है। बिहार में आज भी कांग्रेस का नामोनिशान तो है लेकिन यूपी में कांग्रेस की जमीन कहीं नहीं है। बिहार में लालू यादव ,जदयू ,लोजपा की जो अभी जमीन है कभी कांग्रेस की जमीन थी। उधर आज की तारीख में सपा ,बसपा और यहाँ तक कि बीजेपी की जो ताकत है वह सब कांग्रेस की जमीन से ही मिली है। कांग्रेस कमजोर होती गई और नेता निकलते गए। जातीय खेल में कांग्रेस पिछड़ती गई और आज कांग्रेस के सामने यही दो राज्य चुनौती से भरे हैं।          
 बीजेपी के उदय  के बाद की राजनीति कुछ अलग तरह की हो गई। पहले मंडल के नाम पर जातीय राजनीति शुरू हुई। क्षेत्रीय दलों को इसका लाभ भी मिला। लेकिन राम मंदिर आंदोलन के बाद बीजेपी ने जो धरम की राजनीति शुरू की उसकी पराकाष्ठा 2014 के बाद देखने को मिली। 2014 से पहले की लड़ाई कुछ अलग तरीके की थी लेकिन उसके बाद की लड़ाई धर्म आधारित हो गई। सभी क्षेत्रीय दलों ने बीजेपी का साथ भी दिया और सत्ता में भागीदारी भी की। बीजेपी को पता था कि पहले उसे कांग्रेस को ख़त्म करना है और बाद में इन क्षेत्रीय पार्टियों को समाप्त कर देना है। आज बीजेपी इसी राह पर है। यही वजह है कि  आज जब दलों पर संकट मंडराता दिखा तो वे व्याकुल हो उठे और आवाज आने लगी कि विपक्षी एकता जरुरी है ताकि बीजेपी को रोका जा सके।    
बता दें कि आज की तारीख में कांग्रेस का जितना पतन हो सकता था वह हो चुका है। अब उसके पास बचा ही क्या है ? ले देकर दो चार राज्यों में उसकी सरकार है जो कभी बचती है तो चली जाती है। कांग्रेस के पतन का यह भी अमृतकाल ही है।      एक दूसरी घटना भी कांग्रेस के साथ घटी। पहले क्षेत्रीय दलों ने उसकी जमीन को कमजोर किया और फिर बाद में कांग्रेस से अलग होकर कई पार्टियां तैयार हो गई। टीएमसी,एनसीपी  और जगन रेड्डी की पार्टी को आप उसी रूप में देख सकते हैं। करीब दर्जन बार कांग्रेस में टूट हुई। जब तक ये नेता कांग्रेस के साथ जुड़े थे तबतक पार्टी को हराते रहे और जब अलग हो गए तो ये पार्टियां अलग -अलग इलाके में सत्ता सरकार चलाने लगी। पवार ,ममता और जगन रेड्डी की कहानी को भला कौन नहीं जानता !         
  खैर कहानी तो विपक्षी एकता की है। आज जितनी एकता कांग्रेस के लिए जरुरी है उतनी ही जरूरत उन क्षेत्रीय पार्टियों को भी है। लेकिन दिक्कत ये है कि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है और उसकी पहुँच देश भर के गांव तक है। जबकि क्षेत्रीय पार्टियां एक इलाके की जातीय राजनीति करती है और इसमें वह सफल भी दिखती है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि जो क्षेत्रीय पार्टियां अपने इलाके में मजबूत हैं क्या वह कांग्रेस के लिए कोई स्पेस छोड़ने को तैयार है ? हरगिज नहीं। सबकी चाहत यही है कि कांग्रेस त्याग करे और वे इसका लाभ उठाये। यही वह केंद्र है जहां विपक्षी एकता की कहानी धूमिल होती नजर आती है। अब ज़रा हालिया घटना पर एक नजर डालने की जरूरत है।            
बीते 12 अप्रैल को नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव ने 10, राजाजी मार्ग पर स्थित कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर राहुल गांधी से मुलाकात की। इनके अलावा बैठक में जदयू  अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह, राजद के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा और कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद भी मौजूद थे। बैठक के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए, मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि यह “ऐतिहासिक” था और उनका उद्देश्य आगामी चुनावों के लिए सभी विपक्षी दलों को एकजुट करना है। खड़गे ने कहा “हम सभी ने यह तय किया कि सभी पार्टियों को एकजुट करना और आगे आने वाले चुनावों में एकसाथ लड़ना है। आज यही निर्णय लिया गया है और हम सब मिलकर उसी रास्ते पर काम करेंगे। 
