कर्ज के बोझ से भारत बनेगा पांच ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी !

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न्यूज़ डेस्क
सरकार कहती है कि विकास के लिए कर्ज जरुरी है। बिना कर्ज लिए कोई भी देश विकास की गति को अंजाम नहीं दे सकता। हो सकता है इसमें सच्चाई भी हो लेकिन देश और सरकार की जगह अगर आम जनता यही फार्मूला को अपनाने लगे तो उसका क्या होगा सच तो यही है कि जब आम जनता अपनी हालत को ठीक करने के लिए कर्ज की दरकार महसूस करता है तो पहले तो उसे कर्ज नहीं मिलता क्योंकि आम जनता की कोई ख़ास साख नहीं होती।

और कर्ज मिल भी जाए उसे चुकाने के लिए उसके पास आय के कोई मजबूत स्रोत नहीं बनते। परिणाम यह होता है कि लोग कर्ज के जाल में फंसते चले जाते हैं और फिर एक दिन उसकी हालत दयनीय हो जाती है ,मुँह छुपाता फिरने लगता है। ऊपर से कर्ज देने वाली कंपनी उसे और भी बर्बाद  करते हैं। ऐसे में कर्ज दिखावे के लिए कतई जरुरी नहीं हो सकता। भारत का एक दर्शन जो चर्वाक दर्शन के नाम से जाना जाता है उसमे यह कहा गया है कि कर्ज लेकर घी पीयो। लगता है सरकार भी इसी राह पर चल रही है। 

लेकिन सरकार इस फॉर्मूले को नहीं मानती। सच यही है कि भारत सरकार पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष 2024-25 के बजट अनुमान के आंकड़े को जोड़ लें तो सात सालों में भारत सरकार पर बकाया कर्ज दोगुना होने का अनुमान है। वित्त वर्ष 2018-19 में केंद्र सरकार पर 93.26 लाख करोड़ रुपये कर्ज का बोझ था जो 2024-25 में बजट अनुमानों के मुताबिक 185.27 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जो देश की जीडीपी का 56.8 फीसदी है. लोकसभा में सरकार ने लिखित में ये जवाब दिया है। 

लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान सांसद खलिलपुर रहमान ने वित्त मंत्री से सवाल कर पिछले छह वर्षों के दौरान सरकार पर बकाये लोन का ब्योरा मांगा। उन्होंने वित्त मंत्री से पूछा क्या भारत सरकार पर बकाये कर्ज में बढ़ोतरी हुई है? इस प्रश्न का लिखित जवाब देते हुए वित्त राज्यमंत्री पंकज चौधरी ने पिछले सात वित्त वर्ष के दौरान केंद्र सरकार पर बकाये कर्ज के डिटेल्स देते हुए बताया, वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान सरकार पर कुल 93.26 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था जो कि जीडीपी का 49.3 फीसदी था। 

वित्त राज्यमंत्री के मुताबिक 2019-20 में सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़कर 105.07 लाख करोड़ रुपये हो गया जो जीडीपी का 52.3 फीसदी था. वित्त वर्ष 2020-21 जब देश में कोरोना ने दस्तक दिया उस वर्ष सरकार पर बकाया कर्ज बढ़कर 121.86 लाख करोड़ रुपये हो गया और कुल कर्ज जीडीपी का 61.4 फीसदी हो गया।

वित्त राज्यमंत्री के मुताबिक ऐसा कोविड महामारी के चलते हुआ. वित्त वर्ष 2021-22 में केंद्र सरकार पर बकाया कर्ज बढ़कर 138.66 लाख करोड़ रुपये हो गया जो जीडीपी का 58.8 फीसदी था। वित्त वर्ष 2022-23 जब वैश्विक तनाव बढ़ गया उस वर्ष केंद्र सरकार पर बकाये कर्ज का बोझ 156.13 लाख करोड़ रुपये हो गया जो जीडीपी का 57.9 फीसदी रहा था। 

वित्त राज्यमंत्री के मुताबिक वित्त वर्ष 2023-24 में सरकार पर बकाया कर्ज बढ़कर 171.78 लाख करोड़ रुपये हो गया जो कि जीडीपी का 58.2 फीसदी है।  हालांकि ये अभी प्रॉविजन डेटा है।  मौजूदा वित्त वर्ष के दौरान कर्ज में और बढ़ोतरी होने का अनुमान है और ये बढ़कर 185.27 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है जो कि जीडीपी का 56.8 फीसदी रह सकता है। ऐसे में पिछले सात वर्षों में भारत सरकार के कर्ज में 92.01 लाख करोड़ या 98.65 फीसदी की बढ़ोतरी आई है. सरकार पर बकाये कर्ज में एक्सटर्नल डेट भी शामिल है। 

वित्त मंत्री से खलिलपुर रहमान ने  सवाल किया क्या कर्ज के बोझ को बढ़ाकर सरकार भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनाएगी? इस प्रश्न के जवाब में वित्त राज्यमंत्री ने कहा, इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड के अप्रैल 2024 में जारी किए गए वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के मुताबिक भारत का जीडीपी वित्त वर्ष 2023-24 में 3.57 ट्रिलियन डॉलर का हो चुका है। 

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