            बैठक के बाद राहुल गांधी ने मीडिया से कहा कि “विपक्ष को एक करने की एक प्रक्रिया है और उनका देश के लिए जो विजन है, उसे हम विकसित करेंगे। जो भी पार्टियां हमारे साथ चलेंगी, हम उन्हें लेकर आगे बढ़ेंगे और विचारधारा की लड़ाई लड़ेंगे। देश और लोकतंत्र पर जो आक्रमण हो रहा है, हम उसके खिलाफ एक साथ खड़े होंगे।” उधर ,मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि हम देश की अधिक से अधिक पार्टियों को एकजुट करने का प्रयास कर रहे हैं। हम साथ बैठेंगे और आगे का काम करेंगे. यह बात तय हो गयी है। जितने लोग साथ आने को सहमत होंगे, हम उनके साथ बैठेंगे और आगे की बात करेंगे। ” यह पूछे जाने पर कि कितनी पार्टियां एक साथ आ रही हैं, नीतीश कुमार ने कहा, ‘जिस दिन हम मिलेंगे, आपको पता चल जाएगा. बड़ी संख्या में पार्टियां एक साथ आ रही हैं।”
     अब सवाल है कि क्या ममता बनर्जी भी यही चाहती हैं ? मार्च महीने के बीच में कांग्रेस संसद के अंदर अडानी मुद्दे पर पीएम मोदी को घेरने की कोशिश कर रही थी और उधर अखिलेश यादव ने ममता बनर्जी से ऐसी ‘शिष्टाचार भेंट’ की, कि खुद कांग्रेस सकते में आ गयी। बैठक से ऐसा लगा कि ममता बनर्जी कांग्रेस के बिना बीजेपी का सामना करने के लिए ‘एकजुट’ विपक्ष की तैयारी कर रही हैं। 
          इसके कुछ ही दिन बाद ममता बनर्जी ने ओडिशा के अपने समकक्ष नवीन पटनायक से मुलाकात की। भले ही ममता बनर्जी ने बैठक को “शिष्टाचार भेंट” का नाम दिया और पटनायक ने कहा कि बैठक के दौरान कोई “राजनीतिक चर्चा” नहीं हुई- लेकिन राजनीतिक पंडितों के लिए संकेत साफ थे। संयुक्त विपक्ष बनाने के लिए कांग्रेस से अलग ममता बनर्जी एक्टिव मोड़ में हैं।  
 उधर केजरीवाल की अपनी कहानी है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली का बजट पेश होने के बाद मीडिया से बात करते हुए जानकारी दी थी कि G8 नाम का एक ‘गवर्नेंस प्लेटफॉर्म’ बन रहा है। उन्होंने कहा कि इस मंच से जुड़कर हर महीने 8 राज्यों के मुख्यमंत्री, उनमें से किसी एक के राज्य में जाएंगे और वहां जो अच्छे काम हुए, वो देखकर आएंगे ताकि एक दूसरे से सीख सकें। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीएम केजरीवाल ने इस मंच के राजनीतिक होने के सवाल को पूरी तरह खारिज किया था। 
          राहुल गांधी को मानहानि मामले में सजा मिलने के बाद विपक्ष कुछ हद तक साथ दिखा। यहां तक कि टीएमसी और आप जैसी खुले तौर पर कांग्रेस को खारिज करने वाली पार्टियां भी कांग्रेस के पीछे आ गईं और विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया। एक बार फिर एकता तब दिखी जब राहुल गांधी की सजा के एक दिन बाद, विपक्ष के 14 दलों ने संयुक्त रूप से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।  याचिका में कहा गया कि जांच एजेंसियों द्वारा विपक्षी दलों को चुन-चुन कर टारगेट किया जा रहा है।  हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया। 
                डीएमके ने अप्रैल की शुरुआत में सामाजिक न्याय सम्मेलन के मंच पर कई विपक्षी दलों को साथ आने का मंच मुहैया कराया. डीएमके सुप्रीमो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा आयोजित विपक्ष की यह दूसरी बैठक थी। सम्मेलन में राजस्थान के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और अखिलेश यादव, बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, तृणमूल के डेरेक ओ’ब्रायन, वामपंथी नेता सीताराम येचुरी और डी राजा ने भाग लिया। इसके अलावा अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी – भी इसमें मौजूद रही। 
          ऐसे ऐसे में भले ही खड़गे, राहुल और नीतीश कुमार इस बैठक को विपक्षी एकता के लिए “ऐतिहासिक” बता रहे हैं, लेकिन इन नेताओं को भी विपक्षी एकता के राह में खड़ी बाधाओं की जानकारी है। साथ आते दिख रहे ये विपक्षी दल कई राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं – पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना इसके प्रमुख उदाहरण हैं। ऐसे में देखना होगा कि सबकी आपसी मुलाकात और बात किन मुद्दों पर होती है। यह एक टेढ़ी खीर है। असली लड़ाई बंगाल ,यूपी ,महाराष्ट्र और दिल्ली ,पंजाब से लेकर दक्षिण के राज्यों में है। इन राज्यों में एकता कितनी और कैसी होगी यही देखना है और बीजेपी इसी की टाक में बैठी है। 

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